
Sukta 7.29
Vasiṣṭha (traditional)
Indra (Soma as offering-substance)
Triṣṭubh (probable; requires verification)
यह संक्षिप्त वसिष्ठ-रचित सूक्त इन्द्र को सोम-यज्ञ के पेषण-स्थल पर आमंत्रित करता है—उसे शीघ्र आने, भली-भाँति निचोड़े गए सोम का पान करने और उदार दान (मघानि) प्रदान करने के लिए प्रेरित करता है। इसमें आत्मविश्वासपूर्ण स्तुति के साथ एक स्पष्ट प्रश्न भी है कि कौन-सा अर्पण वास्तव में इन्द्र को तृप्त कर सकता है; फिर यह इन्द्र के सत्य वचन को कहने की प्रतिज्ञा तथा स्थायी कल्याण और संरक्षण के लिए प्रार्थना में परिणत होता है।
Mantra 1
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्व आ तु प्र याहि हरिवस्तदोकाः । पिबा त्वस्य सुषुतस्य चारोर्ददो मघानि मघवन्नियानः ॥
हे इन्द्र, यह सोम तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है; हे हरिवस्, इस यज्ञ-गृह की ओर आगे आओ। इस सु-निचोड़े, मनोहर रस का पान करो; फिर हे मघवन्, हमारी ओर आते हुए समृद्धि के वरदान प्रदान करो।
Mantra 2
ब्रह्मन्वीर ब्रह्मकृतिं जुषाणोऽर्वाचीनो हरिभिर्याहि तूयम् । अस्मिन्नू षु सवने मादयस्वोप ब्रह्माणि शृणव इमा नः ॥
हे वीर इन्द्र, ब्रह्मन्वीर, ब्रह्म-कृति में रमण करते हुए अपने हरि-रथों सहित शीघ्र हमारी ओर आओ। इसी सोम-सवन में आनंदित हो; और हमारे निकट आकर इन हमारे ब्रह्म-उच्चारों को सुनो।
Mantra 3
का ते अस्त्यरंकृतिः सूक्तैः कदा नूनं ते मघवन्दाशेम । विश्वा मतीरा ततने त्वायाधा म इन्द्र शृणवो हवेमा ॥
हे मघवन्! हमारे सु-उच्चारित सूक्तों से तुम्हारे लिए कौन-सी पर्याप्त अर्पण-भेंट है? और कब, सचमुच, हम तुम्हें तृप्त कर सकेंगे? हमारी समस्त मतियाँ (विचार-प्रेरणाएँ) तुम्हारी ओर फैल गई हैं; अब, हे इन्द्र, हमारे इस हवन/आह्वान को सुनो।
Mantra 4
उतो घा ते पुरुष्या इदासन्येषां पूर्वेषामशृणोॠषीणाम् । अधाहं त्वा मघवञ्जोहवीमि त्वं न इन्द्रासि प्रमतिः पितेव ॥
और निश्चय ही वे मनुष्य-सम्बन्धी सहायताएँ तुम्हारी ही थीं—उन पूर्व ऋषियों के लिए, जिनकी तुमने वाणी सुनी। इसलिए अब मैं तुम्हें पुकारता हूँ, हे मघवन्; हे इन्द्र, तुम हमारे लिए पिता के समान ‘प्रमति’—मार्गदर्शक संरक्षण और विवेकपूर्ण पूर्वचिन्ता—हो।
Mantra 5
वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः । यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हम इस इन्द्र—इस मघवान्—का यथार्थ वचन उच्चारें; जो हमें देते हुए महान् रयि और उदार राधस् (समृद्धि) प्रदान करता है। जो अर्चक (स्तुतिकर्ता) की ‘ब्रह्मकृति’—मन्त्र-शक्ति की रचना—में सबसे अधिक सहायक है; हे इन्द्र की शक्तियो, तुम सदा स्वस्तिभिः (कल्याण-आशीषों) से हमारी रक्षा करो।
It is a short hymn where Vasiṣṭha calls Indra to come to the sacrifice, drink the well-pressed Soma, and then grant strength, wealth, and well-being to the worshippers.
Soma is the offered substance that ‘invites’ Indra; the hymn follows the Vedic idea that Indra, pleased by Soma and praise, responds by giving protection and abundance.
Svasti means well-being, safety, and right-going good fortune. The hymn ends by asking that Indra’s protective powers keep the community in lasting welfare.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.