
Sukta 7.82
Vasiṣṭha
Indra-Varuṇa
Triṣṭubh
वसिष्ठ का यह सूक्त इन्द्र–वरुण की युगल सार्वभौमता का आह्वान करता है, ताकि यज्ञ, जन और समुदाय को “महि शर्म” (विशाल संरक्षण) प्राप्त हो और निरन्तर बने रहने वाले शत्रुओं पर विजय सुनिश्चित हो। इसमें युद्ध-बल (इन्द्र) और नैतिक–ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (वरुण) के बीच क्रमशः स्वर बदलते हुए, उनके सहयोग को स्थिरता, वृद्धि और धर्मसम्मत शासन का आधार बताया गया है। अंत में प्रार्थना का विस्तार आदित्य-मण्डल (मित्र, अर्यमन्, अदिति) और सविता तक होता है, और ऋत को धारण करने वाले अखण्ड प्रकाश की याचना की जाती है।
Mantra 1
इन्द्रावरुणा युवमध्वराय नो विशे जनाय महि शर्म यच्छतम् । दीर्घप्रयज्युमति यो वनुष्यति वयं जयेम पृतनासु दूढ्यः ॥
हे इन्द्र-वरुण! तुम दोनों हमारे अध्वर (यज्ञ) के लिए, हमारे जन और विश (समुदाय) के लिए, महान् शर्म (शान्ति-रक्षा) प्रदान करो। जो दीर्घप्रयज्यु (दीर्घकालीन विरोधी) हमारे विरुद्ध प्रयत्न करता है, उसे जीतकर—तुम्हारी धारण-शक्ति में दृढ़ होकर—हम युद्धों में विजय पाएं।
Mantra 2
सम्राळन्यः स्वराळन्य उच्यते वां महान्ताविन्द्रावरुणा महावसू । विश्वे देवासः परमे व्योमनि सं वामोजो वृषणा सं बलं दधुः ॥
तुम में से एक ‘सम्राट्’ कहलाता है, दूसरा ‘स्वराट्’; हे इन्द्र-वरुण, तुम दोनों महान हो, महावसु—महान धन-सम्पदा के दाता। परम व्योम में स्थित समस्त देवों ने, हे वृषणौ (दो बलवान वृषभों), तुम दोनों में एकत्र करके तेज और बल को स्थापित किया है।
Mantra 3
अन्वपां खान्यतृन्तमोजसा सूर्यमैरयतं दिवि प्रभुम् । इन्द्रावरुणा मदे अस्य मायिनोऽपिन्वतमपितः पिन्वतं धियः ॥
जल-धाराओं के पथ का अनुसरण करते हुए तुमने अपने ओज से नहरों/मार्गों को चीर दिया; तुमने दिवि में प्रभु-प्रकाश सूर्य को स्थापित किया। हे इन्द्र-वरुण, इस मायाविन् (शक्तिमान) के मद में तुमने गुप्त गहराई से प्रेरणाओं को उभार दिया; हमारी धियाँ (विचार-प्रेरणाएँ) भी बढ़ाओ।
Mantra 4
युवामिद्युत्सु पृतनासु वह्नयो युवां क्षेमस्य प्रसवे मितज्ञवः । ईशाना वस्व उभयस्य कारव इन्द्रावरुणा सुहवा हवामहे ॥
युद्धों और संग्रामों में अग्नि-वाहक (वह्नयः) तुम्हीं दोनों को पुकारते हैं; क्षेम (शान्ति-कल्याण) के प्रसव में मितज्ञ (माप-जानने वाले) तुम्हीं दोनों का आवाहन करते हैं। दोनों प्रकार के वसु (धन) के ईशान, कवि-गायक तुम्हें पुकारते हैं—हे इन्द्र-वरुण, सुहवा (सहज आह्वेय), हम तुम्हारा आवाहन करते हैं।
Mantra 5
इन्द्रावरुणा यदिमानि चक्रथुर्विश्वा जातानि भुवनस्य मज्मना । क्षेमेण मित्रो वरुणं दुवस्यति मरुद्भिरुग्रः शुभमन्य ईयते ॥
हे इन्द्र–वरुण! यदि तुमने अपने विशाल महिमामय बल से जगत् के ये समस्त जन्मे हुए (समस्त भूत-भव) रचे हैं—तो क्षेम (शान्ति) के द्वारा मित्र, वरुण की सेवा करता है; और दूसरा, उग्र (इन्द्र), मरुतों के साथ शुभ-प्रकाशमय कल्याण की ओर अग्रसर होता है।
Mantra 6
महे शुल्काय वरुणस्य नु त्विष ओजो मिमाते ध्रुवमस्य यत्स्वम् । अजामिमन्यः श्नथयन्तमातिरद्दभ्रेभिरन्यः प्र वृणोति भूयसः ॥
अब वरुण के महान तेज के लिए उसका स्थिर, स्वकीय ओजस् दीप्ति में अपना माप (प्रमाण) प्रकट करता है। दूसरा उस अडिग/न झुकने वाले को आघात कर गिरा देता है; और दूसरा अल्प से अधिकतर वृद्धि को चुन लेता है।
Mantra 7
न तमंहो न दुरितानि मर्त्यमिन्द्रावरुणा न तपः कुतश्चन । यस्य देवा गच्छथो वीथो अध्वरं न तं मर्तस्य नशते परिह्वृतिः ॥
हे इन्द्र–वरुण! किसी भी ओर से न तो क्लेश, न दुरित, न दाहकारी तप (पीड़ा) उस मर्त्य को स्पर्श कर सकता है—जिसके साथ, हे देवो, तुम यज्ञ-पथ पर संग-साथ चलते हो। उस मर्त्य को परिह्वृति (घेरने वाली विकृति/विघ्न) नहीं पकड़ पाती।
Mantra 8
अर्वाङ्नरा दैव्येनावसा गतं शृणुतं हवं यदि मे जुजोषथः । युवोर्हि सख्यमुत वा यदाप्यं मार्डीकमिन्द्रावरुणा नि यच्छतम् ॥
हे दिव्य वीरों (इन्द्र–वरुण), अपने दैवी सहारे से हमारी ओर आओ; यदि तुम प्रसन्न होकर स्वीकार करो तो मेरी पुकार सुनो। क्योंकि मित्रता तुम्हारी ही है, और जल से उत्पन्न करुणा/अनुग्रह भी तुम्हारा ही—हे इन्द्रावरुण, उस आरोग्यकारी कृपा को हमारे भीतर स्थापित करो।
Mantra 9
अस्माकमिन्द्रावरुणा भरेभरे पुरोयोधा भवतं कृष्ट्योजसा । यद्वां हवन्त उभये अध स्पृधि नरस्तोकस्य तनयस्य सातिषु ॥
हे इन्द्रावरुण, प्रत्येक संघर्ष/आक्रमण में जन-बल से समर्थ होकर हमारे अग्र-योद्धा बनो। जब दोनों पक्ष तुम्हें पुकारें, तब हे वीरों, हमारे बालक और संतति की विजय-प्राप्तियों में हमारे लिए जीत दिलाओ।
Mantra 10
अस्मे इन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा द्युम्नं यच्छन्तु महि शर्म सप्रथः । अवध्रं ज्योतिरदितेॠतावृधो देवस्य श्लोकं सवितुर्मनामहे ॥
हममें इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा तेजस्वी द्युम्न और महान, विस्तीर्ण शान्ति/आश्रय स्थापित करें। हम अदिति के अविच्छिन्न प्रकाश को धारण करना चाहते हैं—ऋत को बढ़ाने वाले—और हम सविता देव के उस दिव्य श्लोक/यश का मनन करते हैं जो मन को सत्य की ओर जगाता है।
They are a paired form of sovereignty: Indra represents conquering power and protection, while Varuṇa represents Ṛta (cosmic and moral order). Together they grant security that is both strong and lawful.
The hymn repeatedly asks for “mahi śarma” (vast shelter/peace) for the sacrifice and the community, and for success against adversaries—so welfare and victory are established under Ṛta.
It widens the prayer from immediate protection to a universal foundation: social harmony (Mitra), noble order (Aryaman), Aditi’s unbroken light, and Savitṛ’s awakening impulse—so prosperity is rooted in truth and right order.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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