
Sukta 7.42
Vasiṣṭha (Vāsiṣṭha family, Mandala 7)
Agni/Soma-yajña complex (ritual forces); Angiras powers invoked
Triṣṭubh (probable; requires metrical scan for certainty)
वसिष्ठ का यह छह-ऋचा सूक्त आङ्गिरस-सदृश याज्ञिक शक्तियों, सोम की प्रवहमान ‘गायों’ और पेषण-पाषाणों का आह्वान करके सोम-यज्ञ को आगे बढ़ाता है, ताकि अध्वर का कर्म (पेśः) सफलतापूर्वक प्रवृत्त हो। अग्नि की स्तुति स्वागतित दिव्य अतिथि (अतिथि) के रूप में की गई है, जो जब ठीक से पहचाने जाकर गृह/यज्ञ-स्थल में प्रतिष्ठित होते हैं, तब अभीष्ट धन-सम्पदा और सुरक्षित प्रगति प्रदान करते हैं। अंत में सूक्त संक्षिप्त फलश्रुति-सदृश प्रार्थना के साथ समाप्त होता है—विस्तृत जीवन-शक्ति (इष्), धन (रयि), बल (वाज) और ‘स्वस्ति’ के द्वारा दीर्घकालीन संरक्षण के लिए।
Mantra 1
प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त प्र क्रन्दनुर्नभन्यस्य वेतु । प्र धेनव उदप्रुतो नवन्त युज्यातामद्री अध्वरस्य पेशः ॥
प्रणवित ब्रह्म-वचन और अङ्गिरस-शक्तियाँ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हों; नभन्यु का घोष आगे बढ़े। प्रवाहित दुग्ध-धेनुएँ आगे बहें; यज्ञ के कुशल कर्म के लिए अध्वर के अद्रि (सोम-पेषण-शिला) युक्त किए जाएँ।
Mantra 2
सुगस्ते अग्ने सनवित्तो अध्वा युक्ष्वा सुते हरितो रोहितश्च । ये वा सद्मन्नरुषा वीरवाहो हुवे देवानां जनिमानि सत्तः ॥
हे अग्ने, तेरा पथ सुगम है—धन-प्राप्ति कराने वाला अध्वा। सुत के समय हरित और रोहित शक्तियों को युक्त कर। वे अरुष—गृह में हों या वीर-बल वहन करने वाले—मैं, यज्ञ में आसीन होकर, देवों के जन्म और प्राकट्य को आह्वान करता हूँ।
Mantra 3
समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके । यजस्व सु पुर्वणीक देवाना यज्ञियामरमतिं ववृत्याः ॥
मैं नमस्कारों सहित, एकतान होकर, तुम्हारे यज्ञ को महिमा देता हूँ; आनंदित होता (होता) समीप ही प्रकट हुआ है। हे पूर्व-रूप (प्राचीन मुख) देवों, सुयज्ञ करो; अयज्ञ्य अमति (अधर्म-बुद्धि) को दूर कर, यज्ञ-योग्य मति को स्थिर करो।
Mantra 4
यदा वीरस्य रेवतो दुरोणे स्योनशीरतिथिराचिकेतत् । सुप्रीतो अग्निः सुधितो दम आ स विशे दाति वार्यमियत्यै ॥
जब वीर और धनवान् के गृह में, सुख-निवास देने वाला अतिथि पहचाना जाता है, तब अग्नि—अत्यन्त प्रसन्न, घर में सुस्थापित—जनसमुदाय को उनकी आगे की यात्रा के लिए वाञ्छित धन-सम्पदा प्रदान करता है।
Mantra 5
इमं नो अग्ने अध्वरं जुषस्व मरुत्स्विन्द्रे यशसं कृधी नः । आ नक्ता बर्हिः सदतामुषासोशन्ता मित्रावरुणा यजेह ॥
हे अग्ने, हमारे लिए इस अखण्ड अध्वर को स्वीकार करो; मरुतों के बीच, इन्द्र के साथ, इसे हमारे लिए यशस्वी बनाओ। रात्रि और उषा पवित्र बर्हि पर आसीन हों; यहाँ ऋत के अभिलाषी मित्र-वरुण की यजना करो।
Mantra 6
एवाग्निं सहस्यं वसिष्ठो रायस्कामो विश्वप्स्न्यस्य स्तौत् । इषं रयिं पप्रथद्वाजमस्मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
इस प्रकार वसिष्ठ ने—राय की कामना से—सहस्यम्, सर्वकर्म-समर्थ उस शक्तिमान् अग्नि की स्तुति की। वह हमारे लिए इष, रयि और वाज का विस्तार करे; हे देवशक्तियो, तुम सदा स्वस्तिभिः हमारी रक्षा करो।
It is a short hymn that energizes the Soma-sacrifice: it urges the mantras, pressing-stones, and Soma flow forward, and it praises Agni as the divine Guest who rewards the community when properly welcomed.
“Angiras” here points to priestly/ritual power—effective inspired speech and sacrificial force—invoked to help the rite reach its goal and make the offerings successful.
It asks for widened vitality (iṣ), wealth (rayi), strength or winning power (vāja), and continual protection through svasti (harmonious well-being).
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