
Sukta 7.41
Vasiṣṭha
Morning litany to multiple deities (Agni, Indra, Mitra-Varuṇa, Aśvins, Bhaga, Pūṣan, Brahmaṇaspati, Soma, Rudra)
Jagatī (probable due to longer line with repeated prātar; traditional classification often places such litanies in Jagatī)
यह सूक्त प्रातःकाल की एक स्तुति-लितानी है, जिसमें अग्नि, इन्द्र, मित्र-वरुण, अश्विनौ, भग, पूषन्, ब्रह्मणस्पति, सोम और रुद्र—इन देवताओं के मंडल का बार-बार आह्वान किया गया है, ताकि दिन का आरम्भ ऋत (उचित क्रम) और मंगलमय शक्ति के साथ हो। इसमें ‘भग’ (सौभाग्य का भाग), रक्षा तथा दिन के सभी प्रहरों में ‘स्वस्ति’ (कल्याण) की याचना की गई है। अंत में उषाओं की ओर मुड़कर सदा-नवीन, समृद्ध प्रभातों के लिए प्रार्थना की जाती है, जो घृत-सदृश आनन्द का ‘दुग्ध’ दें और यजमान के प्राण-बल को धारण करें।
Mantra 1
प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना । प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ॥
प्रातः हम अग्नि को पुकारते हैं, प्रातः इन्द्र को पुकारते हैं; प्रातः मित्र-वरुण को, प्रातः अश्विनों को। प्रातः हम भग को, पूषण को, ब्रह्मणस्पति को पुकारते हैं; प्रातः हम सोम को, और साथ ही रुद्र को भी आह्वान करते हैं।
Mantra 2
प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता । आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥
प्रातःकाल हम उग्र, प्रातर्जित् (प्रभात-विजयी) भग को पुकारते हैं—अदिति के पुत्र, जो जगतों के धारक हैं। जो दरिद्र है और जिसका मन उसकी ओर जाता है, जो बलवान है, यहाँ तक कि राजा भी—उस भग के विषय में कहता है: “मैं भाग पाऊँ, मैं भोग करूँ।” वैसे ही हम भी आनन्द और वृद्धि के उस धर्म्य भाग का उपभोग करें।
Mantra 3
भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः । भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम ॥
हे भग, हमारे नेता और पथ-प्रदर्शक; हे भग, सत्य-राधस्—जिसका दान सत्य और ऋत के अनुसार है—हमारी इस धिया (प्रेरित बुद्धि) को उठाकर प्रकट कर, हमें प्रदान कर। हे भग, गो-रश्मियों और अश्व-वेगों से हमें आगे जनित कर; हे भग, हम नृभिः नृवन्तः हों—सच्चे मानव-बलों से समृद्ध, आत्म-तेज से परिपूर्ण हों।
Mantra 4
उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम् । उतोदिता मघवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम ॥
और अभी भी हम भग-सम्पन्न हों; और प्रपित्व (अग्रगमन) में भी, और दिनों के मध्य में भी। और सूर्य के उदय पर, हे मघवन् (दान-समृद्ध) देवो, हम देवताओं की सुमति—उनकी शुभ, प्रकाशमयी सम्मति—में निवास करें।
Mantra 5
भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम । तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुरएता भवेह ॥
भग स्वयं ही देव हो—भाग-सम्पन्न; उसी के द्वारा हम भी भाग-सम्पन्न हों। हे भग, जिसे सब ही सचमुच पुकारते हैं—तू यहाँ हमारे लिए अग्रगामी, पथ-प्रवर्तक हो।
Mantra 6
समध्वरायोषसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय । अर्वाचीनं वसुविदं भगं नो रथमिवाश्वा वाजिन आ वहन्तु ॥
हमारे अध्वर (यज्ञ) की ओर उषाएँ एक साथ नम्र हों, जैसे दधिक्रावन् उज्ज्वल लक्ष्य-पद की ओर बढ़ता है। समीप आती, वसु-विद् (धन-प्रदाता) भग को, जैसे वेगवान अश्व रथ को लाते हैं, वैसे ही हमारे पास ले आएँ।
Mantra 7
अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः । घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
अश्व-सम्पन्न, गो-सम्पन्न, वीर-सम्पन्न—कल्याणमयी उषाएँ हमारे लिए सदा उदित हों। घृत (घृतमय आनन्द) का दोहन करती, सर्वतः परिपूर्ण—तुम स्वस्तियों से सदा हमारी रक्षा करो।
It is a dawn prayer that calls multiple deities at the start of the day so life proceeds in right order (ṛta), with protection (svasti) and a fortunate share (bhaga).
The repetition marks dawn as the sacred threshold when intention is set and divine powers are invited to govern the whole day—work, travel, health, speech, and inner clarity.
Recite it at sunrise (or just before), offer a small ghee lamp or fire offering if possible, and end by holding the intention of svasti—steadiness, protection, and truthful action through the day.
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