
Sukta 7.75
Vasiṣṭha
Uṣas (Dawn)
Triṣṭubh (likely; confirm by metrical count in critical edition)
इस उषा-सूक्त में वसिष्ठ उषस् की स्तुति करते हैं—वह स्वर्गजाता और ऋत-प्रेरित है; उसके प्रकट होते ही महिमा प्रकट होती है, जगत् के पथ चल पड़ते हैं और शत्रु अन्धकार दूर हो जाता है। कवि उसे सूर्य की दीप्तिमती वधू तथा धन और प्राण-बल की दात्री कहकर गाता है; फिर अंत में यजमान और यज्ञ-आसन के लिए गौएँ, घोड़े, वीर पुत्र और अखण्ड कल्याण की प्रार्थना करता है।
Mantra 1
व्युषा आवो दिविजा ऋतेनाविष्कृण्वाना महिमानमागात् । अप द्रुहस्तम आवरजुष्टमङ्गिरस्तमा पथ्या अजीगः ॥
उषा—दिविजा—ऋतेन प्रकट हुई, अपना महिमान प्रकट करती हुई। उसने द्रुह (छलकर्ता) का तम, वह अप्रिय आवरण, दूर हटा दिया; अङ्गिरस-तमा होकर उसने पथ्यों—मार्गों—को गति में जगा दिया।
Mantra 2
महे नो अद्य सुविताय बोध्युषो महे सौभगाय प्र यन्धि । चित्रं रयिं यशसं धेह्यस्मे देवि मर्तेषु मानुषि श्रवस्युम् ॥
आज हमारे लिए सुविताय—सद्गति, शुभ-प्रगति—के लिए जागो, हे उषा; महान सौभाग्य के लिए हमें आगे ले चलो। हे देवि, हमारे भीतर चित्र रयि—दीप्तिमान धन—यशस्वी—प्रतिष्ठादायक—स्थापित करो; मनुष्यों में, मर्त्यों के बीच, हमें श्रवस्यु—उच्च श्रवण/प्रेरित कीर्ति के अभिलाषी—बनाओ।
Mantra 3
एते त्ये भानवो दर्शतायाश्चित्रा उषसो अमृतास आगुः । जनयन्तो दैव्यानि व्रतान्यापृणन्तो अन्तरिक्षा व्यस्थुः ॥
ये दर्शनीय उषा की ये उज्ज्वल, विचित्र, अमृत किरणें आ पहुँची हैं। दैवी व्रतों (नियमों) को जन्म देती हुई, अन्तरिक्ष को भरती हुई, वे दूर-दूर अपने-अपने स्थानों पर स्थित हो गईं।
Mantra 4
एषा स्या युजाना पराकात्पञ्च क्षितीः परि सद्यो जिगाति । अभिपश्यन्ती वयुना जनानां दिवो दुहिता भुवनस्य पत्नी ॥
यह (उषा) दूर से स्वयं को युक्त करती हुई, शीघ्र ही पाँच क्षितियों (पाँच निवास-स्थानों) को चारों ओर से घेर लेती है। जनों के वयुन (विधि/व्यवस्था) को भली-भाँति देखती हुई, वह—दिवो दुहिता, भुवन की पत्नी—गति करती है।
Mantra 5
वाजिनीवती सूर्यस्य योषा चित्रामघा राय ईशे वसूनाम् । ऋषिष्टुता जरयन्ती मघोन्युषा उच्छति वह्निभिर्गृणाना ॥
बलवती, सूर्य की युवती-वधू, विचित्र दानों से समृद्ध—वह वसुओं की रयि (सम्पदा) की अधिष्ठात्री है। ऋषियों द्वारा स्तुत, युग को नव करती हुई, दानशील उषा उठती है—वह्नियों (अग्नि-जिह्वा शक्तियों) द्वारा गाई जाती हुई।
Mantra 6
प्रति द्युतानामरुषासो अश्वाश्चित्रा अदृश्रन्नुषसं वहन्तः । याति शुभ्रा विश्वपिशा रथेन दधाति रत्नं विधते जनाय ॥
ऊँचे लोकों के तेज के प्रति अरुण, चित्र-वर्ण अश्व प्रकट हुए, उषा को वहन करते हुए। वह शुभ्रा, विश्व-पिशा (सर्वालंकार-युक्त) रथ पर आती है; वह विधाता (यज्ञकर्ता) जन के लिए रत्न-धन धारण करती है—उस मनुष्य के लिए जो ऋत (सत्य-धर्म) की सेवा को तत्पर है।
Mantra 7
सत्या सत्येभिर्महती महद्भिर्देवी देवेभिर्यजता यजत्रैः । रुजद्दृळ्हानि दददुस्रियाणां प्रति गाव उषसं वावशन्त ॥
सत्य के साथ सत्य, महान के साथ महान—देवी, यज्य देवों के साथ यज्य है। दृढ़ बंधनों को तोड़ती हुई, उष्रिया (दीप्त किरणों) को देती हुई, प्रकाश की गौएँ उषा के प्रति रंभाती हैं।
Mantra 8
नू नो गोमद्वीरवद्धेहि रत्नमुषो अश्वावत्पुरुभोजो अस्मे । मा नो बर्हिः पुरुषता निदे कर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
अब हमारे भीतर गो-समृद्ध, वीर-समृद्ध रत्न रख दे, हे उषा—अश्व-समृद्ध, हमारे लिए बहु-भोग (विस्तृत आनंद) देने वाला। कोई भी हमारे बर्हि (यज्ञ-आसन) को निंदा का कारण न बनाए; तुम सदा स्वस्ति-रूप कल्याणों से हमारी रक्षा करो।
It praises Uṣas (Dawn) as the truthful light that appears by ṛta, removes darkness, awakens life and activity, and brings prosperity and protection to the worshipper.
Because Dawn’s regular return is a visible sign of cosmic order: her light reveals things as they are, restores right orientation, and drives away the confusion symbolized by darkness.
The poet asks for a treasure rich in cattle, horses, and heroic offspring, and prays that the ritual seat (barhis) remain free from blame while Uṣas grants constant svasti (well-being).
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