Rig Veda Sukta 24
Mandala 7Sukta 246 Mantras

Sukta 24

Sukta 7.24

Rishi

Vasiṣṭha

Devata

Indra

Chandas

Triṣṭubh (probable)

यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र बहु-आहूत प्रभु को यज्ञ में सजाए गए आसन पर आमंत्रित करता है—उनसे निवेदन है कि वे अपनी शक्तियों सहित आएँ, ब्रह्म (पवित्र वाणी) में आनन्द लें, और उपासकों को विजयी बल से सुदृढ़ करें। कवि रक्षा, अवकाश/विस्तार (दबावों व बाधाओं का निवारण), धन-सम्पदा, तथा वह प्रेरक ऊर्जा माँगता है जो उदार यजमानों और वीर सन्तान को स्थिर रखती है। अंत में इन्द्र और उनके सहायक देव-गणों के अधीन स्थायी कल्याण (स्वस्ति) की प्रार्थना की जाती है।

Mantras

Mantra 1

योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहूत प्र याहि । असो यथा नोऽविता वृधे च ददो वसूनि ममदश्च सोमैः ॥

हे इन्द्र, तेरे सदन में तेरा आसन—तेरे प्राकट्य की योनि—तैयार किया गया है; हे पुरुहूत, मनुष्यों के साथ/नरों सहित वहाँ आ। ताकि तू हमारे लिए वृद्धि में रक्षक बने, वसुओं को प्रदान करे, और सोमों से प्रमुदित हो।

Mantra 2

गृभीतं ते मन इन्द्र द्विबर्हाः सुतः सोमः परिषिक्ता मधूनि । विसृष्टधेना भरते सुवृक्तिरियमिन्द्रं जोहुवती मनीषा ॥

हे इन्द्र, द्विबर्हा—दुगुनी शक्ति से निचोड़ा गया—सोम, जिसके मधुर रस चारों ओर परिषिक्त हैं, तेरे मन को पकड़कर बाँध लेता है। यह सुव्यक्त वाणी, समृद्धि की धाराओं को मुक्त करती हुई, आगे बढ़ती है—यह मनीषा इन्द्र को हर्ष और वृद्धि के लिए आह्वान करती है।

Mantra 3

आ नो दिव आ पृथिव्या ऋजीषिन्निदं बर्हिः सोमपेयाय याहि । वहन्तु त्वा हरयो मद्र्यञ्चमाङ्गूषमच्छा तवसं मदाय ॥

हे ऋजीषिन् (इन्द्र)! स्वर्ग से और पृथ्वी से हमारे पास आ; सोमपान के लिए इस बर्हि (यज्ञासन) पर आ। तेरे हरि (ताम्रवर्ण) अश्व तुझे यहाँ लाएँ—हमारे आङ्गूष (प्रेरित स्तुति-गान) के पास—हे बलवान्, मद (उन्माद/आनन्द) के लिए।

Mantra 4

आ नो विश्वाभिरूतिभिः सजोषा ब्रह्म जुषाणो हर्यश्व याहि । वरीवृजत्स्थविरेभिः सुशिप्रास्मे दधद्वृषणं शुष्ममिन्द्र ॥

हे हर्यश्व इन्द्र! सर्व प्रकारच्या ऊतियों (सहायताओं) के साथ, एक ही भाव से, ब्रह्म (पवित्र वचन/स्तुति) में आनन्द लेते हुए हमारे पास आ। हे सुशिप्र (सुन्दर-ओष्ठ) ! स्थिर/बलवान जनों के साथ विस्तृत स्थान बनाते हुए, हम में वृषण (वृषभ-सदृश) बल, तीव्र शुष्म (प्रचण्ड पराक्रम) धारण कर।

Mantra 5

एष स्तोमो मह उग्राय वाहे धुरीवात्यो न वाजयन्नधायि । इन्द्र त्वायमर्क ईट्टे वसूनां दिवीव द्यामधि नः श्रोमतं धाः ॥

यह स्तोम महान, उग्र के लिए—वाहक के लिए—धुरीवात्य (जुए में जुते) अश्व की भाँति, बल-समृद्धि के लिए प्रेरित होकर स्थापित किया गया है। हे इन्द्र! यह अर्क (स्तुति-ऋचा) तुझसे वसुओं (धनों) की याचना करता है; हमारे लिए ऐसी श्रवणीय कीर्ति/प्रसिद्धि स्थापित कर, जो दिवि के समान ऊँची हो, जो द्यौ (प्रकाशमय लोक) पर अधिष्ठित हो।

Mantra 6

एवा न इन्द्र वार्यस्य पूर्धि प्र ते महीं सुमतिं वेविदाम । इषं पिन्व मघवद्भ्यः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

ऐसे ही, हे इन्द्र, हमारे लिए श्रेष्ठ वर्य (वरणीय) ऐश्वर्यों की पूर्ति कर; हम तेरी महान् सुमति (सद्बुद्धि/सदनुग्रह) को प्राप्त करें। दानशील मगधों (मघवद्भ्यः) के लिए वीर्यसम्पन्न इषा (प्रेरणा/पोषक शक्ति) को बढ़ा; और तुम हमें सदा स्वस्तिभिः (कल्याणों) से सुरक्षित रखो।

Frequently Asked Questions

The hymn invites Indra to the ritual seat and asks him to protect the community, widen their space (remove pressures and obstacles), and grant strength, wealth, and well-being.

It describes the sacrificial place as a prepared dwelling for Indra’s presence—an established locus where praise and offerings can effectively draw the deity and his powers.

The closing prayer can include Indra together with his accompanying helpers (often envisioned as allied divine powers such as the Maruts or protective forces), asking collective guardianship through svasti.

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