
Aindra soma-invocation: energizing the rite through Indra’s wealth-giving power, with Agni/Apāṃ Napāt as the kindled mediator
Indra
Upbeat exhortative and success-seeking—suited to energizing offering-actions and calling down Indra’s boon
Bharadvāja (probable for the Agni/Apāṃ Napāt verses)
ऐन्द्र सोम-आह्वान: सोम-यज्ञ को क्रियाशील और सफल बनाने हेतु इन्द्र को ‘द्रविणोदाः’ (धन-प्रदाता) रूप में पुकारा जाता है। मंत्रों में सोम-धारा को उँडेलने और फिर से भरने की विधि-सूचक आज्ञाएँ हैं। साथ ही, सु-उच्चारित स्तुति द्वारा अग्नि का चयन/स्थापन किया जाता है—वह प्रज्वलित पुरोहित-शक्ति होकर हवि को देवों तक पहुँचाता और यज्ञ की रक्षा करता है। अंत में अपां नपात् (जल में स्थित अग्नि-तत्त्व) को शुभ, अच्युत सहायक के रूप में सामूहिक रूप से वरण किया जाता है; गायक ‘मित्र’ बनकर समवेत यज्ञ-कार्य में इन्द्र की समृद्धि और विजय तथा अग्नि/अपां नपात् की वहन-रक्षा-शक्ति को आकृष्ट करते हैं।
Mantra 1
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् उद्वा सिञ्जध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते
देव—तुम्हारा द्रविणोदा (धन-प्रदाता)—पूर्ण आहुति को बहने देता है। उसे उँडेलो, या पात्रों को फिर से भर दो; तब वह देव तुम्हारे लिए लाभ/कल्याण को वहन करता है।
Mantra 2
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः
ब्रह्मणस्पति अग्रसर हों; दिव्य सूनृता भी अग्रसर हो; वीर, नर्य, पंक्तिराधस—यथाक्रम दान-वितरक—उसकी ओर: देवगण हमारे यज्ञ को आगे ले चलें।
Mantra 3
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे
हे देव सविता के समान, हमारी सहायता के लिए ऊँचे उठकर खड़े हो; ऊँचा—बल का विजेता—जब हम अंजन (अभिषेक-लेप) और स्तुति-स्वरों से तुझे आह्वान करते हैं।
Mantra 4
प्र यो राये निनीषति मर्तो यस्ते वसो दाशत् स वीरं धत्ते अग्न उक्थशंसिनं त्मना सहस्रपोषिणम्
जो मर्त्य धन की ओर यज्ञ को ले जाना चाहता है, हे वसुमान् अग्नि, जो तुझे अर्पण-भाव से पूजता है—वह एक वीर पाता है, स्तोत्र-गायक, जो स्वयं ही सहस्र-गुण पोषण करने वाला है।
Mantra 5
प्र वो यह्वं पुरूणां विशां देवयतीनाम् अग्निं सूक्तेभिर्वचोभिर्वृणीमहे यंसमिदन्य इन्धते
हे देव-इच्छुक, अनेक जनों की विशों के लिए—हम सुकथित स्तोत्रों और वचनों से याह्व (सक्रिय) अग्नि को चुनते हैं; उसी को, जिसे अन्य लोग समिधा से प्रज्वलित करते हैं।
Mantra 6
अयमग्निः सुवीर्यस्येशे हि सौभगस्य राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम्
यह अग्नि निश्चय ही उत्तम वीर्य का स्वामी है; वह सौभाग्य-सम्पन्न धन का स्वामी है; वह गो-समृद्ध उत्तम सन्तान का स्वामी है; (वह) वृत्र-वधों का भी स्वामी है।
Mantra 7
त्वमग्ने गृहपतिस्त्वं होता नो अध्वरे त्वं पोता विश्ववार प्रचेता ताक्षि यासि च वार्यम्
हे अग्ने, तू गृहपति है; यज्ञ में तू हमारा होतृ है; तू पोतृ है—सर्व-वाञ्छित, प्रज्ञावान; तू (कर्म) रचता है और वाञ्छित वर (फल) को प्राप्त कराता है।
Mantra 8
सखायस्त्वा ववृमहे देवं मर्तास ऊतये अपां नपातं सुभगं सुदंससं सुप्रतूर्तिमनेहसम्
हम, तेरे सखा—मर्त्य—सहायता के लिए तुझे, उस देव को, वरण करते हैं; अपां नपात्—सुभग, सुदंसस, सुप्रतूर्तिमान, अनहस।
Because the section is Aindra: Indra is praised as draviṇodāḥ (giver of wealth) and is the chief recipient of Soma, expected to return ‘advantage’—prosperity and victory—to the sacrificers.
Soma worship needs a mediator: Agni is ‘chosen’ and kindled to carry offerings, and Apāṃ Napāt expresses Agni’s hidden fiery power (especially in waters), invoked as auspicious and unfailing support for the rite.
They reflect live ritual instruction: priests prepare and manage the Soma stream/cups, and the chant aligns speech with action so the offering is timely and effective.