
Sukta 7.81
Vasiṣṭha
Uṣas
Gāyatrī (likely; RV 7.81 often in gāyatrī-like trimeter)
वसिष्ठ का यह संक्षिप्त उषस्‑सूक्त उषा के तात्कालिक प्राकट्य का स्तवन करता है: वह “हमारी आँखों के सामने” आती है, जलों को और दृष्टि‑क्षेत्र को फैलाती है, और रात्रि के अंधकार को प्रकाशमय व्यवस्था में बदल देती है। कवि प्रार्थना करता है कि उसका कृपालु उदय हमें दीप्तिमान जगत् का स्पष्ट बोध दे, उसके “निधियों” (समृद्धि, बल, यश) में भाग प्रदान करे, और वक्रता, विफलता तथा अंतःस्थ बाधाओं को दूर कर दे।
Mantra 1
प्रत्यु अदर्श्यायत्युच्छन्ती दुहिता दिवः । अपो महि व्ययति चक्षसे तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी ॥
वह हमारे सम्मुख प्रकट हुई है—आती हुई, उदित होती हुई—दिवः दुहिता, स्वर्ग की पुत्री। वह दर्शन के लिए महत् आपः—महान जलों—को फैलाती है; और सूनरी—दीप्त प्रेरिका—तम को ज्योति में रूपान्तरित करती है।
Mantra 2
उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचाँ उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत् । तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि ॥
उदित होता हुआ सूर्य प्रकाश-रूपी उज्ज्वल धेनुओं को छोड़ता है और नक्षत्रों की अर्चिमय दीप्ति को भी प्रकट करता है। पर हे उषा, तेरे ही व्युष्टि-प्रकाश से और सूर्य के पूर्ण उदय से हम अपने नियत भाग (भक्त) के साथ मिलकर आगे बढ़ें।
Mantra 3
प्रति त्वा दुहितर्दिव उषो जीरा अभुत्स्महि । या वहसि पुरु स्पार्हं वनन्वति रत्नं न दाशुषे मयः ॥
हे दिवः-दुहिता उषा, तेरी ओर हम आकांक्षा में शीघ्रगामी हुए हैं। क्योंकि तू दाशुष (दानकर्ता/यजमान) के लिए—जो अर्पण करता है—बहुत-सा स्पृहणीय आनंद, मानो रत्न-निधि, वहन करती है।
Mantra 4
उच्छन्ती या कृणोषि मंहना महि प्रख्यै देवि स्वर्दृशे । तस्यास्ते रत्नभाज ईमहे वयं स्याम मातुर्न सूनवः ॥
हे देवी, जब तू उच्छन्ती (उदयमान) होती है, तब अपनी उदार महत्ता से स्वः (स्वर्गीय प्रकाश) के स्पष्ट दर्शन को सिद्ध करती है। उस तेरे रत्न के हम भागी हों; हम माता के पुत्रों के समान हों—उसके प्रकाश-पोषण में जन्मे।
Mantra 5
तच्चित्रं राध आ भरोषो यद्दीर्घश्रुत्तमम् । यत्ते दिवो दुहितर्मर्तभोजनं तद्रास्व भुनजामहै ॥
हे उषा! वह अद्भुत राधस् (समृद्धि) हमारे पास ले आ—जो दीर्घकाल से सर्वाधिक श्रुत-कीर्तित है। हे दिवो-दुहितर! जो भी तेरा मर्त्य-भोजन (मनुष्यों के लिए पोषण) है, वही हमें दे, ताकि हम उसे भोगें और उससे पुष्ट हों।
Mantra 6
श्रवः सूरिभ्यो अमृतं वसुत्वनं वाजाँ अस्मभ्यं गोमतः । चोदयित्री मघोनः सूनृतावत्युषा उच्छदप स्रिधः ॥
ऋषियों के लिए अमृत-सा श्रवस् (यश) और वसु-त्वन (समृद्धि का भाव) दे; और हमारे लिए भी गोमत् (प्रकाश-रश्मियों से युक्त) वाज (बलवान् लाभ) प्रदान कर। हे मघवन्-प्रेरयित्री, सूनृता (उज्ज्वल सत्य-वाणी) से युक्त उषा! तू उदित हो और टेढ़ेपन तथा विफलताओं (स्रिधः) को दूर हटा।
Uṣas is Dawn, praised as the “Daughter of Heaven” who arrives each morning, reveals the world for sight, and replaces darkness with light.
It asks for clear perception of the radiant world, a share in Dawn’s treasures (prosperity and strength), and “immortal fame,” along with the removal of obstacles and failure.
At dawn—before and during sunrise—because the hymn is built around the lived moment of light appearing and the mind awakening into clarity.
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