Rig Veda Sukta 8
Mandala 6Sukta 87 Mantras

Sukta 8

Sukta 6.8

Rishi

Bharadvāja (Bārhaspatya) (traditional for RV 6.8)

Devata

Agni Vaiśvānara / Jātavedas

Chandas

Triṣṭubh

यह सूक्त अग्नि को वैश्वानर और जातवेदस् के रूप में स्तुत करता है—उस सार्वभौम अग्नि को जो समस्त जन्मों को जानती है, यज्ञ को वहन करती है, अपनी अरुण-रक्तिम शक्ति से दीप्त है और वेग से यज्ञसभा में उपस्थित होती है। इसमें मातरिश्वन् द्वारा दूरस्थ लोक से अग्नि को लाए जाने की पौराणिक कथा का स्मरण है, और अग्निदेव से प्रार्थना की गई है कि वे समुदाय, उसके नायकों तथा यजमान-पालकों की रक्षा करें और उन्हें समस्त संकटों के पार सुरक्षित उतार दें।

Mantras

Mantra 1

पृक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू सहः प्र नु वोचं विदथा जातवेदसः । वैश्वानराय मतिर्नव्यसी शुचिः सोम इव पवते चारुरग्नये ॥

अब मैं अरुष (रक्ताभ) वृषभ—ज्वलन्त बलवान—की शक्ति को विदथा (यज्ञ-सभाओं) में जातवेदस् के लिए प्रकट कहता हूँ। वैश्वानर के लिए नवीना, शुचि मति निथरती है; वह सोम के समान पवमान होकर—स्वच्छ, चारु—अग्नि की ओर बहती है।

Mantra 2

स जायमानः परमे व्योमनि व्रतान्यग्निर्व्रतपा अरक्षत । व्यन्तरिक्षममिमीत सुक्रतुर्वैश्वानरो महिना नाकमस्पृशत् ॥

वह जन्म लेते ही परम व्योम में, व्रतपा अग्नि ने व्रतों की रक्षा की। सुक्रतु होकर उसने अन्तरिक्ष को नापा; वैश्वानर ने महिमा से नाक (स्वर्ग) को स्पर्श किया।

Mantra 3

व्यस्तभ्नाद्रोदसी मित्रो अद्भुतोऽन्तर्वावदकृणोज्ज्योतिषा तमः । वि चर्मणीव धिषणे अवर्तयद्वैश्वानरो विश्वमधत्त वृष्ण्यम् ॥

अद्भुत मित्र के समान उसने दोनों लोकों को स्थिर किया; ज्योति से तमस् को भीतर ही चीरकर उजागर किया। जैसे दो चर्म फैलाए जाते हैं, वैसे ही उसने दोनों धिषणाओं को विस्तृत किया; वैश्वानर ने समस्त विश्व में वृष्ण्य—वृषभ-बल—को धारण कराया।

Mantra 4

अपामुपस्थे महिषा अगृभ्णत विशो राजानमुप तस्थुॠग्मियम् । आ दूतो अग्निमभरद्विवस्वतो वैश्वानरं मातरिश्वा परावतः ॥

अपां के उपस्थ में महिषों ने उसे ग्रहण किया; जन-जन अपने ऋग्मय राजा के पास आ खड़े हुए। दूत मातरिश्वा, परावत से, विवस्वत् से अग्नि को—वैश्वानर को—ले आया।

Mantra 5

युगेयुगे विदथ्यं गृणद्भ्योऽग्ने रयिं यशसं धेहि नव्यसीम् । पव्येव राजन्नघशंसमजर नीचा नि वृश्च वनिनं न तेजसा ॥

युग-युग में, विदथों में स्तुति करने वालों के लिए, हे अग्ने, हमारे भीतर यशस्वी, नवतर रयि धारण कर। हे राजन्, पव की भाँति अघशंस—दुष्ट-वाणी—को काट दे; हे अजर, तेज से उसे नीचे गिरा, जैसे वृक्ष काटा जाता है।

Mantra 6

अस्माकमग्ने मघवत्सु धारयानामि क्षत्रमजरं सुवीर्यम् । वयं जयेम शतिनं सहस्रिणं वैश्वानर वाजमग्ने तवोतिभिः ॥

हे अग्नि, हमारे लिए—मघवतों (समृद्ध, तेजस्वियों) के बीच—अजर, अविच्छिन्न क्षत्र (अधिकार-बल) और सुवीर्य (वीर-शक्ति) को धारण कर। हे वैश्वानर, हे अग्नि, तेरी ओतियों (सहायताओं) से हम शतगुण और सहस्रगुण वाज (बल-समृद्धि/विजय) को जीतें।

Mantra 7

अदब्धेभिस्तव गोपाभिरिष्टेऽस्माकं पाहि त्रिषधस्थ सूरीन् । रक्षा च नो ददुषां शर्धो अग्ने वैश्वानर प्र च तारीः स्तवानः ॥

हे इष्ट (प्रिय) त्रिषधस्थ, तेरे अदब्ध गोपाओं (अचूक रक्षकों) से हमारे सूरीन् (प्रकाशमान नायकों) की रक्षा कर; उन्हें सुरक्षित रख। और हे अग्नि, दान देने वालों के हमारे शर्ध (समूह) की भी रक्षा कर। हे वैश्वानर अग्नि, स्तुत होकर, हमें शत्रुतापूर्ण पारों से पार कर, आगे भी ले चल।

Frequently Asked Questions

Agni, especially as Vaiśvānara (the universal fire) and Jātavedas (the fire who knows all births and origins).

It recalls that Agni was brought from a distant, divine realm associated with Vivasvat, carried as a messenger by Mātariśvan—so the human ritual fire is linked to a cosmic source.

To kindle and honor Agni for clarity and power in the sacrifice, and to ask for protection of the community—especially its leaders and patrons—and for safe passage through dangers and obstacles.

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