
Sukta 7.60
Vasiṣṭha
Sūrya with Mitra-Varuṇa, Aryaman, Aditi (Ādityas)
Triṣṭubh (probable; needs confirmation)
वसिष्ठ का यह सूक्त उदित होते सूर्य का आवाहन करता है, जो सत्य (सत्य) की घोषणा करता है, और आदित्यों—विशेषतः मित्र–वरुण, अर्यमन् तथा अदिति—से प्रार्थना करता है कि वे उपासकों को देवपथ (देवत्रा) पर मार्गदर्शन दें। इसमें आदित्यों को ऋत/धर्म-व्यवस्था के जागरूक रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अनजाग्रत मन को भी आगे ले जाते हैं, संकटों के बीच ‘तीर्थ/उतार’ (पार-लगने का घाट) प्रदान करते हैं, और भक्त को बाधाओं से पार कराकर स्वस्ति (कल्याण) तक पहुँचाते हैं। इस सूक्त का प्रयोजन संरक्षण, सही दिशा (देवत्रा) और नैतिक तथा अस्तित्वगत ‘दुर्गों’ से सुरक्षित पारगमन है—वाणी और आचरण को ऋत/सत्य के अनुरूप करके।
Mantra 1
यदद्य सूर्य ब्रवोऽनागा उद्यन्मित्राय वरुणाय सत्यम् । वयं देवत्रादिते स्याम तव प्रियासो अर्यमन्गृणन्तः ॥
हे सूर्य, आज जब तुम उदित होकर मित्र और वरुण के लिए सत्य का उच्चारण करते हो—तो हम, देव-पथ की ओर अग्रसर, हे अदिति, तुम्हारे प्रिय बनें; और हे अर्यमन्, स्तुति-उच्चार करते हुए, तुम्हें प्रिय हों।
Mantra 2
एष स्य मित्रावरुणा नृचक्षा उभे उदेति सूर्यो अभि ज्मन् । विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च गोपा ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन् ॥
हे मित्र और वरुण! यह सूर्य—मनुष्यों को देखने वाली नेत्र-शक्ति—दोनों लोकों के ऊपर उदित होता है। जो स्थावर और जंगम समस्त जगत् का गोपा (रक्षक) है, वह मर्त्यों के बीच ऋजु (सीधा) और वृजिन (कुटिल/वक्र) दोनों को देखता है।
Mantra 3
अयुक्त सप्त हरितः सधस्थाद्या ईं वहन्ति सूर्यं घृताचीः । धामानि मित्रावरुणा युवाकुः सं यो यूथेव जनिमानि चष्टे ॥
उसने समान आसन (सधस्थ) से सात हरित (दीप्त) अश्वों को जोता है, जो घृताची (घृत-प्रभा से प्रवाहित) होकर सूर्य को वहन करते हैं। हे मित्र-वरुण! वह युवाकु (युवा) धामों को संयोजित करता है; और यूथ के नायक की भाँति जन्मों और भवों को देखता-परखता है।
Mantra 4
उद्वां पृक्षासो मधुमन्तो अस्थुरा सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णः । यस्मा आदित्या अध्वनो रदन्ति मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः ॥
तुम्हारे लिए मधुमन्त (मधुर) पृक्षास (पेय/सोम-रस) ऊपर रखे गए हैं; सूर्य शुक्ल अर्ण (उज्ज्वल प्रवाह) पर आरोहण कर गया है। उसके लिए आदित्य—मित्र, अर्यमा, वरुण—सजोषा (एकमत) होकर यात्रा-पथ को रचते/समतल करते हैं।
Mantra 5
इमे चेतारो अनृतस्य भूरेर्मित्रो अर्यमा वरुणो हि सन्ति । इम ऋतस्य वावृधुर्दुरोणे शग्मासः पुत्रा अदितेरदब्धाः ॥
ये—मित्र, अर्यमन्, वरुण—असत्य के विशाल विस्तार के विवेचक हैं। ये ही ऋत के धाम में सत्य (ऋत) को बढ़ाते हैं; अदिति के शक्तिशाली पुत्र, वे अ-दब्ध (अविश्वसनीय नहीं, अछले) हैं।
Mantra 6
इमे मित्रो वरुणो दूळभासोऽचेतसं चिच्चितयन्ति दक्षैः । अपि क्रतुं सुचेतसं वतन्तस्तिरश्चिदंहः सुपथा नयन्ति ॥
ये मित्र और वरुण, दुर्जेय, अपने दक्ष (विवेक-शक्ति) से अचेत को भी चेताते हैं। सुचेत क्रतु (प्रकाशमान संकल्प) को रचते हुए, वे सुपथ से हमें तिर्यक् अंहस्—पाप और अंतर्दुःख की वक्रता—के पार ले जाते हैं।
Mantra 7
इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्याश्चिकित्वांसो अचेतसं नयन्ति । प्रव्राजे चिन्नद्यो गाधमस्ति पारं नो अस्य विष्पितस्य पर्षन् ॥
ये द्यौ और पृथिवी के अनिमिष (अविचल जाग्रत) प्रहरी, चिकीत्वांस (ज्ञानी) हैं; वे अचेत मन को भी मार्ग पर ले आते हैं। प्रव्राज (भटकने वाले) के लिए भी जहाँ धाराएँ हों, वहाँ घाट है—वे इस संकटमय विस्तार के पार, हमें उस पार के तट तक पहुँचा दें।
Mantra 8
यद्गोपावददितिः शर्म भद्रं मित्रो यच्छन्ति वरुणः सुदासे । तस्मिन्ना तोकं तनयं दधाना मा कर्म देवहेळनं तुरासः ॥
जब रक्षक-शक्ति से युक्त अदिति, और मित्र-वरुण, सुदास को कल्याणकारी शरण (शर्म) प्रदान करते हैं—तब उसी अनुग्रह में अपने बालक और वंश-परंपरा को धारण करते हुए, हे त्वरित वीरों, हम देवों को रुष्ट करने वाला (देव-हेळन) कर्म न करें।
Mantra 9
अव वेदिं होत्राभिर्यजेत रिपः काश्चिद्वरुणध्रुतः सः । परि द्वेषोभिरर्यमा वृणक्तूरुं सुदासे वृषणा उ लोकम् ॥
वह वेदी पर होतृ-शक्तियों के साथ यज्ञ करे; ऋत-धृत वरुण जो नियम को धारण करता है, जो भी शत्रु-भंजक (रिपु) हो उसे गिरा दे। हे वृषणों, अर्यमन् द्वेषों को चारों ओर से समेटकर, सुदास के लिए विस्तृत लोक-स्थान का वरण करे।
Mantra 10
सस्वश्चिद्धि समृतिस्त्वेष्येषामपीच्येन सहसा सहन्ते । युष्मद्भिया वृषणो रेजमाना दक्षस्य चिन्महिना मृळता नः ॥
इनकी उग्र, गुप्त सहसा-शक्ति से स्वयंचल और अव्यवस्थित भी सम्यक् संयोग (समृति) में आ जाता है। हे वृषणों, तुम्हारे भय से काँपते हुए भी, विवेक (दक्ष) की महिमा से—हम पर कृपा (मृळता) करो।
Mantra 11
यो ब्रह्मणे सुमतिमायजाते वाजस्य सातौ परमस्य रायः । सीक्षन्त मन्युं मघवानो अर्य उरु क्षयाय चक्रिरे सुधातु ॥
जो ब्रह्मन् के लिए सुमति—शुभ बुद्धि—से यजन करता है, वह वाज की प्राप्ति में बल की परिपूर्णता और रयि की परम समृद्धि को जीतता है। मगवान् आर्य दाता अपने मन्यु—उत्साह—को तीक्ष्ण करते हैं; उन्होंने वृद्धि के लिए विस्तृत निवास रचा है—सुधातु, सुस्थापित।
Mantra 12
इयं देव पुरोहितिर्युवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि । विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे देव! यह पुरोहिति—अग्रस्थापित मार्गदर्शक उपस्थिति—यज्ञों में तुम दोनों मित्र-वरुण के लिए रची गई है। सब दुर्गम मार्गों के पार हमें पहुँचाओ; तुम सदा स्वस्तिभिः—कल्याण-स्थितियों—से हमारी रक्षा करो।
It asks Sūrya and the Ādityas—especially Mitra–Varuṇa—to keep the worshipper aligned with truth (satya/ṛta), guide the mind, and carry one safely beyond dangers into well-being (svasti).
They are Ādityas who guard cosmic and moral order: Mitra supports harmony and right agreements, while Varuṇa upholds the binding law of ṛta and protects against ethical and existential peril.
It is an image for a safe crossing through difficult, risky conditions—outer obstacles and inner confusion. The Ādityas are prayed to provide the crossing and lead the seeker to safety, clarity, and stability.
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