Rig Veda Sukta 32
Mandala 7Sukta 3227 Mantras

Sukta 32

Sukta 7.32

Rishi

Vasiṣṭha (Maṇḍala 7 attribution; RV 7.32 continues Indra praise in this cycle)

Devata

Indra

Chandas

Triṣṭubh

वसिष्ठ का यह त्रिष्टुभ् स्तोत्र इन्द्र को सोम-निष्पादन के समीप आने और कवि के आवाहन को ध्यानपूर्वक सुनने के लिए बुलाता है, और यह प्रतिपादित करता है कि ‘सहायता-समृद्ध’ उस देव के समकक्ष कोई मर्त्य नहीं हो सकता। इसमें इन्द्र की शक्ति और उदारता का स्तवन इस दृढ़ सूत्र के साथ बुना गया है कि श्रद्धा (विश्वास) ही वह बल है जो उपासक को विजय और समृद्धि की ओर ले जाता है। अंत में यह स्तोत्र रक्षात्मक प्रार्थना बन जाता है: इन्द्र को सहचर बनाकर, छिपे हुए संकट हमें न घेरें, और हम बाधक ‘जल-राशियों’ तथा दीर्घकालीन अवरोहों को पार कर जाएँ।

Recitation with translationRig Veda 7.32

Mantras

Mantra 1

मो षु त्वा वाघतश्चनारे अस्मन्नि रीरमन् । आरात्ताच्चित्सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि ॥

गायक की पुकार कहीं हमें छोड़कर तुम्हें दूर न हाँक दे। दूर से भी हमारे इस सधमाद (सामूहिक आनन्द-यज्ञ) में आओ—यहाँ आओ, उपस्थित होओ, और निकट से सुनो।

Mantra 2

इमे हि ते ब्रह्मकृतः सुते सचा मधौ न मक्ष आसते । इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः ॥

ये ते ब्रह्म-रचयिता (स्तोत्रकर्ता) जन, तेरे निचोड़े हुए सोम के साथ ऐसे बैठते हैं मानो मधु की मधुरता में। वसु (धन-सम्पदा) की कामना करने वाले ये स्तुतिकार इन्द्र में अपना पग-चिह्न रखते हैं—जैसे रथ के पाद-स्थान (पायदान) पर पाँव रखा जाता है।

Mantra 3

रायस्कामो वज्रहस्तं सुदक्षिणं पुत्रो न पितरं हुवे ॥

राय (समृद्धि) की कामना से मैं वज्र-हस्त, सुदक्षिण (सुपथ-प्रदर्शक) उस शक्ति को पुकारता हूँ—जैसे पुत्र सहायता और रक्षण के लिए पिता को पुकारता है।

Mantra 4

इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरः । ताँ आ मदाय वज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याह्योक आ ॥

ये सोम-रस इन्द्र के लिए निचोड़े गए हैं, दध्याशिर (दही-मिश्रित, बलवर्धक) करके। आओ, हे वज्र-हस्त! मद (उन्माद-आनन्द) और पान के लिए; अपने दो हरि (हरित-दीप्तिमान अश्वों/शक्तियों) के साथ आओ, और यज्ञ-गृह में प्रवेश करो।

Mantra 5

श्रवच्छ्रुत्कर्ण ईयते वसूनां नू चिन्नो मर्धिषद्गिरः । सद्यश्चिद्यः सहस्राणि शता ददन्नकिर्दित्सन्तमा मिनत् ॥

वह श्रवणशील कान की ओर, वसुओं (धनों) की ओर अग्रसर होता है; और अब भी वह हमारी वाणी को बल दे—वह जो एक ही क्षण में हजारों और सैकड़ों दान करता है; दान करते समय उसे कोई घटा नहीं सकता।

Mantra 6

स वीरो अप्रतिष्कुत इन्द्रेण शूशुवे नृभिः । यस्ते गभीरा सवनानि वृत्रहन्त्सुनोत्या च धावति ॥

वह वीर, जो कभी पीछे नहीं हटता, इन्द्र के साथ और बलवान पुरुषों के साथ पुष्ट होता है—वह जो, हे वृत्रहन्, तेरे गम्भीर सोम-सवनों को निचोड़ता है और तेरी ओर दौड़ पड़ता है।

Mantra 7

भवा वरूथं मघवन्मघोनां यत्समजासि शर्धतः । वि त्वाहतस्य वेदनं भजेमह्या दूणाशो भरा गयम् ॥

हे मघवन्, मघोनों (दानशीलों) की उस सेना के लिए हमारा रक्षक-आश्रय बन, जब तू उन्हें दल-दल में एकत्र करता है। पराजित शत्रु की प्राप्ति में हम भागी हों; संकटग्रस्त और वैरी शक्तियों से हमें लाभ और समृद्धि (गय) ला दे।

Mantra 8

सुनोता सोमपाव्ने सोममिन्द्राय वज्रिणे । पचता पक्तीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्नित्पृणते मयः ॥

हे सोमपावन्! वज्रधारी इन्द्र के लिए सोम निचोड़ो। हवि को पकाओ, पक्तियों को सिद्ध करो, और उसके अव के लिए सब कुछ तैयार करो—वह जो भरता है, भरने वाले को ही आनन्द (मयः) प्रदान करता है।

Mantra 9

मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे । तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे ॥

हे सोमिनो, चूको मत; दक्ष बनो—महान के लिए कर्म करो, शीघ्र आने वाली रयि-समृद्धि के लिए। तरणि-शक्ति ही जीतती है, बसती है, बढ़ती है; देव कातर-प्रयत्न करने वालों के लिए नहीं हैं।

Mantra 10

नकिः सुदासो रथं पर्यास न रीरमत् । इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमति व्रजे ॥

सुदाता के रथ को कोई घेर नहीं सकता, न रोक सकता; वह डगमगाता नहीं। जिसके सहायक इन्द्र हैं, और जिसके पास मरुत आते हैं, वह गोमती व्रज—दीप्तिमान समृद्धि के गो-धाम—में प्रवेश करता है।

Mantra 11

गमद्वाजं वाजयन्निन्द्र मर्त्यो यस्य त्वमविता भुवः । अस्माकं बोध्यविता रथानामस्माकं शूर नृणाम् ॥

हे इन्द्र! वह मर्त्य, जो बल-समृद्धि को बढ़ाता है, जब तू उसका अविता (सहायक) बनता है, तब वह वाज (विजय-पुरस्कार) को प्राप्त होता है। हे शूर वीर! हमारे रथों का भी अविता बन, और हमारे नर-जन (योधाओं) का भी।

Mantra 12

उदिन्न्वस्य रिच्यतेंऽशो धनं न जिग्युषः । य इन्द्रो हरिवान्न दभन्ति तं रिपो दक्षं दधाति सोमिनि ॥

तब निश्चय ही उसका अंश उमड़ पड़ता है—जैसे विजयी के धन की समृद्धि। वह हरिवान् इन्द्र, जिसे कोई छल नहीं सकता—उसके विरुद्ध शत्रु केवल सोम-पीड़क (सोमिन) में अपनी ही दक्षता रखता है (और वही निष्फल हो जाती है)।

Mantra 13

मन्त्रमखर्वं सुधितं सुपेशसं दधात यज्ञियेष्वा । पूर्वीश्चन प्रसितयस्तरन्ति तं य इन्द्रे कर्मणा भुवत् ॥

यज्ञों में वह मन्त्र स्थापित करो—अखण्ड, सुसंस्कृत, सु-रूप (सुपेशस्) वाला। जो इन्द्र में कर्म के द्वारा समर्थ (प्रभावी) होता है, उसके पास प्राचीन प्रेरणाएँ भी पार उतर जाती हैं।

Mantra 14

कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति । श्रद्धा इत्ते मघवन्पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति ॥

हे इन्द्र! सहायता-सम्पन्न (असुमान्) तुम्हारे विरुद्ध कौन-सा मर्त्य धृष्टता कर सकता है? हे मघवन्! तुममें ही श्रद्धा—दूरस्थ दिव्य लोक में—विजयी आत्मा को बल-सम्पदा (वाज) की ओर प्रेरित करती है।

Mantra 15

मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु । तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ॥

हे मघवन्! वृत्र-वधों में उन दानशीलों को प्रेरित करो जो प्रिय वसु देते हैं। हे हर्यश्व इन्द्र! तुम्हारी प्रणीति से, सूरी-जन (ऋषि/प्रकाशमान ज्ञानी) के साथ, हम सब दुरितों को पार कर जाएँ।

Mantra 16

तवेदिन्द्रावमं वसु त्वं पुष्यसि मध्यमम् । सत्रा विश्वस्य परमस्य राजसि नकिष्ट्वा गोषु वृण्वते ॥

हे इन्द्र! निश्चय ही, अधम वसु भी तुम्हारा ही है; और मध्यम वसु को तुम पुष्ट करते हो। तुम समस्त के परम लोक पर एकाधिकार से राज्य करते हो; गोषु (गवों/किरणों) में कोई तुम्हें—मानो अनेक शक्तियों में से एक—चुनता नहीं।

Mantra 17

त्वं विश्वस्य धनदा असि श्रुतो य ईं भवन्त्याजयः । तवायं विश्वः पुरुहूत पार्थिवोऽवस्युर्नाम भिक्षते ॥

हे इन्द्र! तुम समस्त जगत् के धनदाता हो; संग्राम में जय पाने वालों में तुम प्रसिद्ध हो। इसलिए, हे पुरुहूत, यह समूचा पार्थिव जन तुम्हीं से ‘अवस्’—सहायता—को अपनी आवश्यकता मानकर याचना करता है।

Mantra 18

यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय । स्तोतारमिद्दिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय ॥

हे इन्द्र! यदि जितना तुम्हारा सामर्थ्य-विस्तार है उतना ही मैं भी शासन कर पाता, तो हे रदावस् (आनन्ददाता), मैं निश्चय ही स्तोता को प्रतिष्ठित करता—ताकि उसे पापत्व/पतन के लिए न सौंप दूँ।

Mantra 19

शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे । नहि त्वदन्यन्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥

मैं सीखूँ—दिन-प्रतिदिन—वर्धमान के लिए कहीं भी धन-राशि को पा लेने का उपाय। क्योंकि, हे मघवन् इन्द्र, तुम्हारे सिवा हमारे लिए कोई निकटतर और श्रेष्ठ ‘आप्य’ कल्याण नहीं है—पिता भी नहीं।

Mantra 20

तरणिरित्सिषासति वाजं पुरंध्या युजा । आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्र्वम् ॥

तरणि (पार कराने वाला) निश्चय ही पुरंधि (सद्बुद्धि/सम्यक् विवेक) की युजा (जुती हुई शक्ति) से वाज (विजय-बल/अन्न) को जीतना चाहता है। हे पुरुहूत (बहु-आहूत) इन्द्र! मैं वाणी से तुम्हें नमस्कार करता हूँ—जैसे तक्षक (कारीगर) द्वारा गढ़ी हुई नेमि (चक्र-परिधि), सुदृढ़ और सुचारु गमन वाली।

Mantra 21

न दुःष्टुती मर्त्यो विन्दते वसु न स्रेधन्तं रयिर्नशत् । सुशक्तिरिन्मघवन्तुभ्यं मावते देष्णं यत्पार्ये दिवि ॥

दुष्टुति (कुटिल/अशुभ स्तुति) से मर्त्य वसु (धन) नहीं पाता; और जो शिथिल पड़ता है, उसे रयि (समृद्धि) नहीं पहुँचती। हे मघवन् (दानशील) इन्द्र! सच्ची शक्ति से ही—तुम्हारे प्रति समर्पित जन को—दान (देṣ्ण) मिलता है; वह तुम्हारा उपहार जो परे के दिवि (स्वर्ग) में स्थित है।

Mantra 22

अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥

हे शूर! हम तुम्हारी ओर स्तुतियों से वैसे ही दबाव डालते/आकर्षित होते हैं जैसे बिना दुही हुई धेनुएँ। इस जगत् (चलायमान विश्व) के तुम ईशान (स्वामी) हो, स्वर्दृश (स्वर्/सूर्य-लोक को देखने वाले) हो; हे इन्द्र! जो स्थिर है (तस्थुष), उसके भी ईशान तुम ही हो।

Mantra 23

न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते । अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥

हे मघवन् इन्द्र! न तो कोई दिव्य (देव) और न कोई पार्थिव (भौम) तेरे समान है; न कोई तेरे तुल्य जन्मा है, न जन्मेगा। अश्व की खोज में, वाज (विजयी ऊर्जा-सम्पदा) की चाह में, और गव्यों (गौ—किरण/ज्ञान) की अभिलाषा से हम तुझे पुकारते हैं।

Mantra 24

अभी षतस्तदा भरेन्द्र ज्यायः कनीयसः । पुरूवसुर्हि मघवन्त्सनादसि भरेभरे च हव्यः ॥

हे इन्द्र! उस सामर्थ्य को हमारे पास ले आ जो शत्रु-बलों को परास्त करे; तू महानों से भी महान है—छोटों के लिए भी तू ही बड़ा है। हे मघवन्! तू सनातन से बहु-धन वाला है, और प्रत्येक संग्राम-प्रयास में तू ही हवनीय (आह्वान-योग्य) है।

Mantra 25

परा णुदस्व मघवन्नमित्रान्त्सुवेदा नो वसू कृधि । अस्माकं बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखीनाम् ॥

हे मघवन् इन्द्र! शत्रु-शक्तियों को दूर ढकेल दे; सु-वेदा (सद्ज्ञान) से अर्जित होने वाले वसु (धन/सम्पदा) हमारे लिए कर दे। हमारे रक्षक बनकर हमें पहचान; महाधन (महान् संग्राम/समृद्धि-संग्राम) में हमारे मित्रों का वर्धक, हमारे सहचरों की सख्यता का पोषक बन।

Mantra 26

इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा । शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि ॥

हे इन्द्र! हमारे लिए क्रतु—संकल्प और सम्यक् प्रज्ञा—ले आओ, जैसे पिता अपने पुत्रों के लिए लाता है। हे पुरुहूत! इस पथ-यात्रा में हमें शिक्षा दो, ताकि हम जीवित रहते हुए ज्योति (प्रकाश) को प्राप्त करें।

Mantra 27

मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो माशिवासो अव क्रमुः । त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि ॥

अज्ञात, दुर्विचार्य संकटें हमें न घेरें; अशिव शक्तियाँ हमें रौंद न डालें। हे शूर! तुम्हारे साथ हम शाश्वत ढलानों को पार करते हैं और आपः (जल-प्रवाहों) के परे तर जाते हैं—सीमाबद्धता की धाराओं के भी परे।

Inside Sukta 32

How it unfolds

  1. Where it opens

    A direct, intimate summons: the poet asks Indra not to be driven away by the singer’s call, but to come even from afar and listen closely.

  2. Development

    Praise intensifies around Indra’s unmatched capacity to help; the hymn stresses that no mortal can challenge him, and that śraddhā in Indra propels the seeker toward vāja (winning power).

  3. Climax

    A rhetorical peak of assurance: Indra’s supremacy is beyond contest, and faith in him becomes the engine of victory and fullness in the ‘far heaven.’

  4. Where it settles

    Protective closure: may unknown dangers and unkind powers not trample us; with Indra we cross enduring descents and pass beyond obstructing waters/currents.

The deity: Indra

  • In the VedaIndra is lauded as the mighty, soma-loving warrior and benefactor (maghavan), swift to hear the call, who overcomes foes and breaks obstructions, granting strength, cattle, and victory.
  • Cosmic functionHe embodies the victorious power that clears the way—shattering resistance, releasing vitality, and sustaining the triumph of ṛta through heroic force.
  • Inner significanceIndra signifies awakened will and courageous clarity that defeats inner limitations—fear, doubt, inertia—and enables the seeker to ‘cross beyond the waters’ of constraint through faith and right effort.

The seer

  • VasiṣṭhaVasiṣṭha (Vasiṣṭha-gotra); traditionally linked with the Maitrāvaruṇa priesthood line · Foremost seer of Maṇḍala 7, celebrated for powerful Indra hymns and for articulating a devotional-poetic authority grounded in ṛta (cosmic order) and effective ritual speech

Famous verses

sadhamādaṃ na ā gahīha … upa śrudhi
Verse 7.32.1Sets the hymn’s tone as an urgent invitation (āvāhana) and establishes the ritual setting of shared exhilaration (sadhamāda) with a request for Indra’s attentive presence.Read verse 7.32.1 →
śraddhā it te maghavan
Verse 7.32.14A central theological claim: Indra’s help is unassailable, and śraddhā (faith/trust) is portrayed as the force that drives the aspirant toward vāja (plenitude of power).Read verse 7.32.14 →
apo ’ti śūra tarāmasi
Verse 7.32.27Concluding protection and transcendence motif: a prayer against hidden perils, ending with the powerful image of crossing beyond the waters with Indra as companion.Read verse 7.32.27 →

Attributes of the deity

  • Maghavan (bountiful giver)
  • Śūra (heroic)
  • Soma-priya (delighted by soma)
  • Protector in dangers near and unknown
  • Bestower of vāja (strength, winning power, plenitude)
  • Listener to prayer and ally of the singer

Also by this seer

  • Large portion of Rig Veda Maṇḍala 7 (many sūktas attributed to Vasiṣṭha and his family)
  • Vasiṣṭha-related praise hymns to Indra, Varuṇa-Mitra, Agni, and the Maruts within RV 7
  • Later Vedic-Itihāsa tradition remembers him as a paradigmatic brahmarṣi and royal priest (purohita)

The rite, step by step

  • Prepare the altar and fires; establish the ritual space and seats for the priests.
  • Press soma and purify it; ready cups for Indra’s share.
  • Recite the hymn as an āvāhana (invitation), explicitly asking Indra not to go far but to come to the sadhamāda (shared exhilaration).
  • Offer soma with accompanying ghee/libations; reinforce śraddhā and praise of Indra’s help and generosity.
  • Conclude with protective petitions against unknown harms and hostile forces, sealing the rite with blessings for safe passage and success.

Offerings

  • Soma libation (primary)
  • Ghee (clarified butter)
  • Optional oblations of grain-cakes/food offerings according to the rite

Frequently Asked Questions

It invites Indra to come close to the soma offering, praises his unmatched power and generosity, and teaches that trust in Indra leads to strength and victory, ending with a prayer for protection from hidden dangers.

Because the hymn presents śraddhā as the inner force that moves a person toward vāja—winning power, abundance, and success—by aligning the worshipper with Indra’s help.

On the outer level it is a plea to pass safely through obstacles and dangers; on the inner level it suggests going beyond limiting conditions—fear, confusion, and hostile forces—through Indra’s support.

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