Rig Veda Sukta 21
Mandala 9Sukta 217 Mantras

Sukta 21

Sukta 9.21

Devata

Soma (as Pavamāna streams) with explicit relation to Indra

यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम-धाराओं की स्तुति करता है जो छननी से वेगपूर्वक प्रवाहित होकर उज्ज्वल, प्रबल और इन्द्र के हर्ष तथा विजय के योग्य बनती हैं। मंत्रों में सोम की शुद्धिकारी गति, ‘स्वर’ (सूर्य-लोक) का प्रकाश और धन-रत्न जीतने की उसकी शक्ति, तथा सत् (यथार्थ) से प्रेरित विचार (मति) को उद्भासित/प्रवर्तित करने की क्षमता का वर्णन है। यज्ञीय और आन्तरिक अर्थ—दोनों में—यह सूक्त परिशुद्ध आनन्द को इन्द्र-सदृश बल और प्रकाशमय ज्ञान का प्रेरक मानकर उसका उत्सव करता है।

Mantras

Mantra 1

एते धावन्तीन्दवः सोमा इन्द्राय घृष्वयः । मत्सरासः स्वर्विदः ॥

ये इन्दु—सोम-धाराएँ—इन्द्र के लिए दौड़ती निकलती हैं; तीव्र, दहकती हुई, आगे बढ़ने वाली। ये मत्सर—उन्मादक आनन्द—स्वर्विद् हैं, स्वर्ग-लोक/सूर्य-लोक को पाने वाली।

Mantra 2

प्रवृण्वन्तो अभियुजः सुष्वये वरिवोविदः । स्वयं स्तोत्रे वयस्कृतः ॥

वे अभियुज्—आक्रमण के लिए जुते हुए—अग्रसर होते हैं, सु-प्रेसन के लिए; वरिवोविद्—विस्तृत अवकाश के खोजी। वे स्वयं स्तोत्र में वयस्कृत्—जीवन-वृद्धि—को रचते हैं।

Mantra 3

वृथा क्रीळन्त इन्दवः सधस्थमभ्येकमित् । सिन्धोरूर्मा व्यक्षरन् ॥

स्वेच्छा से क्रीड़ा करते हुए सोम-बिन्दु एक ही समान आसन की ओर साथ-साथ बहते हैं; और जैसे नदी की ऊर्मि (लहर) फैलकर उँडेलती है, वैसे ही वे आनन्द की अनेक गतियाँ एक ही आधार—चेतना के अधिष्ठान—में आकर एकत्र हो जाती हैं।

Mantra 4

एते विश्वानि वार्या पवमानास आशत । हिता न सप्तयो रथे ॥

ये पवमान सोम समस्त वरणीय (इच्छित) निधियों को प्राप्त करते हैं; रथ में जुते हुए सात अश्वों के समान, नियत व्यवस्था में स्थित होकर वे सामर्थ्य से अग्रसर होते हैं—इस प्रकार शुद्धीकृत आनन्द-शक्तियाँ प्राणी को उसके अभिलषित पूर्णत्व की ओर सीधा ले जाती हैं।

Mantra 5

आस्मिन्पिशङ्गमिन्दवो दधाता वेनमादिशे । यो अस्मभ्यमरावा ॥

इस (हमारे क्षेत्र) में, हे सोम-बिन्दुओ, पिशङ्ग (ताम्र-स्वर्ण) तेज को स्थापित करो; प्रकाशन के लिए वेन (आकांक्षा/प्रेरणा) को धरो; जो हमारे लिए उदार-दानशील है, वही हमारे भीतर दर्शन की ओर ले जाने वाली इच्छा को जाग्रत करे।

Mantra 6

ऋभुर्न रथ्यं नवं दधाता केतमादिशे । शुक्राः पवध्वमर्णसा ॥

ऋभुओं के समान, जो नया रथ रचते हैं, वैसे ही तुम प्रकाशन के लिए केत (चिह्न) स्थापित करो। हे शुक्ल (दीप्त) जनो, अर्णस् (प्रवाह) के साथ अपने को पवित्र करो।

Mantra 7

एत उ त्ये अवीवशन्काष्ठां वाजिनो अक्रत । सतः प्रासाविषुर्मतिम् ॥

ये ही वे—वेगवान शक्तियाँ—लक्ष्य तक धकेलकर ले गईं; वाजिन् (बल-सम्पन्न) धारकों ने उसे रचा। सत् (यथार्थ) से उन्होंने मति (चेतना-विचार) को निचोड़कर प्रवाहित किया, प्रकट किया।

Frequently Asked Questions

It praises the Soma juice as it flows through the filter (Pavamāna), becoming bright and powerful, especially to invigorate Indra and to win light (svar) and prosperity.

In Vedic ritual, Indra is a chief recipient of Soma. The hymn presents Soma as the energizing drink that strengthens Indra’s victorious force and helps overcome obstacles to light and abundance.

It poetically says that when Soma is purified, it symbolizes truth-based clarity: from the Real (sat) arises inspired thought (mati), which then ‘streams forth’ as effective insight and right action.

Ask anything about Sukta 21 of the Rig Veda

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free Google sign-in keeps your chat saved across web and the app.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App