
Sukta 6.75
Bharadvāja (traditional for RV 6.75, the ‘armor/bow’ hymn)
Weapons/Armor (Varman), martial protection (often treated as addressed power rather than a personal god)
Triṣṭubh (common for this sukta; exact scan recommended)
ऋग्वेद 6.75 एक युद्ध-रक्षा सूक्त है, जो योद्धा के उपकरणों—कवच, धनुष, बाण और रथ-सज्जा—का मानो अभिषेक/संस्कार करता है, ताकि वह अजेय शक्ति की ढाल से आच्छादित होकर रण में उतरे। यह सूक्त सजीव रण-चित्रों से आगे बढ़कर अनेक दैवी शक्तियों से परत-दर-परत संरक्षण का आवाहन करता है और अंत में यह प्रतिपादित करता है कि सर्वोच्च रक्षा स्वयं ब्रह्मन् है—पवित्र वाणी/शब्द, जो भीतर का कवच बनता है।
Mantra 1
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे । अनाविद्धया तन्वा जय त्वं स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु ॥
जैसे मेघ का मुख-सा प्रतीक होता है, वैसे ही रूप होता है जब कवचधारी योद्धा संग्राम की गोद में प्रवेश करता है। अविद्ध (अभेद्य) देह के साथ तू विजय पा; और कवच का महिमा तुझे परिपूर्ण करे, तुझे समग्र बनाए।
Mantra 2
धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम । धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम ॥
धनुष से हम गौओं (प्रकाश-रश्मियों) को जीतें; धनुष से हम संग्राम को जीतें; धनुष से हम तीव्र समर-उन्मादों को जीतें। धनुष शत्रु की कामना/इच्छा को निष्फल कर देता है; धनुष से हम समस्त दिशाओं को जीतें।
Mantra 3
वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रियं सखायं परिषस्वजाना । योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इयं समने पारयन्ती ॥
स्त्री की अभिलाषा-सी, वह बार-बार कान तक आती है, प्रिय सखा को आलिंगन करती हुई। पत्नी की भाँति वह अपने को सजाती है—यह धनु-डोरी, धनुष पर तनी हुई, समर में पार उतारने वाली।
Mantra 4
ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे । अप शत्रून्विध्यतां संविदाने आर्त्नी इमे विष्फुरन्ती अमित्रान् ॥
समर में चलती हुई स्त्री-सी, और माता की भाँति पुत्र को गोद में धारण करने वाली—संविदा (एकमत होकर) कार्य करती हुई ये धनुष के दो सिरे शत्रुओं को बेधकर दूर करें। ये दो आर्त्नी (भुजाएँ/सिरे), कंपित होती हुई, अमित्रों को चूर-चूर करें।
Mantra 5
बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य । इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः ॥
बहुतों का पिता, बहुत-समृद्धि का पुत्र—वह संग्राम-समागम में प्रविष्ट होकर सबको गढ़ता और सम्यक् क्रम में रखता है। इषुधि, कवच-उपकरण और समस्त युद्ध पीठ पर बँधे हुए—प्रेषित योद्धा विजय पाता है।
Mantra 6
रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्रयत्र कामयते सुषारथिः । अभीशूनां महिमानं पनायत मनः पश्चादनु यच्छन्ति रश्मयः ॥
रथ पर स्थित होकर सुषारथि वाजियों को आगे ले जाता है—जहाँ-जहाँ वह चाहता है। लगामों के महिमान का स्तवन करो; रश्मियाँ (रेखाएँ) पीछे-पीछे मन का अनुसरण करती हुई उसे थामे रहती हैं।
Mantra 7
तीव्रान्घोषान्कृण्वते वृषपाणयोऽश्वा रथेभिः सह वाजयन्तः । अवक्रामन्तः प्रपदैरमित्रान्क्षिणन्ति शत्रूँरनपव्ययन्तः ॥
तीव्र घोष करते हुए, वृष-पाणि अश्व—रथों के साथ जुते हुए—बल-समृद्धि को आगे बढ़ाते हैं। अग्रगामी पदों से वे अमित्रों को रौंदते हैं, शत्रुओं को क्षीण करते हैं—यात्रा से कभी न हटते हुए।
Mantra 8
रथवाहनं हविरस्य नाम यत्रायुधं निहितमस्य वर्म । तत्रा रथमुप शग्मं सदेम विश्वाहा वयं सुमनस्यमानाः ॥
‘रथवाहन’ इस हवि-स्थल का नाम है, जहाँ इसका आयुध और उसका वर्म (कवच) रखे जाते हैं। वहीं हम विजयी रथ के समीप जाएँ और आसन ग्रहण करें—सर्वदा, हम सुमन (शुभ-मन) धारण करते हुए।
Mantra 9
स्वादुषंसदः पितरो वयोधाः कृच्छ्रेश्रितः शक्तीवन्तो गभीराः । चित्रसेना इषुबला अमृध्राः सतोवीरा उरवो व्रातसाहाः ॥
हे पितरः—मधुर-सभा वाले, हमारी आयु-धारा (जीवन-वृद्धि) को धारण करने वाले; संकट में आश्रित, गभीर और शक्तिवान। चित्रसेना, इषु-बल से समर्थ, अमृध्र (अविश्वासी/अधोखा न देने वाले); सत्य-वीर, व्यापक, व्रात-साह (घेरने वाले दलों को जीतने वाले)।
Mantra 10
ब्राह्मणासः पितरः सोम्यासः शिवे नो द्यावापृथिवी अनेहसा । पूषा नः पातु दुरितादृतावृधो रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत ॥
ब्राह्मण-पितर, सोम्य (सोम-समृद्ध) पितृगण, हम पर शिव (अनुग्रह) हों; द्यावा-पृथिवी हमें अनिहस (अक्लेश) विस्तार दें। ऋत-वर्धक पूषन् हमें दुरित से बचाएँ; रक्षा करें—कोई अघशंस (दुष्ट-वक्ता) हम पर अधिकार न जमाए।
Mantra 11
सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता । यत्रा नरः सं च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यंसन् ॥
वह सु-पर्ण (सुन्दर पंखों वाला) धारण करती है; उसका ‘दाँत’ मृग (वन्य पशु) है। गोभिः (गौ-रश्मियों/किरणों) से बँधी हुई, मुक्त किए जाने पर वह उड़ पड़ती है। जहाँ नर (योद्धा) एकत्र होकर भी दौड़ते और बिखरते हैं, वहीं हमारे लिए ये इषवः (बाण) शरण-रक्षा पहुँचाएँ—नियोजित शक्तियाँ हमारे लिए आघात नहीं, कवच बनें।
Mantra 12
ऋजीते परि वृङ्धि नोऽश्मा भवतु नस्तनूः । सोमो अधि ब्रवीतु नोऽदितिः शर्म यच्छतु ॥
हे ऋजीते (सीधा करने वाले), हमें चारों ओर से घेरकर बढ़ा—अश्मा (पत्थर) हमारे लिए तनू (देह) बन जाए। सोम हमारे भीतर वाणी बोले; अदिति हमें शान्ति और शरण प्रदान करे।
Mantra 13
आ जङ्घन्ति सान्वेषां जघनाँ उप जिघ्नते । अश्वाजनि प्रचेतसोऽश्वान्त्समत्सु चोदय ॥
वे उनके सानु (कगारों/ढलानों) पर कूद पड़ते हैं; उनके जघन (पिछले भाग) पर प्रहार करते हैं। हे अश्वाजनि (अश्व-जनक), हे प्रचेतस (प्रखर-चेतन शक्ति), समत्सु (युद्धों) में अश्वों को आगे बढ़ा—शक्तियों को निर्णायक अग्रगमन के लिए प्रेरित कर।
Mantra 14
अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः ॥
सर्प के समान अपने भोगों से वह भुजा को चारों ओर से घेर लेता है, और अधिक प्रबल अस्त्र को भी परे हटाता है। हस्तघ्न—जो समस्त उपायों/विधानों को जानने वाला है—वह पुरुष-शक्ति, उस पुरुष की सब दिशाओं से रक्षा करे।
Mantra 15
आलाक्ता या रुरुशीर्ष्ण्यथो यस्या अयो मुखम् । इदं पर्जन्यरेतस इष्वै देव्यै बृहन्नमः ॥
लालिमा से रँगी हुई, दीप्तिमान शीर्ष वाली, और जिसका मुख लोहे का है—उस देवी ‘इषु’ (बाण) को यह महान नमस्कार। पर्जन्य के रेतस् (बीज) से उत्पन्न, वह दिव्य, बृहद् नमः—वर्षण-शक्ति की तीव्र साधना है।
Mantra 16
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते । गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः ॥
छोड़ी गई, दूर उड़ जा, हे शरव्ये—ब्रह्म से तीक्ष्ण की हुई। शत्रुओं के पास जा, उन पर आ गिर; उनमें से किसी को भी शेष न छोड़। परन्तु तेरे जो अवशेष हों, उनसे मुझे अछूता रख।
Mantra 17
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव । तत्रा नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥
जहाँ बाण एकत्र होकर घनीभूत होकर गिरते हैं, जैसे शिखाहीन कुमार एक साथ उमड़ पड़ते हों—वहीं ब्रह्मणस्पति और अदिति हमें शान्ति और आश्रय प्रदान करें; वे हमें सर्वदा, सर्वत्र, हर प्रकार से वही रक्षण दें।
Mantra 18
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम् । उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु ॥
मैं तुम्हारे मर्मस्थानों को कवच से ढाँकता हूँ; सोम-राजा तुम्हें अमृतत्व से आवृत करे। वरुण तुम्हारे लिए और भी विस्तृत, अधिक सुरक्षित अवकाश रचे; विजय की ओर बढ़ते हुए तुममें देवगण आनन्दित हों।
Mantra 19
यो नः स्वो अरणो यश्च निष्ट्यो जिघांसति । देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम् ॥
जो हमारा अपना हो या पराया, जो हमें मार गिराने की इच्छा करे—उसको सब देवगण दबा दें, पीछे धकेल दें; क्योंकि मेरे भीतर ब्रह्म का कवच है—सत्य-वाणी की रक्षक शक्ति।
It is a protection hymn that empowers a warrior’s armor and weapons through mantra, asking for an unpierced body, safe space, and the turning back of hostility.
The main addressed power is Varman—armor/weaponry as protective force—while the hymn also calls on Ancestors, Heaven-and-Earth, Pūṣan, and All Gods to complete the protection.
Beyond physical armor, the hymn says the strongest shield is brahman—the sacred, truth-charged Word—described as “my inner armor” that guards against enemies and fear.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.