Rig Veda Sukta 95
Mandala 7Sukta 956 Mantras

Sukta 95

Sukta 7.95

Rishi

Vasiṣṭha (traditional for RV 7.95 Sarasvatī hymn)

Devata

Sarasvatī

Chandas

Jagatī (probable for RV 7.95.1; confirm by syllable count)

यह सूक्त सरस्वती की स्तुति करता है—उसे महान्, प्रेरक नदी-शक्ति के रूप में, जो समस्त जलों से बढ़कर है; स्थिर, “लौह-आधारित” और रथ के समान वेग से आगे बढ़ती हुई। फिर वर्णन ब्रह्माण्डीय रूप से यज्ञीय प्रार्थना की ओर मुड़ता है: वह सुने, समीप आए, धन और बल प्रदान करे, और वसिष्ठ तथा उनके साथियों के लिए ऋत (सत्य-व्यवस्था) के “द्वार” खोल दे।

Mantras

Mantra 1

प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती धरुणमायसी पूः । प्रबाबधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्याः ॥

प्रेरक वेग और धारक शक्ति से वह प्रवाहित होती है—यह सरस्वती, आयसी धरण (लौह-आधार) वाली पूः (परिपूर्ण धारा)। रथमार्ग पर चलते रथ की भाँति वह आगे-आगे दबाती हुई जाती है; अपनी महिमा से वह अन्य सब जल-धाराओं, सब सिन्धुओं से बढ़कर है।

Mantra 2

एकाचेतत्सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात् । रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय ॥

वह सरस्वती—नदियों में एकमात्र चेतन—पर्वतों से समुद्र तक शुद्ध वेग से बहती है। व्यापक जगत् के धन-वैभव को जानती हुई, वह नाहुष (मानव साधक) के लिए घृत और पयः—आनन्दमय तेज तथा पोषण—दुहती है।

Mantra 3

स वावृधे नर्यो योषणासु वृषा शिशुर्वृषभो यज्ञियासु । स वाजिनं मघवद्भ्यो दधाति वि सातये तन्वं मामृजीत ॥

वह नर्य (वीर्यवान) योषणाओं में बढ़ता है—वृषभ होकर भी शिशु; यज्ञीय कर्मों में वृषभ-सा बलवान। वह मघवद्भ्यः (दानशीलों) को वाजिन् (बल-सम्पन्न) शक्ति देता है, और विजय के लिए हमारे अस्तित्व की तनु को परिष्कृत कर सँवारता है।

Mantra 4

उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत्सुभगा यज्णे अस्मिन् । मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः ॥

और वह हमारी सरस्वती—अनुग्रहपूर्वक प्रसन्न होकर, सुभगा—इस यज्ञ में हमारी वाणी सुने और समीप आए। मितज्ञु (माप-जानने वाले) जनों के साथ, नमस्य (वंदना) से प्रेरित होकर चलती हुई, वह राया (समृद्धि) के युग से भी हमारे सखाओं के लिए उत्तरा—उन्नायक शक्ति—बने।

Mantra 5

इमा जुह्वाना युष्मदा नमोभिः प्रति स्तोमं सरस्वति जुषस्व । तव शर्मन्प्रियतमे दधाना उप स्थेयाम शरणं न वृक्षम् ॥

हम, उठे हुए हाथों से, तुमसे ही प्राप्त नमस्कारों सहित, हे सरस्वती, इस स्तोम (स्तुति-गीत) को स्वीकार कर; इसमें प्रसन्न हो। तेरे अत्यन्त प्रिय शरण-शर्मन् (आश्रय-शान्ति) को धारण करते हुए, हम तेरे समीप आकर ठहरें—जैसे शरण के लिए वृक्ष के पास खड़ा हुआ जाता है।

Mantra 6

अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः । वर्ध शुभ्रे स्तुवते रासि वाजान्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

हे सरस्वती, हे सुभगे! यह वसिष्ठ तेरे लिए ऋत (सत्य) के द्वारों को व्यापक रूप से खोलता है। हे शुचि (शुभ्रे), स्तुति करने वाले को तू बढ़ा; उसे बल-समृद्धि के वाज (विजय-धन) प्रदान कर। और तुम सदा हमें स्वस्ति-कल्याणों से सुरक्षित रखो।

Frequently Asked Questions

It praises Sarasvatī as a powerful, life-giving river that surpasses all waters, and it asks her to come to the sacrifice, grant prosperity and strength, and protect the worshippers.

It means Sarasvatī is invoked as a power that reveals and establishes truth and right order (ṛta), making the ritual effective and the mind clear and aligned.

Both. The verses describe her as a real, mighty river in motion, and also as a divine presence who hears prayers, blesses the yajña, and gives wealth, inspiration, and well-being.

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