Rig Veda Sukta 63
Mandala 7Sukta 636 Mantras

Sukta 63

Sukta 7.63

Rishi

Vasiṣṭha (Vasiṣṭha-gotra; Mandala 7 attribution)

Devata

Sūrya/Savitṛ in association with Mitra–Varuṇa (solar vision as their 'eye')

Chandas

Triṣṭubh (11-syllable pādas; typical of Mandala 7 hymns)

वसिष्ठ का यह छह-ऋचा त्रिष्टुभ सूक्त सूर्य/सवितृ के उदय का स्तवन करता है—वह सर्वव्यापी, सर्वदर्शी प्रकाश है जो छिपे अन्धकार को प्रकट कर दूर करता है, जिससे मानव कर्म और ऋत (सही व्यवस्था) प्रवर्तित होते हैं। सूर्य को मित्र–वरुण का “नेत्र” कहा गया है, जिससे सौर-दृष्टि का संबंध आदित्य-राजत्व, सत्य और नैतिक स्पष्टता से जुड़ता है। अंत में सूक्त मित्र, वरुण और अर्यमन् से विस्तृत अवकाश, सुरक्षित पथ और स्थायी कल्याण की प्रार्थना करता है।

Mantras

Mantra 1

उद्वेति सुभगो विश्वचक्षाः साधारणः सूर्यो मानुषाणाम् । चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्य देवश्चर्मेव यः समविव्यक्तमांसि ॥

उदित होता है शुभ, सर्वदर्शी सूर्य—मनुष्यों के लिए समान रूप से उपलब्ध प्रकाश-शक्ति। वह मित्र और वरुण की आँख है; और चर्म की भाँति तानकर वह छिपे हुए अंधकारों को फैलाकर प्रकट कर देता है, ताकि वे जीते जा सकें।

Mantra 2

उद्वेति प्रसवीता जनानां महान्केतुरर्णवः सूर्यस्य । समानं चक्रं पर्याविवृत्सन्यदेतशो वहति धूर्षु युक्तः ॥

उदित होता है जनों का प्रेरक, सूर्य का महान केतु—समुद्र-सा विशाल। वह उसी चक्र को बार-बार घुमाता है; और धुरों पर युक्त एतश (Etaśa) अश्व उसे आगे वहन करता है—प्रकाश-यात्रा का अटल नियम।

Mantra 3

विभ्राजमान उषसामुपस्थाद्रेभैरुदेत्यनुमद्यमानः । एष मे देवः सविता चच्छन्द यः समानं न प्रमिनाति धाम ॥

उषाओं की गोद से विभ्राजमान होकर वह उदित होता है, ऋषियों के स्तोत्र-गान के साथ, आगे बढ़ता हुआ आनंदित। यह देव सविता मेरी अभिलाषा को स्वीकार करे—वह जो प्रकाश के स्थिर धाम, उस नियत निवास, को क्षीण नहीं करता।

Mantra 4

दिवो रुक्म उरुचक्षा उदेति दूरेअर्थस्तरणिर्भ्राजमानः । नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता अयन्नर्थानि कृणवन्नपांसि ॥

दिव्य स्वर्णिम तेज, व्यापक-दृष्टि वाला, उदित होता है—दूरगामी प्रयोजन लिए, दीप्तिमान विजेता-सा। अब सचमुच सूर्य से प्रेरित होकर मनुष्य अपने-अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़ते हैं और अपने कर्म-साधन पूरे करते हैं; प्रकाश ही प्रभावी क्रिया को मुक्त करता है।

Mantra 5

यत्रा चक्रुरमृता गातुमस्मै श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः । प्रति वां सूर उदिते विधेम नमोभिर्मित्रावरुणोत हव्यैः ॥

जहाँ अमृतों (देवों) ने उसके लिए गमन-पथ रचा है, वहाँ वह उसे तीव्र वेग से उड़ते श्येन (बाज़) की भाँति अनुगमन करता है। सूर्य के उदय पर हम आप दोनों—मित्र और वरुण—की नमस्कारों और हवि-आहुतियों से सेवा करें; हमारे भीतर प्रकाश का सीधा मार्ग स्थापित करें।

Mantra 6

नू मित्रो वरुणो अर्यमा नस्त्मने तोकाय वरिवो दधन्तु । सुगा नो विश्वा सुपथानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

अब मित्र, वरुण और अर्यमन् हमारे लिए—हमारे अपने आत्म-स्वरूप और हमारी बढ़ती संतति के लिए—विस्तृत अवकाश और निर्बाध स्वतंत्रता स्थापित करें। हमारे सब पथ सुगम और सुपथ हों; आप सदा हमें स्वस्ति-रूप कल्याणों से रक्षित करें।

Frequently Asked Questions

It praises the rising Sun as the all-seeing light shared by everyone, which exposes hidden darkness and makes right action possible. It also links the Sun to Mitra–Varuṇa as their ‘eye’ and ends with a prayer for safe paths and protection.

Mitra and Varuṇa represent Āditya sovereignty and ṛta (truth/order). Calling the Sun their ‘eye’ means solar light is the visible power that sees, reveals, and supports truth by removing concealment.

It is well-suited for dawn recitation: contemplate inner clarity as the Sun rises, then conclude with the final verse as a prayer for good guidance, safe journeys, and steady well-being.

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