Rig Veda Sukta 93
Mandala 7Sukta 938 Mantras

Sukta 93

Sukta 7.93

Rishi

Vasiṣṭha

Devata

Indra-Agni (dual)

Chandas

Triṣṭubh (likely; verify)

यह सूक्त इन्द्र और अग्नि—इन युगल शक्तियों—को संयुक्त वृत्रहन्ता के रूप में आवाहन करता है। उनसे प्रार्थना है कि वे नूतन, शुद्ध स्तुति-गीत को स्वीकार करें और उपासक को तत्काल बल, विजय तथा समृद्ध ‘वाज’ प्रदान करें। उनकी सहायता को यज्ञ और सामुदायिक प्रतिस्पर्धा के प्रसंग में रखकर उनसे आग्रह किया गया है कि वे अदेव विरोध को परास्त करें और जनसमुदाय की कुशल-क्षेम सहित रक्षा करें। अंत में विष्णु और मरुत् आदि सहायक देवों की ओर संकेत है, ताकि यजमान उपेक्षित न रहे।

Recitation with translationRig Veda 7.93

Mantras

Mantra 1

शुचिं नु स्तोमं नवजातमद्येन्द्राग्नी वृत्रहणा जुषेथाम् । उभा हि वां सुहवा जोहवीमि ता वाजं सद्य उशते धेष्ठा ॥

आज नवजात यह शुद्ध स्तोत्र—हे इन्द्राग्नी, वृत्रहन्ता—आप दोनों स्वीकार करें। क्योंकि आप दोनों सुलभ-आह्वान हैं; मैं आपको बार-बार पुकारता हूँ—जो अभिलाषी है, उसके लिए आप तत्क्षण वाज (बल-समृद्धि) को दृढ़ स्थापित करें।

Mantra 2

ता सानसी शवसाना हि भूतं साकंवृधा शवसा शूशुवांसा । क्षयन्तौ रायो यवसस्य भूरेः पृङ्क्तं वाजस्य स्थविरस्य घृष्वेः ॥

आप दोनों ही सानसी (विजयी) हैं—साथ-साथ बढ़ने वाले; बल से बल बढ़ाते, बल से निरंतर पुष्ट होते। प्रचुर यवस (पोषण) की राया (सम्पदा) में निवास करते हुए, आप स्थिर और घृष्व (उत्साही) वाज (बल-समृद्धि) को मिलाते और उँडेलते हैं।

Mantra 3

उपो ह यद्विदथं वाजिनो गुर्धीभिर्विप्राः प्रमतिमिच्छमानाः । अर्वन्तो न काष्ठां नक्षमाणा इन्द्राग्नी जोहुवतो नरस्ते ॥

जब प्रेरित विप्र, सम्यक्-प्रमति (उचित मार्गदर्शन) की चाह में, अपनी धियों (एकाग्र बुद्धियों) से विदथ (सभा/यज्ञ-समागम) के निकट आते हैं, तब वे लक्ष्य को पाने वाले अश्वों की भाँति अग्रसर होते हैं। हे इन्द्राग्नी, आपके नर (जन) आपको बार-बार जोहवते (आह्वान करते) हैं।

Mantra 4

गीर्भिर्विप्रः प्रमतिमिच्छमान ईट्टे रयिं यशसं पूर्वभाजम् । इन्द्राग्नी वृत्रहणा सुवज्रा प्र नो नव्येभिस्तिरतं देष्णैः ॥

दृष्टि-सम्पन्न वाणी-स्तुतियों से विप्र, अग्रगामी प्रज्ञा (प्रमति) की कामना करता हुआ, उस यशस्वी रयि को पुकारता और पूजता है जो प्राचीन भाग है। हे इन्द्र–अग्नि, वृत्रहन्, सुवज्रधारी, अपने नित्य-नवीन दानों (देṣ्णैः) से हमें पार उतारो।

Mantra 5

सं यन्मही मिथती स्पर्धमाने तनूरुचा शूरसाता यतैते । अदेवयुं विदथे देवयुभिः सत्रा हतं सोमसुता जनेन ॥

जब महान विरोधी शक्तियाँ स्पर्धा में टकराती हैं, तब तुम दोनों—अपने प्रकाशमय तनु-रुचि से दीप्त, शूर-साता (वीर-पुरस्कार के विजेता)—आगे बढ़ते हो। यज्ञ-सभा (विदथ) में, देवयुजनों के साथ, अदेवयु (अदेव-प्रवृत्ति) को सदा-सर्वथा संहारो—हे वे जिनके लिए जन सोम को निचोड़ते हैं।

Mantra 6

इमामु षु सोमसुतिमुप न एन्द्राग्नी सौमनसाय यातम् । नू चिद्धि परिमम्नाथे अस्माना वां शश्वद्भिर्ववृतीय वाजैः ॥

अब हमारी इस सोमसुति के निकट आओ, हे इन्द्र–अग्नि, सौमनस्य (प्रसन्न-सामंजस्य) के लिए। क्योंकि अभी भी तुम हमें चारों ओर से घेरकर रक्षा करते हो; मैं सदा तुम्हारी ओर मुड़ता रहूँ—नव-नव गति को जगाने वाले स्थिर वाजों (बल-समृद्धियों) के साथ।

Mantra 7

सो अग्न एना नमसा समिद्धोऽच्छा मित्रं वरुणमिन्द्रं वोचेः । यत्सीमागश्चकृमा तत्सु मृळ तदर्यमादितिः शिश्रथन्तु ॥

हे अग्नि! इस नमस्कार से समिद्ध होकर तुम मित्र, वरुण और इन्द्र के पास जाकर हमारा वचन कहो। जो भी अपराध/दोष हमसे हुआ है, उसे तुम शान्त करो, उसका प्रायश्चित्त-सा कराकर उसे ठीक कर दो; और आर्यमन् तथा अदिति उस पाप-गाँठ को हमसे ढीला करके खोल दें, हमें उससे मुक्त करें।

Mantra 8

एता अग्न आशुषाणास इष्टीर्युवोः सचाभ्यश्याम वाजान् । मेन्द्रो नो विष्णुर्मरुतः परि ख्यन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

हे अग्नि! इन शीघ्र-प्रवृत्त यज्ञ-आहुतियों द्वारा हम तुम्हारे सान्निध्य में बल-सम्पदा (वाज) की पूर्णताएँ प्राप्त करें। इन्द्र, विष्णु और मरुत हमें अनदेखा न करें; तुम हमें सदा स्वस्ति—कल्याण और सुमार्ग—के साथ सुरक्षित रखो।

Frequently Asked Questions

Indrāgnī means Indra and Agni invoked as a pair. Indra represents conquering strength, while Agni is the sacrificial fire that carries offerings; together they unite ritual power with victory over obstacles.

It asks Indra–Agni to accept the fresh hymn and to grant vāja—strength, success, and winning power—quickly, while also destroying hostile or ‘godless’ opposition and protecting the worshippers.

The closing verse broadens the protection: the poet prays that Indra, Viṣṇu, and the Maruts do not overlook the sacrificer. It is a way of securing welfare (svasti) from the wider circle of allied divine powers.

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