
Sukta 6.72
Bharadvāja Bārhaspatya (traditional for Mandala 6); hymn to Indra-Soma
Indra and Soma (dual)
Triṣṭubh (probable; typical for heroic Indra hymns and cadence here)
यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ्-छन्द का सूक्त युगल देवता इन्द्र और सोम की स्तुति करता है—उन्हें आदिकालीन स्रष्टा-शक्तियाँ बताता है जो सूर्य को प्रकट करते हैं और भीतर-बाहर के अन्धकार का नाश करते हैं। इसमें उनके वीर कर्म का स्मरण है कि उन्होंने वृत्र का वध कर जलों को मुक्त किया, नदियों और समुद्रों का विस्तार किया। अंत में वही ब्रह्माण्डीय विजय मनुष्यों के लिए वरदान बनती है—जन के लिए रक्षक बल, पुरुषार्थपूर्ण पराक्रम और संग्राम-विजयी शक्ति प्रदान करने वाली।
Mantra 1
इन्द्रासोमा महि तद्वां महित्वं युवं महानि प्रथमानि चक्रथुः । युवं सूर्यं विविदथुर्युवं स्वर्विश्वा तमांस्यहतं निदश्च ॥
हे इन्द्र और सोम, महान है तुम्हारा वह महत्त्व; तुम दोनों ने प्रथम महान कर्म-प्रवृत्तियाँ रचीं। तुमने सूर्य को और स्वः (स्वर्) को खोज निकाला; तुमने सब तमसों को और भीतर की शत्रु-नाद (निदस्) को भी आहत कर गिरा दिया।
Mantra 2
इन्द्रासोमा वासयथ उषासमुत्सूर्यं नयथो ज्योतिषा सह । उप द्यां स्कम्भथुः स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि ॥
हे इन्द्र–सोम! तुम उषा को प्रकाशित करते हो और ज्योति-शक्ति के साथ सूर्य को अग्रसर करते हो। अपने स्कम्भन-बल से तुम द्युलोक को थामते हो; और माता पृथ्वी को विस्तार देकर व्यापक करते हो।
Mantra 3
इन्द्रासोमावहिमपः परिष्ठां हथो वृत्रमनु वां द्यौरमन्यत । प्रार्णांस्यैरयतं नदीनामा समुद्राणि पप्रथुः पुरूणि ॥
हे इन्द्र–सोम! जलों को घेरकर रखने वाले अहि को तुमने परास्त किया; तुम्हारे कर्म को द्यौः ने भी स्वीकारा। तुमने नदियों की धाराओं को प्रवाहित किया; और अनेक समुद्रों को फैलाकर परिपूर्ण किया।
Mantra 4
इन्द्रासोमा पक्वमामास्वन्तर्नि गवामिद्दधथुर्वक्षणासु । जगृभथुरनपिनद्धमासु रुशच्चित्रासु जगतीष्वन्तः ॥
हे इन्द्र–सोम! कच्चे में तुमने पक्कापन स्थापित किया; गो-रश्मियों (गवाम्) को तुमने उनके वक्षणों (बाड़ों) में रखा। जो बँधा न था, उसे तुमने पकड़ लिया—बहुरंगी जगतियों के भीतर, अंतःस्थ होकर, वह दीप्तिमान है।
Mantra 5
इन्द्रासोमा युवमङ्ग तरुत्रमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथे । युवं शुष्मं नर्यं चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनाषाहमुग्रा ॥
हे इन्द्र–सोम! तुम दोनों ने सचमुच रक्षक-बल (तरुत्रम्) प्रदान किया, भविष्य को जीतने वाला, श्रवणीय (श्रुत्य) सहायक बनाया। तुमने जनों के लिए वीर्ययुक्त पुरुषार्थ-बल (नर्य शुष्म) और संग्राम-विजयी पराक्रम को एकत्र कर व्यापक किया—हे उग्र, युद्ध-जय करने वाले (पृतनाषाह)!
They are praised as a paired power: Indra as the decisive warrior who breaks obstruction, and Soma as the sacred energizing force that strengthens gods and inspires clarity.
On the surface it recalls the myth of defeating Vṛtra who held back the waters; symbolically it means removing blockages so life, prosperity, and inner energy can flow again.
It presents Indra–Soma as revealers of light and higher radiance—dispelling darkness in the world and within the person, which supports courage, order, and right action.
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