
Sukta 7.33
Vasiṣṭha (self-referential; addressed to Vasiṣṭhas)
Collective seer-band / ritual community (contextual); indirectly Indra-linked narrative in the following verses
Triṣṭubh (probable for RV 7.33)
ऋग्वेद 7.33 वसिष्ठ का आत्म-संदर्भित सूक्त है, जिसमें वह वसिष्ठ-ऋषि-गण को बार्हिस् (पवित्र कुश) के चारों ओर निकट आकर एकत्र होने, यज्ञकर्म तथा गायक/स्तोता की रक्षा करने के लिए पुकारता है। यह सामूहिक पुरोहित-शक्ति की स्तुति करता है—जो सूर्य के समान प्रकाशमान, समुद्र के समान विशाल, और वात के समान प्रेरक है—ताकि स्तोम (स्तुति-गान) अपने अभिप्रेत समुदाय तक पहुँचे और फलदायी हो। अंत में सोम-पीषण-सम्बन्धी विधान (ग्रावन्, उक्थ, सामन्) का स्मरण कराते हुए वसिष्ठ को ‘पथ-भेदक’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो यज्ञ-धारा को आगे प्रवाहित करता है।
Mantra 1
श्वित्यञ्चो मा दक्षिणतस्कपर्दा धियंजिन्वासो अभि हि प्रमन्दुः । उत्तिष्ठन्वोचे परि बर्हिषो नॄन्न मे दूरादवितवे वसिष्ठाः ॥
दीप्तिमान, दाहिने बँधे जटाओंवाले, वे धियं (विचार-शक्ति) को पोषित करते हुए हर्ष से मेरे निकट आकर प्रमुदित हुए। उठकर मैं वचन कहता हूँ, बर्हिष् (यज्ञ-तृण) के चारों ओर पुरुषों को समेटते हुए: हे वसिष्ठो! रक्षा के लिए मुझसे दूर न रहो।
Mantra 2
दूरादिन्द्रमनयन्ना सुतेन तिरो वैशन्तमति पान्तमुग्रम् । पाशद्युम्नस्य वायतस्य सोमात्सुतादिन्द्रोऽवृणीता वसिष्ठान् ॥
दूर से ही उन्होंने पिसे हुए सोम के द्वारा इन्द्र को यहाँ ले आया—घेरने वाली शक्तियों के पार, रक्षित और उग्र (बाधाओं) के भी पार। पाशद्युम्न वायत के निचोड़े हुए सोम से इन्द्र ने वसिष्ठों को चुन लिया—कर्म के लिए उन्हें अपना कर।
Mantra 3
एवेन्नु कं सिन्धुमेभिस्ततारेवेन्नु कं भेदमेभिर्जघान । एवेन्नु कं दाशराज्ञे सुदासं प्रावदिन्द्रो ब्रह्मणा वो वसिष्ठाः ॥
इन्हीं (सहायकों) के साथ उसने नदी को पार किया; इन्हीं के साथ उसने भेद को परास्त किया। और दस राजाओं के संग्राम में, हे वसिष्ठो, तुम्हारे ब्रह्म—प्रेरित वाणी-शक्ति—से इन्द्र ने सुदास की रक्षा की।
Mantra 4
जुष्टी नरो ब्रह्मणा वः पितॄणामक्षमव्ययं न किला रिषाथ । यच्छक्वरीषु बृहता रवेणेन्द्रे शुष्ममदधाता वसिष्ठाः ॥
हे नरगण, पितरों के ब्रह्म के कारण तुम प्रिय ठहरे; तुमने निश्चय ही अविनाशी धुरी (अक्ष)—स्थिर ऋत—को आहत नहीं किया। जब शक्वरी छन्दों में, विशाल नाद के साथ, हे वसिष्ठो, तुमने इन्द्र में शुष्म—बल—स्थापित किया।
Mantra 5
उद्द्यामिवेत्तृष्णजो नाथितासोऽदीधयुर्दाशराज्ञे वृतासः । वसिष्ठस्य स्तुवत इन्द्रो अश्रोदुरुं तृत्सुभ्यो अकृणोदु लोकम् ॥
मानो स्वर्ग तक उठते हुए—तृष्णा से जन्मे, आश्रय खोजने वाले—दाशराज्ञ (दस राजाओं) के संग्राम में अपने तेज (प्रयत्न-अग्नि) को प्रज्वलित कर उठे। स्तुति करते हुए वसिष्ठ की वाणी को इन्द्र ने सुना, और तृत्सुओं के लिए विस्तृत लोक—स्वतंत्र, खुला अवकाश—रच दिया।
Mantra 6
दण्डा इवेद्गोअजनास आसन्परिच्छिन्ना भरता अर्भकासः । अभवच्च पुरएता वसिष्ठ आदित्तृत्सूनां विशो अप्रथन्त ॥
दण्डों के समान दृढ़, गो-अजन (गौ-जन्य, प्रकाशमयी किरणों से उत्पन्न) भरत—अभी बालक-से नवयौवन में—सघन, परस्पर गुँथे हुए खड़े थे। और वसिष्ठ उनके अग्रणी, पुरएता बने; तब तृत्सुओं की प्रजाएँ सचमुच फैल गईं और अपने सुव्यवस्थित बल में बढ़ चलीं।
Mantra 7
त्रयः कृण्वन्ति भुवनेषु रेतस्तिस्रः प्रजा आर्या ज्योतिरग्राः । त्रयो घर्मास उषसं सचन्ते सर्वाँ इत्ताँ अनु विदुर्वसिष्ठाः ॥
तीन जगतों में ‘भव’ का बीज स्थापित करते हैं; तीन आर्य प्रजाएँ हैं, जिनका अग्र-शीर्ष ज्योति है। तीन घर्म (तप-उष्माएँ) उषा के संग चलते हैं। इन सबको वसिष्ठ-वंशी जन जानते हैं और सम्यक् बोध में उनका अनुसरण करते हैं।
Mantra 8
सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्येव महिमा गभीरः । वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो वसिष्ठा अन्वेतवे वः ॥
जैसे सूर्य इनका प्रकाश धारण कर आगे बढ़ाता है, जैसे समुद्र की महिमा गहन और विशाल है, जैसे वायु का वेग अजेय प्रेरणा से चलता है—वैसे ही यह स्तोत्र, हे वसिष्ठो, किसी अन्य मार्ग से नहीं, तुम्हें खोजता हुआ तुम्हारे पास पहुँचे।
Mantra 9
त इन्निण्यं हृदयस्य प्रकेतैः सहस्रवल्शमभि सं चरन्ति । यमेन ततं परिधिं वयन्तोऽप्सरस उप सेदुर्वसिष्ठाः ॥
वे हृदय के गुप्त स्थान में अपने प्रकेतों—दीप्त विवेक-शक्तियों—से विचरते हैं, सहस्र-शाखित विस्तार को चारों ओर से घेरते हुए। यम के नियम से तने हुए परिधि-बंध को बुनते हुए, वसिष्ठ अप्सराओं के निकट आ बैठे हैं।
Mantra 10
विद्युतो ज्योतिः परि संजिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा । तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठागस्त्यो यत्त्वा विश आजभार ॥
जब मित्र-वरुण ने तुम्हें विद्युत्-ज्योति के रूप में, अपने चारों ओर संजिहान—एकत्र होती—देखा, वह तुम्हारा एक जन्म था, हे वसिष्ठ। और दूसरा तब, जब अगस्त्य ने तुम्हें जनों के लिए आगे लाकर स्थापित किया।
Mantra 11
उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्मनसोऽधि जातः । द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे त्वाददन्त ॥
और हे वसिष्ठ, तू मैत्रावरुण (मित्र‑वरुण का ऋत्विज्) है; हे ब्रह्मन्, उर्वशी से, मन के भीतर से उत्पन्न हुआ। दिव्य ब्रह्म (वाणी) से टपका हुआ वह बिन्दु—समस्त देवों ने तुझे पुष्कर (कमल‑सर) में स्थापित किया।
Mantra 12
स प्रकेत उभयस्य प्रविद्वान्त्सहस्रदान उत वा सदानः । यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः ॥
वह प्रकेत (प्रकाशमान विवेचक), दोनों पक्षों का जाननेवाला, सहस्र‑दान (हज़ारों दानों का दाता) और सदा‑धारक भी—यम के तने हुए परिधि‑बन्ध को बुनने की इच्छा से, अप्सराओं को परितः घेरे हुए वसिष्ठ उत्पन्न हुआ।
Mantra 13
सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम् । ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥
सत्र (यज्ञ‑सत्र) में, जन्म के समय नमस्कारों से प्रेरित होकर, उन्होंने एक ही समान रेतः (बीज) को कुम्भ में उँडेला। वहाँ से मध्य से प्राण‑स्वरूप मान ऊपर उठा; वहीं से जन्मे हुए को ऋषि कहते हैं—वसिष्ठ, सत्य में प्रतिष्ठित।
Mantra 14
उक्थभृतं सामभृतं बिभर्ति ग्रावाणं बिभ्रत्प्र वदात्यग्रे । उपैनमाध्वं सुमनस्यमाना आ वो गच्छाति प्रतृदो वसिष्ठः ॥
वह उक्थ (स्तुति-हिम्न) को धारण करता है, वह साम (गान) को भी धारण करता है; ग्रावा (सोम-पेषण-शिला) को उठाए हुए वह अग्रभाग में उच्च स्वर से बोलता है। प्रसन्न और सहमत मन से उसके निकट जाओ; पथ-प्रदर्शक/मार्ग-भेदक वसिष्ठ तुम्हारे पास आता है।
The hymn primarily addresses the Vasiṣṭhas as a collective—Vasiṣṭha’s own priestly lineage and ritual community—asking them to come close, support the rite, and offer protection.
These images describe how the hymn should work: like the Sun it illuminates, like the Ocean it is deep and vast in power, and like the Wind it moves with unstoppable force to reach its intended goal.
They point to soma-sacrifice practice: uktha is the spoken recitation, sāman the chanted melody, and grāvan the pressing-stone. The verse depicts the priest leading from the front, carrying the rite forward with skill and authority.
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