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Sukta 7.25
Vasiṣṭha
Indra
Triṣṭubh
वसिष्ठ का यह छह-ऋचा त्रिष्टुभ सूक्त इन्द्र का आह्वान करता है—उग्र, संग्राम का अग्रणी और रक्षक—जिसकी वज्र-शक्ति सेना को स्थिर करती और विजय सुनिश्चित करती है। कवि इन्द्र से प्रार्थना करता है कि वे एकाग्र रहें, प्रतिदिन स्थायी आश्रय और रक्षा प्रदान करें, तथा उपासकों को समृद्धि, बल और कल्याण से परिपूर्ण करें।
Mantra 1
आ ते मह इन्द्रोत्युग्र समन्यवो यत्समरन्त सेनाः । पताति दिद्युन्नर्यस्य बाह्वोर्मा ते मनो विष्वद्र्यग्वि चारीत् ॥
हे उग्र इन्द्र, तेरी महान् सहायता की ओर, जब सेनाएँ संग्राम के लिए भिड़ती हैं, तब वे एक ही आवेग में एकत्र होती हैं। नर्य (वीर) की बाहुओं से विद्युत् उछल पड़ती है; तेरा मन सर्वत्र तिर्यक्-तिर्यक् भटकता न रहे।
Mantra 2
नि दुर्ग इन्द्र श्नथिह्यमित्राँ अभि ये नो मर्तासो अमन्ति । आरे तं शंसं कृणुहि निनित्सोरा नो भर सम्भरणं वसूनाम् ॥
दुर्ग (कठिन मार्ग/संकट) में, हे इन्द्र, उन अमित्रों को चूर कर—वे मर्त्य जो हम पर चढ़ आते हैं और हमें क्षीण करना चाहते हैं। निन्दक की उस पुकार को दूर कर दे; और हमारे लिए वसुओं का सम्भरण—धनों का संचित, ऐश्वर्यों का समाहार—ले आ।
Mantra 3
शतं ते शिप्रिन्नूतयः सुदासे सहस्रं शंसा उत रातिरस्तु । जहि वधर्वनुषो मर्त्यस्यास्मे द्युम्नमधि रत्नं च धेहि ॥
हे शिप्रिन्! सुदास (सत्-दाता) के लिए तेरी सौ सहायताएँ हों; सहस्र स्तुतियाँ हों, और तेरी दान-रति भी हो। जो मर्त्य घात करने को उद्यत है, उसके वध-शस्त्र को तू नष्ट कर; और हममें द्युम्न (तेजस्वी यश/प्रभा) तथा रत्न-धन धारण कर।
Mantra 4
त्वावतो हीन्द्र क्रत्वे अस्मि त्वावतोऽवितुः शूर रातौ । विश्वेदहानि तविषीव उग्रँ ओकः कृणुष्व हरिवो न मर्धीः ॥
हे इन्द्र! मैं क्रतु (संकल्प-शक्ति) में तेरा ही हूँ; हे शूर! रक्षा-पालन में, दान में भी तेरा ही हूँ। हे उग्र, तविषीवान! सब दिनों में, हे हरिवः, हमारे लिए दृढ़ ओकस् (आश्रय-गृह) बना; हमें न छोड़।
Mantra 5
कुत्सा एते हर्यश्वाय शूषमिन्द्रे सहो देवजूतमियानाः । सत्रा कृधि सुहना शूर वृत्रा वयं तरुत्राः सनुयाम वाजम् ॥
ये प्रेरणाएँ हर्यश्व (हरित-घोड़ों वाले) इन्द्र के लिए हैं—देवों द्वारा प्रेरित शक्तियाँ, जो सहस् (पराक्रम) की ओर अग्रसर हैं। हे शूर! सदा हमें वृत्रों (आवरण करने वालों) के सुहना (सु-हन्ता, उत्तम संहारक) बना; ताकि हम तरुत्र (विजयी/अतिक्रान्ता) होकर वाज (बल-समृद्धि) की पूर्णता प्राप्त करें।
Mantra 6
एवा न इन्द्र वार्यस्य पूर्धि प्र ते महीं सुमतिं वेविदाम । इषं पिन्व मघवद्भ्यः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे इन्द्र! इसी प्रकार हमारे लिए श्रेष्ठतम ऐश्वर्य-सम्पदा को पूर्ण कर। हम तेरी विशाल सुमति (सद्बुद्धि/कल्याणकारी अनुग्रह) को प्राप्त करें और धारण करें। दानशील यजमानों को सुवीर (वीर-संतति/वीर-शक्ति) युक्त बल-प्रेरणा बढ़ा; और तुम हमें सदा स्वस्ति-कल्याणों से सुरक्षित रखो।
It asks Indra for focused, unwavering help—especially in moments of conflict—along with a strong, lasting shelter (okaḥ), abundance, strength, and continual well-being (svasti).
The poet prays that Indra’s intention and power remain concentrated, so protection and victory are decisive rather than scattered or delayed.
Okaḥ is a “dwelling” or “secure place”—a symbol of stable protection, a firm home-base for the community, and a settled condition of safety maintained “through all the days.”
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