
Sukta 7.87
Vasiṣṭha (traditional for RV 7.87)
Varuṇa
Triṣṭubh
वसिष्ठ द्वारा उच्चरित यह वरुण-स्तुति देव को ऋत का धारक बताती है—जिसने सूर्य के पथ को रेखांकित किया और नदियों को नियत, सुव्यवस्थित धाराओं में प्रवाहित किया। स्तुति विश्व-शासन से आगे बढ़कर गूढ़ उपदेश तक पहुँचती है: वरुण ‘अभेद्य गौ’ के रक्षित रहस्य और वाणी के छिपे हुए पद-चिह्न का उद्घाटन करता है। अंत में यह अदिति के नियमों के अधीन करुणा, निर्दोषता और दीर्घकालिक कल्याण की याचना पर समाप्त होती है।
Mantra 1
रदत्पथो वरुणः सूर्याय प्रार्णांसि समुद्रिया नदीनाम् । सर्गो न सृष्टो अर्वतीॠतायञ्चकार महीरवनीरहभ्यः ॥
वरुण ने सूर्य के लिए पथों को तराशा; समुद्रगामी नदियों की धाराओं को प्रवाहित किया। जैसे छोड़ा हुआ सर्ग (प्रवाह) छूट पड़ता है, वैसे उसने ऋत के अनुसार बहती जलधाराओं को चलाया; और दिनों के लिए महान् पृथ्वी-क्षेत्रों को रचा—ताकि जीवन क्रमबद्ध विस्तार में चले।
Mantra 2
आत्मा ते वातो रज आ नवीनोत्पशुर्न भूर्णिर्यवसे ससवान् । अन्तर्मही बृहती रोदसीमे विश्वा ते धाम वरुण प्रियाणि ॥
हे वरुण! तुम्हारा आत्मा ही वायु (प्राण) बनकर रजः—मध्यलोकों—को नूतन करता है; जैसे तीव्र, विचरता बल, वह हमारे अन्तर-पशुचर (अन्तः-चरागाह) की वृद्धि के लिए वेग से दौड़ता है। इन दो विशाल लोकों—पृथ्वी और द्यौ—के भीतर तुम्हारे सब प्रिय धाम स्थित हैं, जहाँ ऋत का विधान है और आत्मा निवास कर सकती है।
Mantra 3
परि स्पशो वरुणस्य स्मदिष्टा उभे पश्यन्ति रोदसी सुमेके । ऋतावानः कवयो यज्ञधीराः प्रचेतसो य इषयन्त मन्म ॥
वरुण के सर्वत्र व्याप्त, अत्यन्त सजग स्पश (निगरानी करने वाले) दोनों लोकों—द्यावा और पृथ्वी—को उनके सुन्दर विधान में देखते हैं। ऋत से परिपूर्ण, यज्ञ में धीर-प्रज्ञ कवि, प्रचेतस जन, हमारे भीतर सत्य की ओर प्रेरित करने वाला प्रेरित मन (मन्म) जगाते हैं।
Mantra 4
उवाच मे वरुणो मेधिराय त्रिः सप्त नामाघ्न्या बिभर्ति । विद्वान्पदस्य गुह्या न वोचद्युगाय विप्र उपराय शिक्षन् ॥
मेध (स्पष्ट बुद्धि) की खोज करने वाले मुझसे वरुण ने कहा: ‘अघ्न्या—अवध्य गौ—त्रिः सप्त नाम धारण करती है।’ वाणी के पद (चरण) का गुह्य रहस्य जानकर भी उसने उसे खुलकर न कहा—युगों के लिए, परे के तट (उपर) की समझ हेतु, विप्र को शिक्षा देते हुए।
Mantra 5
तिस्रो द्यावो निहिता अन्तरस्मिन्तिस्रो भूमीरुपराः षड्विधानाः । गृत्सो राजा वरुणश्चक्र एतं दिवि प्रेङ्खं हिरण्ययं शुभे कम् ॥
इस अन्तर में तीन द्यौ स्थापित हैं, और तीन भूमियाँ ऊपर की आधार-भूमि के रूप में—लोकों की षड्विधान व्यवस्था। गृत्स (कुशल) राजा वरुण ने, कर्ता-दीप्तिमान होकर, दिवि में आत्मा के शुभ आनन्द हेतु स्वर्णिम झूलता आसन रचा है।
Mantra 6
अव सिन्धुं वरुणो द्यौरिव स्थाद्द्रप्सो न श्वेतो मृगस्तुविष्मान् । गम्भीरशंसो रजसो विमानः सुपारक्षत्रः सतो अस्य राजा ॥
वरुण महान् सिन्धु के ऊपर, मानो स्वयं द्यौ (आकाश) की भाँति, स्थित हैं—श्वेत बिन्दु (द्रप्स) के समान, तेजस्वी और अत्यन्त बलवान्, चलायमान मृग-सा। उनका वचन गम्भीर है; वे रजस् (मध्य-लोकों) का मापन करते हैं। सुदृढ़ और दूरगामी रक्षण-शक्ति वाले, वे इस सत् (अस्तित्व) के राजा हैं—ऋत के रक्षक।
Mantra 7
यो मृळयाति चक्रुषे चिदागो वयं स्याम वरुणे अनागाः । अनु व्रतान्यदितेॠधन्तो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
जो कृत-अपराधी पर भी दया करता है—हे वरुण, हम निरपराध (अनागाः) हो जाएँ। अदिति के व्रतों के अनुसार बढ़ते हुए, व्यापकता के अनुरूप, आप हमें सदा स्वस्ति (कल्याण) के साथ रक्षित करें।
It presents Varuṇa as the power that keeps the universe and human life in right order (ṛta), and it asks him to forgive faults and protect the worshipper with lasting well-being (svasti).
These are signs of ṛta in nature: Varuṇa is praised as the one who sets stable courses—Sun moving on its track and waters moving in lawful channels—showing his governance of order.
It is an esoteric teaching: the ‘inviolate Cow’ often symbolizes sacred speech, light, or nourishing abundance, and “thrice seven” hints at a structured, hidden set of names/levels that Varuṇa reveals only indirectly to the seer.
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