
Sukta 7.66
Vasiṣṭha
Mitra–Varuṇa
Likely Anuṣṭubh or a short meter segment (needs metrical audit; verse is shorter than typical Triṣṭubh)
वसिष्ठ का यह सूक्त मित्र–वरुण की स्तुति करता है—वे युगल आदित्य हैं जो सत्य, नियम और सतर्क शासन के द्वारा ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) को धारण करते हैं। इसमें उनसे प्रार्थना की गई है कि वे हवि-आहुतियाँ स्वीकार करें, सुमति/सद्बुद्धि को दृढ़ करें, और उपासकों को संरक्षण, स्थैर्य तथा समाज में सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था प्रदान करें। सूक्त श्रद्धापूर्ण स्तवन से आगे बढ़कर ऋत-पालक शक्तियों के सजीव चित्र प्रस्तुत करता है और अंत में उन्हें स्पष्ट रूप से आमंत्रित करता है कि वे आएँ और सोमपान करें।
Mantra 1
प्र मित्रयोर्वरुणयोः स्तोमो न एतु शूष्यः । नमस्वान्तुविजातयोः ॥
हमारा स्तोत्र मित्र और वरुण के पास अग्रसर हो—बल से परिपुष्ट, तेजस्वी; और नमस्कार वहन करता हुआ उन दोनों विशाल-जन्मा शक्तियों तक पहुँचे।
Mantra 2
या धारयन्त देवाः सुदक्षा दक्षपितरा । असुर्याय प्रमहसा ॥
वे—देव, सुदक्ष, दक्ष को पिता मानने वाले—असुर्य (सार्वभौम) शक्ति और अतिशय महिमा के द्वारा धारण करते हैं।
Mantra 3
ता नः स्तिपा तनूपा वरुण जरितॄणाम् । मित्र साधयतं धियः ॥
हे मित्र-वरुण! हमारे चरणों के रक्षक, हमारे तनू-पालक—हे वरुण, स्तोताओं के; हे मित्र! हमारी धियों (विचार-प्रेरणाओं) को सिद्ध करो, उन्हें सम्यक् करो।
Mantra 4
यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा । सुवाति सविता भगः ॥
जब आज सूर्य के उदय होते ही, मित्र और अर्यमन् निर्दोष हों, तब सविता और भग उचित दान-उपहारों को प्रसवित करते, प्रेरित करते हैं।
Mantra 5
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः । ये नो अंहोऽतिपिप्रति ॥
हमारा वह क्षय (निवास-धाम) सुप्रवीर हो—वीर-ऊर्जाओं से समृद्ध। अब तो सुदानव (सुदानी) हमें आगे ले चलें—वे जो हमें दबाने वाले अंहस् (संकट/अपराध) के पार पहुँचा देते हैं।
Mantra 6
उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये । महो राजान ईशते ॥
और स्व-सम्राज्ञी अदिति—अदब्ध (अपराजेय) व्रत की व्यापक, मुक्त-विशालता—जिसके द्वारा वे महा-राजा अपना ऐश्वर्य चलाते हैं।
Mantra 7
प्रति वां सूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम् । अर्यमणं रिशादसम् ॥
सूर्य के उदय होते ही मैं तुम्हें स्तुति से प्रत्युत्तर देता हूँ—मित्र, वरुण और अर्यमन् (रिशादस्), शत्रु-पीड़ा के संहारक—कि हमारे भीतर का प्रकाश ऋत के विधान से मिले।
Mantra 8
राया हिरण्यया मतिरियमवृकाय शवसे । इयं विप्रा मेधसातये ॥
यह मति स्वर्णमयी राया है—अवृक (अविभाजित, अविभ्रंश) श्वस के बल के लिए; यह विप्र-वाणी मेधासाति, अर्थात् दीप्त बुद्धि की प्राप्ति के लिए है।
Mantra 9
ते स्याम देव वरुण ते मित्र सूरिभिः सह । इषं स्वश्च धीमहि ॥
हे देव वरुण, हम तुम्हारे ही हों; हे मित्र, हम तुम्हारे ही हों—सूरिभिः (प्रकाशद्रष्टा ऋषियों) के साथ। हम इष् (पोषक शक्ति) और स्वः (विस्तृत दिव्य लोक/चेतना-आकाश) को धारण करें।
Mantra 10
बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः । त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः ॥
बहुत-से हैं जो सूर्य-चक्षु हैं, जिनकी जिह्वा अग्नि है, जो ऋत से वर्धित होते हैं। वे धीतियों से तीनों विदथों (यज्ञ-सभाओं) को व्यवस्थित करते हैं, और परिभूतियों (समग्र प्रभुत्व/अधिकार) से सबको परिग्रहीत करते हैं।
Mantra 11
वि ये दधुः शरदं मासमादहर्यज्ञमक्तुं चादृचम् । अनाप्यं वरुणो मित्रो अर्यमा क्षत्रं राजान आशत ॥
जिन्होंने संवत्सर और मास, दिन, यज्ञ, रात्रि और ऋच् (मंत्र) को क्रम में स्थापित किया—वे राजा वरुण, मित्र और अर्यमा ने अनाप्य (अजेय/अप्राप्य) क्षत्र (सार्वभौम प्रभुत्व) को प्राप्त किया।
Mantra 12
तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते । यदोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः ॥
आज हम उदित होते सूर्य के समय सुगठित सूक्तों से उसी का स्मरण करते हैं—कि वरुण, मित्र और अर्यमन् हमें आगे वहन करते हैं; हे ऋत के रथी, तुम।
Mantra 13
ऋतावान ऋतजाता ऋतावृधो घोरासो अनृतद्विषः । तेषां वः सुम्ने सुच्छर्दिष्टमे नरः स्याम ये च सूरयः ॥
ऋतवान, ऋतजात, ऋतवृद्ध—अनृत के प्रति घोर, असत्यद्वेषी—उनके परम सुखद सुम्न और सर्वाधिक आश्रयदायी रक्षण में, हे नरः, हम रहें—हम भी और वे प्रकाशमान नायक भी।
Mantra 14
उदु त्यद्दर्शतं वपुर्दिव एति प्रतिह्वरे । यदीमाशुर्वहति देव एतशो विश्वस्मै चक्षसे अरम् ॥
उदित होता है वह दर्शनीय रूप; वह दिव्य आह्वान के प्रत्युत्तर में चलता है—जब देव एतश, शीघ्रगामी, उसे वहन करता है, जो समस्त के दर्शन हेतु तत्पर किया गया है।
Mantra 15
शीर्ष्णःशीर्ष्णो जगतस्तस्थुषस्पतिं समया विश्वमा रजः । सप्त स्वसारः सुविताय सूर्यं वहन्ति हरितो रथे ॥
शिखर से शिखर तक वे उस स्वामी को धारण करते हैं जो चलने‑फिरने वाले और स्थिर—समस्त जगत् का अधिपति है; एक ही समवेत लय में वे समूचे प्रकाशमय रजस् को पार करते हैं। सात स्वसा‑शक्तियाँ सुवित (कल्याणमय गमन) के लिए सूर्य को वहन करती हैं; हरित (हरि) अश्व रथ में जुते हैं।
Mantra 16
तच्चक्षुर्देवहितं शुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् ॥
वह देवों द्वारा स्थापित चक्षु—शुक्र (दीप्त) —ऊपर उठता है। हम सौ शरद् देखें; हम सौ शरद् जिएँ।
Mantra 17
काव्येभिरदाभ्या यातं वरुण द्युमत् । मित्रश्च सोमपीतये ॥
काव्य (ऋषि‑प्रेरित) अदा॒भ्य शक्तियों के साथ आओ, हे वरुण, द्युमत् (दीप्तिमान) होकर। सोमपान के लिए मित्र भी (साथ) आए।
Mantra 18
दिवो धामभिर्वरुण मित्रश्चा यातमद्रुहा । पिबतं सोममातुजी ॥
हे वरुण! और मित्र भी—हे अद्रुह (अविश्वासी-नहीं, द्रोह-रहित) देवो—दिव्य धामों/लोक-स्थानों सहित यहाँ आओ। वेग से प्रेरित करने वाले सोम का पान करो।
Mantra 19
आ यातं मित्रावरुणा जुषाणावाहुतिं नरा । पातं सोममृतावृधा ॥
हे मित्रावरुण! हवन-आहुति में प्रसन्न होते हुए—हे वीर/बलवानो—यहाँ आओ। ऋत को बढ़ाने वाले तुम सोम का पान करो।
They are twin Ādityas: Mitra represents harmony and right relationship, while Varuṇa represents moral law and binding truth. Together they protect order (ṛta) in the cosmos and society.
The hymn asks Mitra–Varuṇa to come to the sacrifice, accept the offerings, strengthen ṛta and truthful conduct, and grant protection and stability to the worshippers.
It can be recited in a simple fire offering or prayer as a vow of truthfulness and harmony—invoking Mitra–Varuṇa for ethical clarity, steadiness of mind, and protection of one’s commitments.
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