
Sukta 7.77
Vasiṣṭha
Uṣas (with Agni as co-present power of kindling)
Triṣṭubh (probable; needs verification)
वसिष्ठ का यह संक्षिप्त उषस्‑सूक्त प्रभात को उस तेजस्वी, नवयौवना शक्ति के रूप में स्तुत करता है जो गति, जीवन और नवीकृत ऋत (व्यवस्था) को जगाती है तथा मनुष्यों के कर्म के लिए विस्तृत और सुरक्षित पथ खोलती है। उषा का उदय अग्नि के प्रज्वलन से अविभाज्य है—ज्यों‑ज्यों प्रकाश फैलता है, तम दूर होता है और यजमान धन (रयि), रक्षा और कल्याण की ओर अग्रसर होता है।
Mantra 1
उपो रुरुचे युवतिर्न योषा विश्वं जीवं प्रसुवन्ती चरायै । अभूदग्निः समिधे मानुषाणामकर्ज्योतिर्बाधमाना तमांसि ॥
उषा युवा नारी के समान प्रकाशित हुई है, समस्त जीवों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हुई। मनुष्यों के लिए समिधा में अग्नि प्रकट होता है; वह ज्योति रचता है, अंधकारों को दूर भगाता है।
Mantra 2
विश्वं प्रतीची सप्रथा उदस्थाद्रुशद्वासो बिभ्रती शुक्रमश्वैत् । हिरण्यवर्णा सुदृशीकसंदृग्गवां माता नेत्र्यह्नामरोचि ॥
वह हमारी ओर उन्मुख होकर, सर्वत्र व्यापक रूप से उठ खड़ी हुई है; चमकता, उज्ज्वल-श्वेत वस्त्र धारण किए हुए। स्वर्णवर्णा, दर्शनीय, सुन्दर दृष्टि वाली—वह किरणों की माता और दिनों की नेत्री—प्रकाशित हुई है।
Mantra 3
देवानां चक्षुः सुभगा वहन्ती श्वेतं नयन्ती सुदृशीकमश्वम् । उषा अदर्शि रश्मिभिर्व्यक्ता चित्रामघा विश्वमनु प्रभूता ॥
देवों की आँख-सी, सौभाग्यवती उषा श्वेत, सुदर्शी अश्व को आगे ले चलती है। उषा दर्शन देती है—उसकी रश्मियाँ स्पष्ट रूप से फैल जाती हैं; विचित्र दानों से समृद्ध, वह अपने पश्चात् आने वाले समस्त जगत् पर प्रभुता करती है।
Mantra 4
अन्तिवामा दूरे अमित्रमुच्छोर्वीं गव्यूतिमभयं कृधी नः । यावय द्वेष आ भरा वसूनि चोदय राधो गृणते मघोनि ॥
हे उषा, जो निकट आहे तो तू आणतेस, आणि जो शत्रुत्वपूर्ण आहे त्याला दूर हाकलतेस—उदय हो; हमारे लिए विस्तृत ‘गव्यूति’ (प्रकाशमय खोज-पथ) और निर्भय अवकाश बना। द्वेष को दूर कर; वसु (समृद्धि-शक्तियाँ) ला, और हे मघोनि, गाने वाले के लिए राधस् (अनुग्रह/दान) को प्रवर्तित कर।
Mantra 5
अस्मे श्रेष्ठेभिर्भानुभिर्वि भाह्युषो देवि प्रतिरन्ती न आयुः । इषं च नो दधती विश्ववारे गोमदश्वावद्रथवच्च राधः ॥
हे देवी उषा, अपनी श्रेष्ठ रश्मियों से हममें प्रकाश फैला; हमारे आयुः (जीवन-बल) को अविच्छिन्न रूप से आगे बढ़ने वाली बना। हे विश्ववारे (सर्व-वांछित धन वाली), हमें इष् (प्रेरक पोषण/उत्साह) भी देती हुई, हमारे भीतर राधस् (पूर्णता/दान) स्थापित कर—गोमत् (ज्ञान-प्रकाश), अश्ववत् (बल-ऊर्जा), और रथवत् (गतिशील सामर्थ्य) से युक्त।
Mantra 6
यां त्वा दिवो दुहितर्वर्धयन्त्युषः सुजाते मतिभिर्वसिष्ठाः । सास्मासु धा रयिमृष्वं बृहन्तं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे उषा, दिवः की सुजाता दुहिता! जिस तुझे वसिष्ठजन अपनी दीप्त मति-प्रेरणाओं से बढ़ाते हैं—तू हमारे भीतर ऊँचा और विशाल रयि (समृद्धि/ऐश्वर्य) स्थापित कर। और हे देव-शक्तियो, तुम सदा स्वस्ति-भावों से हमारी रक्षा करो।
It celebrates Dawn as the power that brings light and movement to the world, and it asks her to remove darkness, hostility, and hatred while granting safety, prosperity (rayi), and well-being.
Because Dawn and Agni work together in the Vedic day: as Dawn reveals light, Agni is kindled for humans, making the sacrifice visible and effective and symbolically driving away darkness.
On the outer level it means safe passage and successful daily activity; inwardly it points to a clear, protected direction in life and practice, where negativity is pushed away and aspiration can move forward.
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