
Sukta 7.61
Vasiṣṭha
Mitra–Varuṇa (with Sūrya as their ‘eye’)
Triṣṭubh
वसिष्ठ का यह सूक्त मित्र और वरुण की स्तुति करता है—वे ऋत (विश्व-व्यवस्था) के रक्षक हैं, जिनकी सर्वदर्शी ‘आँख’ सूर्य उठकर लोकों का निरीक्षण करती है और मनुष्यों की प्रवृत्तियों को पहचानती है। यह उनके व्यापक सामर्थ्य का वर्णन करता है जो द्यावा‑पृथिवी को धारण करता है, समय के सुव्यवस्थित प्रवाह की तुलना उस संकट से करता है जो यज्ञ न करने वाले पर आता है, और अंत में प्रार्थना करता है कि हमें सब कठिन पारावारों से सुरक्षित पार करा कर स्थायी कल्याण से संरक्षित रखें।
Mantra 1
उद्वां चक्षुर्वरुण सुप्रतीकं देवयोरेति सूर्यस्ततन्वान् । अभि यो विश्वा भुवनानि चष्टे स मन्युं मर्त्येष्वा चिकेत ॥
हे वरुण! तुम्हारा चक्षु—सु-प्रतीक सूर्य—उदित होता है, देवयोर्—दो देवों—के लिए गतिमान, अपनी दीप्ति फैलाता हुआ। जो समस्त भुवनों को देखता है, वही मर्त्यों में उठते मन्यु—आवेग और कलुषित भाव—को भी जान लेता है।
Mantra 2
प्र वां स मित्रावरुणावृतावा विप्रो मन्मानि दीर्घश्रुदियर्ति । यस्य ब्रह्माणि सुक्रतू अवाथ आ यत्क्रत्वा न शरदः पृणैथे ॥
हे ऋतावान् मित्र-वरुण! आप दोनों की ओर यह विप्र अपने दीर्घश्रुत (दूर तक सुने जाने वाले) मनोभाव/मंत्र-चिन्तन को प्रवाहित करता है। जिन ब्रह्माणि (पवित्र स्तुतियाँ/मंत्र-रचनाएँ) की आप, सुक्रतु (श्रेष्ठ संकल्प वाले), रक्षा करते हैं—और जिनको आप अपने क्रत्वा (संकल्प-शक्ति) से शरदः (ऋतुओं/वर्ष-चक्र) की माप को भर देते हैं।
Mantra 3
प्रोरोर्मित्रावरुणा पृथिव्याः प्र दिव ऋष्वाद्बृहतः सुदानू । स्पशो दधाथे ओषधीषु विक्ष्वृधग्यतो अनिमिषं रक्षमाणा ॥
हे सुदानू (उदार दाता) मित्र-वरुण! विस्तीर्ण पृथ्वी से और ऊँचे, महान् दिव से आप आगे-आगे (व्याप्त होकर) प्रवर्तित हैं। आप ओषधियों में और जनों/विक्षु में अपने स्पशः (पहरेदार/द्रष्टा) स्थापित करते हैं—अपने-अपने स्थानों में पृथक्—अनिमिष (अविचल, पलक न झपकाने वाली) रक्षा करते हुए।
Mantra 4
शंसा मित्रस्य वरुणस्य धाम शुष्मो रोदसी बद्बधे महित्वा । अयन्मासा अयज्वनामवीराः प्र यज्ञमन्मा वृजनं तिराते ॥
मैं मित्र और वरुण के धाम (निवास-नियम/धर्म-आधार) का शंसन करता हूँ; उनका शुष्म (प्रबल तेज/बल) महत्त्व से रोदसी—द्यावा-पृथिवी—को आलिंगित कर चुका है। मास आगे बढ़ते हैं; पर जो अयज्वन् (यज्ञ न करने वाले), अवीराः (वीर-बल से रहित) हैं, वे यज्ञ-मन (यज्ञ-भाव) से दूर हाँके जाते हैं और वृजन (संकटमय/कठिन मार्ग) को पार कराए जाते हैं।
Mantra 5
अमूरा विश्वा वृषणाविमा वां न यासु चित्रं ददृशे न यक्षम् । द्रुहः सचन्ते अनृता जनानां न वां निण्यान्यचिते अभूवन् ॥
हे वृषणौ (मित्र-वरुण), तुम्हारे ये समस्त कर्म अमूढ़ हैं; उनमें न कोई छलपूर्ण विचित्रता दिखती है, न कोई मायिक यक्ष-प्रदर्शन। मनुष्यों के अनृत में द्रुह (द्रोह) लगती है; पर तुम्हारे निहित नियम अचेत के लिए नहीं होते।
Mantra 6
समु वां यज्ञं महयं नमोभिर्हुवे वां मित्रावरुणा सबाधः । प्र वां मन्मान्यृचसे नवानि कृतानि ब्रह्म जुजुषन्निमानि ॥
मैं नमस्कारों से तुम्हारे यज्ञ को समृद्ध करता हूँ; हे मित्रावरुण, एकाग्र आवाहन से मैं तुम्हें पुकारता हूँ। तुम्हारे स्तवन हेतु ये नूतन मनन-रचनाएँ आगे रखता हूँ; हमारे कृत ब्रह्म—ये मंत्र—तुम इन्हें स्वीकार करो।
Mantra 7
इयं देव पुरोहितिर्युवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि । विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे देवो, यह पुरोहित-शक्ति (अग्रणी प्रेरणा) यज्ञों में तुम्हारे दोनों के लिए रची गई है, हे मित्रावरुण। समस्त दुर्ग-पथों के पार हमें ले चलो; तुम सदा स्वस्तियों से हमारी रक्षा करो।
Because Sūrya’s daily rising and all-pervading light symbolize their vigilant oversight: he “sees” all worlds, and that vision stands for their ability to detect truth, disorder, and human turbulence.
That cosmic order (ṛta) is actively guarded by Mitra and Varuṇa: time moves in an ordered way, moral law is real, and those aligned with sacrifice and truth receive protection and well-being.
It can be recited at dawn or before a fire/water offering as a prayer for clarity, self-restraint, harmonious relationships, and safe passage through difficulties—ending with the request for svasti (lasting well-being).
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