Rig Veda Sukta 13
Mandala 8Sukta 1333 Mantras

Sukta 13

Sukta 8.13

Devata

Indra

यह सूक्त इन्द्र के लिए सोम-आह्वान का विस्तृत स्तवन है। इसमें उन्हें पराक्रमी वज्रधारी (वज्रिन्) के रूप में सराहा गया है, जो निचोड़े हुए सोम के पास आते हैं और उपासक के क्रतु (इच्छाशक्ति, संकल्प, प्रेरित बुद्धि) को स्तुति के लिए स्पष्ट तथा प्रभावी बनाते हैं। सूक्त बार-बार इन्द्र की “बहुरंगी सहायताओं” (चित्रा ऊतयः) को वृद्धि से जोड़ता है—अन्तःस्थ पृथ्वी-सदृश शक्तियों को दृढ़ करना, सामर्थ्य का विस्तार करना, और ऐसी रीति से कि स्वयं स्तुति भी प्रत्युत्तर में बढ़ती जाए।

Mantras

Mantra 1

इन्द्रः सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीत उक्थ्यम् । विदे वृधस्य दक्षसो महान्हि षः ॥

इन्द्र, सुते हुए सोमों में उक्थ्य (स्तोत्र-योग्य) क्रतु—यज्ञ-इच्छा/संकल्प-शक्ति—को शुद्ध और प्रखर करता है; क्योंकि वह वर्धक के दक्ष (कौशल) और बल से जानता है—वह महान है।

Mantra 2

स प्रथमे व्योमनि देवानां सदने वृधः । सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित् ॥

वह वर्धक प्रथम विस्तीर्ण व्योम में, देवों के सदन में स्थित है। वह सु-पार (सुगामी पार लगाने वाला), सु-श्रवस्तम (श्रेष्ठ कीर्ति/सच्चे श्रवण से युक्त) है; और अप्सु-जित्—जल-तत्त्व, अर्थात् गहन अन्तर-जल/अवचेतन की गहराइयों में भी विजयी है।

Mantra 3

तमह्वे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम् । भवा नः सुम्ने अन्तमः सखा वृधे ॥

उसे मैं आह्वान करता हूँ—इन्द्र, उस शुष्मिण (बल-तेज से युक्त) को—वाजसातय के लिए, बल-सम्पदा की विजय हेतु, और हमारे भार के वहन के लिए। तू हमारे लिए अपने सुम्न (अनुग्रह-सुख) में सबसे निकट मित्र बन; हमारी वृद्धि का वर्धक सखा हो।

Mantra 4

इयं त इन्द्र गिर्वणो रातिः क्षरति सुन्वतः । मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि ॥

हे गिर्वण (गीत-स्तुति से पूज्य) इन्द्र, यह तेरी राति—दान—सुन्वत: (सोम-निचोड़ने वाले) के लिए बह निकलती है। इस बर्हिष् (यज्ञ-आसन) पर मन्दानो—आनन्दित होकर—तू पूर्ण प्रकाश में विराजता है।

Mantra 5

नूनं तदिन्द्र दद्धि नो यत्त्वा सुन्वन्त ईमहे । रयिं नश्चित्रमा भरा स्वर्विदम् ॥

हे इन्द्र! अब निश्चय ही हमें वही प्रदान कर, जिसके लिए हम सोम निचोड़ते हैं और तुझे पुकारते हैं। हमारे लिए विचित्र-रूप, बहुविध रयि—ऐसा धन ले आ, जो स्वर्विद् हो, प्रकाश-विजयी और स्वर्ग-खोजी।

Mantra 6

स्तोता यत्ते विचर्षणिरतिप्रशर्धयद्गिरः । वया इवानु रोहते जुषन्त यत् ॥

हे विचर्षणि (मनुष्यों और कर्मों को देखने वाले)! जब स्तोता तेरे लिए स्तुतिगिरों को प्रतिरोध से परे उछाल देता है, तब वे—तेरे अनुगमन में—उड़ते पक्षियों की भाँति उठती हैं, जब तू उन्हें स्वीकार कर उनमें रस लेता है।

Mantra 7

प्रत्नवज्जनया गिरः शृणुधी जरितुर्हवम् । मदेमदे ववक्षिथा सुकृत्वने ॥

प्रत्नवत् (प्राचीन-प्रेरित) वाणी को फिर से जन, और जारिता (स्तोता) के हव को सुन। मदे-मदे तू सुकृत्वने—सत्कर्म करने वाले के लिए—और अधिक बलवान होता है।

Mantra 8

क्रीळन्त्यस्य सूनृता आपो न प्रवता यतीः । अया धिया य उच्यते पतिर्दिवः ॥

उसकी सूनीता—सत्य और तेजस्वी वाणी—ढलान से वेग से बहते जल की भाँति क्रीड़ा करती हुई प्रवाहित होती है। इसी जाग्रत धिया से वह ‘दिवः पति’—स्वर्ग का स्वामी—कहा जाता है।

Mantra 9

उतो पतिर्य उच्यते कृष्टीनामेक इद्वशी । नमोवृधैरवस्युभिः सुते रण ॥

और वह, जो जनों का एकमात्र वशी—‘पति’—कहा जाता है, नमोवृद्धि करने वाले और उसकी अवस्या चाहने वाले भक्तों द्वारा—हे (इन्द्र), सुते में यहाँ रमण कर।

Mantra 10

स्तुहि श्रुतं विपश्चितं हरी यस्य प्रसक्षिणा । गन्तारा दाशुषो गृहं नमस्विनः ॥

श्रुत—प्रसिद्ध—और विपश्चित—विस्तृत-बुद्धि—का स्तवन कर; जिसके हरि (दो हरित अश्व/शक्ति) प्रबल होकर उसे आगे वहन करते हैं। वे नमस्विन्—नम्र-भक्त—दाता के घर, यजमान के गृह, तक आते हैं।

Mantra 11

तूतुजानो महेमतेऽश्वेभिः प्रुषितप्सुभिः । आ याहि यज्ञमाशुभिः शमिद्धि ते ॥

हे तूतुजान (वेगवान) इन्द्र! महत् माप (महिमा) के लिए, ओस-कणों से दीप्त, उष्ण-प्रभा वाले अश्वों सहित—शीघ्र यज्ञ में आओ; यह तुम्हारे शम (शान्ति) और सिद्धि के लिए ही है।

Mantra 12

इन्द्र शविष्ठ सत्पते रयिं गृणत्सु धारय । श्रवः सूरिभ्यो अमृतं वसुत्वनम् ॥

हे इन्द्र, अति-शविष्ठ, सत्पति! जो गाते हैं, उनमें रयि (समृद्धि) को धारण कर। सूरी (प्रकाशित ऋषि) जनों को अमृत-तुल्य श्रवस् (अमर कीर्ति) और वसुत्व (सम्पन्न-भाव) प्रदान कर।

Mantra 13

हवे त्वा सूर उदिते हवे मध्यंदिने दिवः । जुषाण इन्द्र सप्तिभिर्न आ गहि ॥

मैं तुम्हें सूर्य के उदित होते समय पुकारता हूँ; मैं तुम्हें दिवः के मध्याह्न में पुकारता हूँ। हे इन्द्र, सप्ति (सात-शक्ति/सात-रश्मि) सहित, प्रसन्न होकर हमारे पास आओ।

Mantra 14

आ तू गहि प्र तु द्रव मत्स्वा सुतस्य गोमतः । तन्तुं तनुष्व पूर्व्यं यथा विदे ॥

आओ, यहाँ आओ; आगे दौड़ो—गोमय (किरणों से समृद्ध) निचोड़े हुए सोम का आनन्द लो। हमारे भीतर उस प्राचीन तन्तु को फैलाओ, जिससे हम यथार्थ रूप से जान सकें।

Mantra 15

यच्छक्रासि परावति यदर्वावति वृत्रहन् । यद्वा समुद्रे अन्धसोऽवितेदसि ॥

हे वृत्रहन्, चाहे तुम दूर हो या निकट; या चाहे आनन्द (अन्धस्) के समुद्र में हो—तब भी तुम ही निश्चय ही सहायक हो।

Mantra 16

इन्द्रं वर्धन्तु नो गिर इन्द्रं सुतास इन्दवः । इन्द्रे हविष्मतीर्विशो अराणिषुः ॥

हमारे स्तुतिगान इन्द्र को बढ़ाएँ; निचोड़े हुए सोम-बिन्दु इन्द्र को बढ़ाएँ। इन्द्र में हवि-सम्पन्न जन दृढ़ और समरस होकर स्थापित हों।

Mantra 17

तमिद्विप्रा अवस्यवः प्रवत्वतीभिरूतिभिः । इन्द्रं क्षोणीरवर्धयन्वया इव ॥

उस इन्द्र को ही—उच्च आश्रय के अभिलाषी विप्र—उसकी अग्रगामी, प्रवहमान ऊतियों (सहायताओं) से बढ़ाते हैं; वे भीतर की विस्तृत पृथ्वी-शक्तियों को वैसे ही वर्धित करते हैं जैसे उड़ान के लिए पंख बढ़ते हैं।

Mantra 18

त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमत्नत । तमिद्वर्धन्तु नो गिरः सदावृधम् ॥

त्रिकद्रुकों (तीन सोम-प्रेसों) में देवों ने यज्ञ में परिश्रम किया, चेतन (जाग्रत) को जगाने के लिए; वह सदा-वर्धमान तत्त्व हमारे भीतर—हमारी गिरः (प्रेरित वाणी) से—और बढ़े।

Mantra 19

स्तोता यत्ते अनुव्रत उक्थान्यृतुथा दधे । शुचिः पावक उच्यते सो अद्भुतः ॥

जब स्तोता, तेरे अनु-व्रत (नियम) का पालन करते हुए, ऋतु-था (ऋतु के अनुसार) उक्थों को स्थापित करता है, तब वह शुचि और पावक कहलाता है; वह कर्म में अद्भुत हो जाता है।

Mantra 20

तदिद्रुद्रस्य चेतति यह्वं प्रत्नेषु धामसु । मनो यत्रा वि तद्दधुर्विचेतसः ॥

वही—रुद्र की—वह यह्व (प्रचण्ड) शक्ति प्राचीन धामों में जाग्रत होती है; जहाँ विवेकी जनों ने मन को उसकी ओर व्यापक रूप से स्थापित किया है।

Mantra 21

यदि मे सख्यमावर इमस्य पाह्यन्धसः । येन विश्वा अति द्विषो अतारिम ॥

यदि तू मेरे साथ सख्य में प्रविष्ट हुआ है, तो इस अन्धस् (सोम-रस) की रक्षा कर; इसी के द्वारा मैं समस्त द्वेषों के पार उतर जाऊँ।

Mantra 22

कदा त इन्द्र गिर्वणः स्तोता भवाति शंतमः । कदा नो गव्ये अश्व्ये वसौ दधः ॥

हे गिर्वण इन्द्र, कब मेरा स्तोत्र सर्वाधिक शान्तिदायक होगा? कब तू हमारे लिए गव्य और अश्व्य—समृद्धि—उस वसु को स्थापित करेगा?

Mantra 23

उत ते सुष्टुता हरी वृषणा वहतो रथम् । अजुर्यस्य मदिन्तमं यमीमहे ॥

और तेरे सु-स्तुत, हरितवर्ण दो अश्व—वे वृषभ-सम बलवान—अजुर्य (अविनाशी) स्वामी का रथ वहन करते हैं; उस परम मदिन्तम (आनन्द-उन्मादक) को हम समीप बुलाते हैं।

Mantra 24

तमीमहे पुरुष्टुतं यह्वं प्रत्नाभिरूतिभिः । नि बर्हिषि प्रिये सददध द्विता ॥

उस पुरुष्टुत (अति-स्तुत) यह्व (वेगवान/प्रचण्ड) को हम प्राचीन ऊतियों (सहायताओं) द्वारा ही पुकारते हैं; वह प्रिय बर्हिषि (यज्ञ-आसन) पर बैठे, और भीतर फिर से प्रतिष्ठित हो।

Mantra 25

वर्धस्वा सु पुरुष्टुत ऋषिष्टुताभिरूतिभिः । धुक्षस्व पिप्युषीमिषमवा च नः ॥

हे पुरुष्टुत! ऋषियों द्वारा स्तुत ऊतियों (सहायताओं) से तू बढ़; और हमारे लिए पिप्युषी (उफनती) इषम् (पोषक अन्न/रस) दुह, और हमारी रक्षा भी कर।

Mantra 26

इन्द्र त्वमवितेदसीत्था स्तुवतो अद्रिवः । ऋतादियर्मि ते धियं मनोयुजम् ॥

हे इन्द्र! हे अद्रिवः (वज्रधारी)! तू निश्चय ही रक्षक है—ऐसे स्तुति करने वाले के लिए। ऋत (सत्य-नियम) से मैं तेरे लिए मन से युक्त (मनोयुज) उस धिया (प्रेरित बुद्धि/विचार) को प्रवाहित करता हूँ।

Mantra 27

इह त्या सधमाद्या युजानः सोमपीतये । हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभि स्वर ॥

यहाँ, सोमपान के लिए, उस आनन्द के दो सखाओं (हरी) को जोतकर—हे इन्द्र—तेरे दोनों हरि अपने वसुओं (धनों) सहित आगे बढ़ें, और हमारे भीतर प्रकाशमय स्वर को अभि-स्वरित करें।

Mantra 28

अभि स्वरन्तु ये तव रुद्रासः सक्षत श्रियम् । उतो मरुत्वतीर्विशो अभि प्रयः ॥

तेरे जो रुद्र हैं, वे प्रकाश की ओर अभि-स्वरित हों; वे श्री (तेज-समृद्धि) को प्राप्त करें। और मरुत्वती विशः (मरुतों से परिपूर्ण जनसमुदाय) भी उस अग्रसर प्रयः (अर्पण-बल/यज्ञ-प्रेरणा) की ओर अभि-प्रयाण करें।

Mantra 29

इमा अस्य प्रतूर्तयः पदं जुषन्त यद्दिवि । नाभा यज्ञस्य सं दधुर्यथा विदे ॥

ये अग्रगामी प्रेरक शक्तियाँ, जब उसका पद दिवि में होता है, तब उसमें आनन्द लेती हैं। उन्होंने यज्ञ की नाभि को एकत्र स्थापित किया, जिससे विद्वान्-ज्ञान की स्थापना हो।

Mantra 30

अयं दीर्घाय चक्षसे प्राचि प्रयत्यध्वरे । मिमीते यज्ञमानुषग्विचक्ष्य ॥

यह (अग्नि/ऋत्विज) दीर्घ-दृष्टि के लिए, अध्वर-यज्ञ में आगे बढ़ता है। विवेकशील होकर, वह यज्ञ को मनुष्यों की निरन्तर परम्परा में, क्रमशः मापता-रचता है।

Mantra 31

वृषायमिन्द्र ते रथ उतो ते वृषणा हरी । वृषा त्वं शतक्रतो वृषा हवः ॥

वृषभ-सा है, हे इन्द्र, तेरा रथ; और वृषभ-से हैं तेरे दोनों हरि। वृषभ-सा तू है, हे शतक्रतो; और वृषभ-सा है वह हवि/हवः जो तुझे बुलाता है—फलदायी बल से परिपूर्ण।

Mantra 32

वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः । वृषा यज्ञो यमिन्वसि वृषा हवः ॥

वृषभ-सा है ग्रावा (सोम-पेषण-पत्थर), वृषभ-सा है मद (उन्माद); वृषभ-सा है यह निचोड़ा हुआ सोम। वृषभ-सा है वह यज्ञ जिसे तुम प्रवर्तित करते हो; वृषभ-सा है यह हवः (आह्वान)।

Mantra 33

वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः । वावन्थ हि प्रतिष्टुतिं वृषा हवः ॥

वृषभ-स्वरूप, मैं तुम्हें—वृषभ को—हूँकारता हूँ, हे वज्री, तुम्हारी विचित्र (बहुरंगी) ऊतियों के साथ। क्योंकि तुम ही प्रत्युत्तर-स्तुति को बढ़ाते हो; वृषभ-सा है यह हवः (आह्वान)।

Frequently Asked Questions

It is a Soma-hymn to Indra, asking him to come to the pressed Soma, purify the worshiper’s will (kratu), and grant strengthening help that makes praise and power grow.

Because Indra is invoked as the foremost drinker of Soma; Soma symbolizes the energizing, clarifying force that supports inspired speech and victorious action.

It means the hymn presents worship as reciprocal: when the sacrificer praises sincerely, Indra responds by intensifying inspiration, confidence, and the effectiveness of the prayer itself.

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