Rig Veda Sukta 30
Mandala 7Sukta 305 Mantras

Sukta 30

Sukta 7.30

Rishi

Vasiṣṭha (mandala 7 is Vasiṣṭha-family; RV 7.30 traditionally Vasiṣṭha)

Devata

Indra

Chandas

Triṣṭubh (common for Indra hymns in this mandala; probable here)

वसिष्ठ-परंपरा का यह संक्षिप्त इन्द्र-सूक्त ‘महाबली’ को सामर्थ्य सहित आने, उपासक के धन-वैभव को बढ़ाने और संघर्ष में विजयी प्रभुत्व स्थापित करने के लिए आह्वान करता है। इसमें इन्द्र की युद्ध-दीप्ति—रणों में प्रकाश-ध्वजा उठाने वाली—को अग्नि के अंतःस्थित पुरोहितत्व से जोड़ा गया है, जो कल्याण हेतु देवों का आह्वान करता है। सूक्त का उपसंहार इन्द्र की स्तुति में है—महान धन देने वाले और ‘ब्रह्म’ रचने वाले गायक के सुनिश्चित सहायक के रूप में—और अंत में निरंतर रक्षा तथा मंगल की प्रार्थना की गई है।

Mantras

Mantra 1

आ नो देव शवसा याहि शुष्मिन्भवा वृध इन्द्र रायो अस्य । महे नृम्णाय नृपते सुवज्र महि क्षत्राय पौंस्याय शूर ॥

हे देव, अपने बल के साथ हमारे पास आओ; हे इन्द्र, इस समृद्धि के तुम हमारे लिए वर्धक बनो। हे नृपते, हे सुवज्रधारी, महान नृम्ण के लिए—हाँ, विशाल क्षत्र और पौंस्य (वीर-शक्ति) के लिए—हे शूर, हमारे लिए हो।

Mantra 2

हवन्त उ त्वा हव्यं विवाचि तनूषु शूराः सूर्यस्य सातौ । त्वं विश्वेषु सेन्यो जनेषु त्वं वृत्राणि रन्धया सुहन्तु ॥

वे दूर तक गूँजने वाले वचन से तुम्हें—हव्य (आहुति) रूप—पुकारते हैं; सूर्य की विजय-प्राप्ति में, देहों के भीतर स्थित वे शूरवीर। तुम सब जनों में सेन्य (रण-योग्य) हो; तुम वृत्रों (अवरोधक शक्तियों) को वश में कर देते हो, ताकि वे सुहन्तु—भली प्रकार आहत होकर निहत हों।

Mantra 3

अहा यदिन्द्र सुदिना व्युच्छान्दधो यत्केतुमुपमं समत्सु । न्यग्निः सीददसुरो न होता हुवानो अत्र सुभगाय देवान् ॥

हे इन्द्र, जब उज्ज्वल दिन फूट पड़ते हैं और तुम संग्रामों में प्रकाश का परम केतु (ध्वज) स्थापित करते हो, तब अग्नि हमारे भीतर असुर (स्वामी) के समान होता बनकर विराजता है—यहीं सु-भग (आत्म-कल्याण) के लिए देवों का आह्वान करता हुआ।

Mantra 4

वयं ते त इन्द्र ये च देव स्तवन्त शूर ददतो मघानि । यच्छा सूरिभ्य उपमं वरूथं स्वाभुवो जरणामश्नवन्त ॥

हे इन्द्र, हे देव, हे शूर, हम और वे जो तुम्हारी स्तुति करते हैं—जो मघ (समृद्धि के दान) देते हैं—उन सूरीभ्यः (ऋषि-स्वामियों) को परम वरूथ (रक्षा) प्रदान करो, ताकि स्वाभुवः (अपने ही सामर्थ्य से) वे जरणा—धैर्यपूर्वक टिकने और कर्म में परिपक्व होने की शक्ति—को प्राप्त करें।

Mantra 5

वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः । यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

आओ, हम इस इन्द्र—मघवान्—का ही स्तवन करें; क्योंकि वही हमें महान् धन-सम्पदा, पूर्णता का वैभव और राधस् (उदार दान) की प्रचुरता प्रदान करता है। जो अर्चना करने वाले, ब्रह्म-रचना करने वाले के लिए अत्यन्त सहायक है—हे देवगण, आप स्वस्ति-भावों से सदा हमारी रक्षा करें।

Frequently Asked Questions

It asks Indra to come with strength, increase the worshiper’s wealth and fullness, grant victorious sovereignty in struggles, and protect the community with lasting well-being.

It portrays victory as the establishment of clear, divine radiance in conflict—Indra’s power brings both triumph and illumination, guiding the rite and the fighters toward order and success.

Agni appears as the operative priest (hotṛ) within the sacrifice: when Indra establishes the light, Agni ‘seats himself’ and invokes the gods for the worshiper’s good fortune, supporting Indra’s boon-giving.

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