
Uṣas (Dawn) revealing light and opening the rite, leading into Indra’s arrival for Soma
Indra
Bright awakening and forward-driving—moving from serene illumination to vigorous summons and praise
R̥ṣi and chandas are not supplied in the input; identification requires Rigvedic concordance/anukramaṇī for these mantra sources.
मुख्य भाव: उषस् (प्रभात) प्रकाश प्रकट कर यज्ञकर्म का द्वार खोलती है और फिर सोमपान हेतु इन्द्र का आगमन बुलाया जाता है। उपभाव: उषस् ‘दिवः दुहिता’ होकर तम का निवारण करती है; जल और प्रातः-प्रकटता यज्ञ को समर्थ बनाती हैं; सोम का पेषण-प्रवाह और आहुति की तात्कालिकता उभरती है; हरि (ताम्रवर्ण अश्वों) से युक्त इन्द्र समीप आते हैं; इन्द्र की सर्वव्याप्ति और अबाध, अपरिमित शक्ति का स्तवन होता है। धर्मार्थ: प्रकाश (उषस्) ही शुद्ध कर्म और उपासना की दैवी शर्त है; इन्द्र की असीम शक्ति यज्ञ की रक्षा करती है और फलसिद्धि कराती है।
Mantra 1
प्रत्यु अदर्श्यायत्यू3च्छन्ती दुहिता दिवः अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरि
वह प्रकट हुई है—हमारी ओर आती, दीप्त होकर—दिव की दुहिता (उषा)। वह महती, सुन्दरी, जलों को अपने लिए चुनती है; अपनी दृष्टि से वह ज्योति रचती है, तम को दूर करती है।
Mantra 2
इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना अयं वामह्वे ऽवसे शचीवसू विशंविशं हि गच्छथः
ये उषा-रक्त (किरणें), जो स्वर्ग में स्थित हैं, तुम्हें पुकारती हैं, हे अश्विनौ; मैं भी तुम्हें रक्षा-सहायता के लिए आह्वान करता हूँ, हे शचीवसुओं—शक्ति और धन के धारकों; क्योंकि तुम प्रत्येक जन-समूह, प्रत्येक निवास-स्थान तक (उपकार लेकर) जाते हो।
Mantra 3
कु ष्ठः को वामश्विना तपानो देवा मर्त्यः घ्नता वामश्मया क्षपमाणोंशुनेत्थमु आदुन्यथा
तुम कहाँ ठहरे हो? कौन तुम्हें खोजता है, हे अश्विनौ, हे देवो? कौन-सा पीड़ित मर्त्य, क्षीण होता हुआ, तुम्हें पुकारता है—जिसकी व्याधि को तुम शिला से, किरण से प्रहार करके, इस प्रकार उसे राहत पहुँचाते हो?
Mantra 4
अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोमो दिविष्टिषु तमश्विना पिबतं तिरो अह्न्यं धत्तं रत्नानि दाशुषे
यह सोम—अत्यन्त मधुमय—तुम दोनों के लिए निचोड़ा गया है, दिव्य इष्टियों में प्रतिष्ठित है। हे अश्विनौ! उस दिनकालीन पान को पियो, और हवि अर्पित करने वाले दाशुष के लिए रत्न-धन धारण करो (प्रदान करो)।
Mantra 5
आ त्वा सोमस्य गल्दया सदा याचन्नहं ज्या भूर्णिं मृगं न सवनेषु चुक्रुधं क ईशानं न याचिषत्
सोम के ‘गल्द’ सहित, सदा याचना करता हुआ, मैं तुझे सवनों में पुकारता हूँ—जैसे कोई वेगवान मृग का पीछा करे; क्योंकि कौन ऐसा है जो ईशान (स्वामी) से याचना न करे?
Mantra 6
अध्वर्यो द्रावया त्वं सोममिन्द्रः पिपासति उपो नूनं युयुजे वृष्णा हरी आ च जगाम वृत्रहा
हे अध्वर्यु, सोम को प्रवाहित कर; इन्द्र प्यासा है। अब निश्चय ही उसने अपने बलवान हरि (ताम्रवर्ण अश्व) जोते हैं, और वृत्रहन् यहाँ आ पहुँचा है।
Mantra 7
अभी षतस्तदा भरेन्द्र ज्यायः कनीयसः पुरूवसुर्हि मघवन्बभूविथ भरेभरे च हव्यः
बहुतों के विरुद्ध सहायता ले आ, हे इन्द्र; तू छोटे से बड़ा है। हे मघवन्, तू प्रचुर वसु (धन) से युक्त हुआ है, और हर-हर संग्राम में हवि से आह्वान योग्य है।
Mantra 8
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय स्तोतारमिद्दधिषे रदावसो न पापत्वाय रंसिषम्
हे इन्द्र! जितने तक तुम हो, उतने ही तक मुझे सामर्थ्य प्राप्त हो। हे धनदाता! तुम स्तोता को ही नियुक्त करते हो; मैं पाप के लिए रति न करूँ, उसमें आनंद न लूँ।
Mantra 9
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः अशस्तिहा जनिता वृत्रतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः
हे इन्द्र! समस्त संघर्षों में तुम सब स्पर्धाओं के विरुद्ध हो; तुम निन्दा के नाशक, सफलता के जनक, वृत्र के विजेता हो; आक्रमण करने वालों के विरुद्ध तुम ही अग्रणी वीर हो।
Mantra 10
प्र यो रिरिक्ष ओजसा दिवः सदोभ्यस्परि न त्वा विव्याच रज इन्द्र पार्थिवमति विश्वं ववक्षिथ
बल से पराक्रमी होकर तुम दिव्य सदनों से आगे बढ़े हो; हे इन्द्र! कोई भी लोक-प्रदेश तुम्हें घेर नहीं सका; पार्थिव सीमाओं के परे तुमने सर्वत्र विस्तार किया है।
Uṣas marks the ritual and cosmic ‘opening’—light makes the morning rite possible—after which the focus naturally turns to Indra, the chief Soma-drinker, who is summoned and praised for arriving and empowering the sacrifice.
It is a direct injunction to the Adhvaryu to make the Soma flow—i.e., expedite pressing/straining and readiness of the offering—because Indra is ‘thirsting’ and is to be received promptly.
The hymn praises Indra’s vyāpti (pervasion): no realm confines him, so he can come from any divine seat to the sacrifice, protect it, and grant victory and fulfillment.