
Sukta 7.88
Vasiṣṭha
Varuṇa
Triṣṭubh
यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ् सूक्त वसिष्ठ की वरुण के प्रति अत्यन्त आत्मीय स्तुति है—उन्हें व्यापक, पूज्य, और ऋत (विश्व-व्यवस्था) के धारक तथा बन्धनों को कृपापूर्वक छुड़ाने वाले के रूप में स्मरित करता है। इसमें द्रष्टा पर वरुण के विशेष अनुग्रह का स्मरण है—उसे “नौका में” बैठाना और उसे ऋषि बनाना—और अंत में प्रार्थना है कि वरुण पाप के बन्धन ढीले करें तथा आदित्य उपासकों की स्थायी कल्याण-रक्षा करें।
Mantra 1
प्र शुन्ध्युवं वरुणाय प्रेष्ठां मतिं वसिष्ठ मीळ्हुषे भरस्व । य ईमर्वाञ्चं करते यजत्रं सहस्रामघं वृषणं बृहन्तम् ॥
हे वसिष्ठ, वरुण के लिए—उस कृपालु दाता के लिए—सबसे प्रिय, शुद्धतम मति (भाव/विचार) को आगे लाओ। वही यज्ञ-बल को हमारी ओर मोड़ देता है; वह यजत्र (पूज्य) है—सहस्र-समृद्धि वाला, वृषभ (बलवान्) और बृहन्त (विराट्)।
Mantra 2
अधा न्वस्य संदृशं जगन्वानग्नेरनीकं वरुणस्य मंसि । स्वर्यदश्मन्नधिपा उ अन्धोऽभि मा वपुर्दृशये निनीयात् ॥
तब मैं उसके दर्शन को देखने गया—वरुण के मन में स्थित अग्नि का मुख। जब सूर्य उस शिला पर स्थापित हो, तब अन्धा अँधेरा मेरे रूप को दर्शन से दूर न खींच ले; मेरा अस्तित्व प्रकाशाभिमुख बना रहे।
Mantra 3
आ यद्रुहाव वरुणश्च नावं प्र यत्समुद्रमीरयाव मध्यम् । अधि यदपां स्नुभिश्चराव प्र प्रेङ्ख ईङ्खयावहै शुभे कम् ॥
जब वरुण और मैं नाव पर चढ़े, जब हमने समुद्र को उसके मध्य में गति दी, जब हम जलों की उफनती धाराओं पर विचरे—तब आगे झूलती आसंदी पर हम शुभ आनन्द के लिए झूलते-डोलते रहे।
Mantra 4
वसिष्ठं ह वरुणो नाव्याधादृषिं चकार स्वपा महोभिः । स्तोतारं विप्रः सुदिनत्वे अह्नां यान्नु द्यावस्ततनन्यादुषासः ॥
वरुण ने वसिष्ठ को नाव में बिठाया और अपने महान कर्मों से उसे ऋषि—सुकर्मा—बना दिया। वह विप्र स्तोता बन गया—उजले दिनों के लिए, उन विस्तारों के लिए जिन्हें द्यौः फैलाती है, और उन उषाओं के लिए जो निरन्तर आती रहती हैं।
Mantra 5
क्व त्यानि नौ सख्या बभूवुः सचावहे यदवृकं पुरा चित् । बृहन्तं मानं वरुण स्वधावः सहस्रद्वारं जगमा गृहं ते ॥
अब वे हमारे वे प्राचीन सख्य कहाँ हैं, जब हम एकत्व में साथ-साथ चले थे, और बहुत पहले भी उस अवृक—अहिंस, अनिष्ट-रहित—विस्तार में प्रविष्ट हुए थे? हे वरुण, स्वधावन्, मैं तेरे सहस्र-द्वार वाले विशाल गृह में फिर आया हूँ—वह व्यापक ऋत् मुझे स्वीकार करे।
Mantra 6
य आपिर्नित्यो वरुण प्रियः सन्त्वामागांसि कृणवत्सखा ते । मा त एनस्वन्तो यक्षिन्भुजेम यन्धि ष्मा विप्रः स्तुवते वरूथम् ॥
हे वरुण, जो तेरा नित्य आपि—अन्तरंग—और तुझे प्रिय है, वह तेरे सखा होकर भी तेरे विरुद्ध अपराध रच बैठा हो; हे यजनीय, हम पाप के फल का भोग न करें। स्तुति करने वाले विप्र को, निश्चय ही, तू रक्षात्मक वरूथ प्रदान कर।
Mantra 7
ध्रुवासु त्वासु क्षितिषु क्षियन्तो व्यस्मत्पाशं वरुणो मुमोचत् । अवो वन्वाना अदितेरुपस्थाद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
तेरे ध्रुव आवासों में वास करते, उन सुव्यवस्थित लोकों में स्थित रहते हुए, वरुण ने हमारे ऊपर से पाश को खोल दिया। अदिति की गोद से पोषणकारी सहायता की याचना करते हुए—हे देवशक्तियो, तुम सदा स्वस्तियों से हमारी रक्षा करो।
It praises Varuṇa as the upholder of cosmic and moral order (ṛta) and asks him to turn graciously toward the worshipper, forgive faults, and loosen the bonds that come from wrongdoing.
It is a poetic memory of divine protection and initiation: Varuṇa guides and ‘carries’ the seer, making him an ṛṣi and enabling inspired praise and right action.
The pāśa is Varuṇa’s noose that restrains disorder and sin; in prayer it also symbolizes inner and outer constraints. The hymn asks for its loosening through returning to truth and seeking Aditi’s shelter for well-being.
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