Rig Veda Sukta 71
Mandala 6Sukta 716 Mantras

Sukta 71

Sukta 6.71

Rishi

Bharadvāja (Bārhaspatya)

Devata

Savitṛ (Savitar)

Chandas

Triṣṭubh

यह छह-ऋचा सूक्त सवितृ की स्तुति करता है—उस दिव्य प्रेरक की, जो उदित होकर अपनी स्वर्णिम भुजाएँ फैलाता है और लोक-लोकान्तरों में ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) को प्रवर्तित करता है। इसमें उनसे यज्ञ का अभिषेक कर उसे सामर्थ्य देने, उदार उपासक को समृद्धि प्रदान करने, तथा प्रेरित मनन और शुद्ध संकल्प के द्वारा प्रतिदिन ‘वांछित’ फल प्रदान करने की प्रार्थना की गई है।

Mantras

Mantra 1

उदु ष्य देवः सविता हिरण्यया बाहू अयंस्त सवनाय सुक्रतुः । घृतेन पाणी अभि प्रुष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो विधर्मणि ॥

उदित होता है वह देव सविता; स्वर्णमय बाहुओं को उसने सवन के लिए फैलाया है—शुक्रतु। घृत से वह अपने पाणि को अभि-प्रुष्णुते; मख में युवा, सुदक्ष, रजसों के विस्तृत धाम में विधर्मणि—ऋत का विधान स्थापित करता है।

Mantra 2

देवस्य वयं सवितुः सवीमनि श्रेष्ठे स्याम वसुनश्च दावने । यो विश्वस्य द्विपदो यश्चतुष्पदो निवेशने प्रसवे चासि भूमनः ॥

देव सविता की उस परम प्रेरणा (सवीमन) में, उसके वसुओं के दान में, हम श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त हों। क्योंकि हे व्यापक (भूमन्), तुम ही समस्त द्विपद और चतुष्पद के निवेशन (स्थापन) और प्रसव (प्रवर्तन/प्रसारण) के अधिपति हो।

Mantra 3

अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्ट्वं शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम् । हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत ॥

हे सवितः, अदब्ध (अच्युत) रक्षकों से, शुभ (शिव) संरक्षणों से, आज चारों ओर से हमारी गयम् (जीवन-शक्ति/प्राण) की रक्षा करो। हे हिरण्यजिह्व (स्वर्ण-जिह्व) देव, नव्य सुवित (नव-प्रकाशमय कल्याण) के लिए हमारी रक्षा करो—कोई अघशंस (दुष्ट-निंदा करने वाला) हम पर प्रभुत्व न पाए।

Mantra 4

उदु ष्य देवः सविता दमूना हिरण्यपाणिः प्रतिदोषमस्थात् । अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाशुषे सुवति भूरि वामम् ॥

उदित होता है वह देव सविता, गृह-निवासी (दमूना); स्वर्ण-हस्त होकर वह प्रत्येक संध्या में खड़ा होता है। अयोहनु (लौह-हनु) यज्य, मन्द्रजिह्व (मधुर/उन्मत्त जिह्व) होकर, दाशुष (दानकर्ता) के लिए वह बहुत-सा वामम् (कल्याण/सौभाग्य) प्रेरित करता है।

Mantra 5

उदू अयाँ उपवक्तेव बाहू हिरण्यया सविता सुप्रतीका । दिवो रोहांस्यरुहत्पृथिव्या अरीरमत्पतयत्कच्चिदभ्वम् ॥

ऊर्ध्व वह अपने बाहु फैलाता है, मानो कर्म को प्रेरित और नियोजित करने वाला उपवक्ता हो; सुवर्णमय सविता, सु-प्रतिका—शुभ रूप-प्रकाश वाला। वह पृथ्वी के विस्तार से उठकर द्युलोक की आरोहण-भूमियों पर चढ़ता है; वह सबको ऋत में स्थिर कर गति देता है, और अज्ञात-विस्तार (अभ्व) में भी उड़ता-सा प्रवर्तित होता है।

Mantra 6

वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवेदिवे वाममस्मभ्यं सावीः । वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम ॥

हे सवितर्, आज का वाम (वांछित) कल्याण, और कल का भी वाम कल्याण—दिन-प्रतिदिन हमारे लिए वाम को ही प्रेरित कर। क्योंकि हे देव, उस वाम-निवास—आनन्द के प्रचुर क्षय—के हम, इस धिया (विचार-इच्छा) और रयि (सम्पदा) के द्वारा, भागी (वामभाज) बनें।

Frequently Asked Questions

Savitṛ is the divine “Impeller” who sets things in motion—sun’s course, life’s activity, and the sacrifice. The hymn describes him with golden arms and hands that consecrate and energize the rite.

It repeatedly asks for vāmá—“the desirable good”: prosperity, well-being, and a secure share in Savitṛ’s abundant dwelling of delight, today and every day.

They are transition points when Savitṛ is invoked as the power that ‘turns on’ right movement and right order. The hymn explicitly places him at dusk and also portrays his rising, making it suitable for liminal ritual moments.

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