
Sukta 6.68
Bharadvāja (Bārhaspatya) tradition (Sukta 6.68).
Indra–Varuṇa (dual).
Triṣṭubh.
भरद्वाज-परम्परा का यह त्रिष्टुभ सूक्त इन्द्र–वरुण की युगल शक्तियों का आह्वान करता है, जो विजयकारी बल और धर्ममय ऋत-व्यवस्था—दोनों के संयुक्त रक्षक हैं। इसमें यज्ञ को पहले से सिद्ध और उनकी ओर ‘उन्मुख’ बताया गया है, और उनसे इष् (प्रेरणा), सुम्न (अनुग्रह), संग्रामों में रक्षा तथा विस्तृत समृद्धि (रयि) की याचना की गई है। सूक्त बार-बार इन्द्र की विघ्न-वधक पराक्रम-शक्ति को वरुण की ऋत-आधारित अधिराज्य-शक्ति से जोड़ता है, और प्रतिपादित करता है कि सफलता तभी सार्थक है जब वह सत्य/ऋत के अनुरूप हो।
Mantra 1
श्रुष्टी वां यज्ञ उद्यतः सजोषा मनुष्वद्वृक्तबर्हिषो यजध्यै । आ य इन्द्रावरुणाविषे अद्य महे सुम्नाय मह आववर्तत् ॥
तुम दोनों के लिए यज्ञ उद्यत है—समस्वर, समगति; मनुष्यों की रीति से बर्हि बिछा हुआ है, पूजन हेतु। वह आज महान् सुम्न (अनुग्रह) और महान् प्रेरणा के लिए, हे इन्द्र–वरुण, तुम्हारी ओर ही मुड़ आया है।
Mantra 2
ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम् । मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना ॥
वे दोनों ही दिव्य जनक-जननी के रूप में श्रेष्ठ हैं—वेगवान, शूर-शक्तियों में सर्वाधिक प्रबल। दानशीलों के लिए वे सबसे महान विस्तारक हैं, बहु-उत्साह (तुविशुष्म) से परिपूर्ण; ऋत (सत्य-नियम) के द्वारा वे वृत्र-हन्ता हैं, समस्त सेनाओं/बल-समूहों से युक्त।
Mantra 3
ता गृणीहि नमस्येभिः शूषैः सुम्नेभिरिन्द्रावरुणा चकाना । वज्रेणान्यः शवसा हन्ति वृत्रं सिषक्त्यन्यो वृजनेषु विप्रः ॥
उन दोनों—इन्द्र और वरुण—का स्तवन करो: नमस्य कर्मों से, ऊर्जाओं से और शुभ सुम्नों (कल्याण-विस्तारों) से, जो हवि में आनन्दित हैं। एक वज्र से, अपने बल से, वृत्र को मारता है; दूसरा—विप्र (द्रष्टा)—कर्म-क्षेत्रों में ऋजु कार्यों को स्थापित करता और बाँधता है।
Mantra 4
ग्नाश्च यन्नरश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वगूर्ताः । प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा द्यौश्च पृथिवि भूतमुर्वी ॥
जब स्त्री-शक्तियाँ और पुरुष-शक्तियाँ बढ़ती हैं, तब सब देव—सु-आहूत—मनुष्य का पोषण करते हैं। उन (देव-शक्तियों) से, हे इन्द्र-वरुण, तुम्हारे महत्त्व से, द्यौ और पृथिवी उर्वी—विशाल—हो जाती हैं; हमारे भीतर भी दिव्य जीवन के क्षेत्र के रूप में विस्तृत होती हैं।
Mantra 5
स इत्सुदानुः स्ववाँ ऋतावेन्द्रा यो वां वरुण दाशति त्मन् । इषा स द्विषस्तरेद्दास्वान्वंसद्रयिं रयिवतश्च जनान् ॥
वह ही सुदानु (श्रेष्ठ दाता) है—अपने स्वबल से सम्पन्न, ऋत (सत्य-धर्म) का पालक—हे इन्द्र! जो तुम दोनों को, हे वरुण, अपने अन्तरतम से अर्पण करता है। ईषा (दैवी प्रेरणा) से वह द्वेषियों को पार कर जाता है; दान करते हुए वह रयि (समृद्धि) को प्राप्त करता है और रयिवान् जनों की भी वृद्धि करता है।
Mantra 6
यं युवं दाश्वध्वराय देवा रयिं धत्थो वसुमन्तं पुरुक्षुम् । अस्मे स इन्द्रावरुणावपि ष्यात्प्र यो भनक्ति वनुषामशस्तीः ॥
जिस दाश्वन् (अर्पणकर्ता) के यज्ञ के लिए, हे देवो, तुम दोनों ने वसुमन्त, पुरुक्षु (बहुविस्तारिणी) रयि (समृद्धि) स्थापित की है—हे इन्द्र-वरुण—वही हमारे लिए भी प्राप्त हो। आगे वही बढ़े जो वणुषाम् (याचकों/साधकों) की अशस्ति (कुत्सित वाणी, निन्दा) को तोड़ देता है।
Mantra 7
उत नः सुत्रात्रो देवगोपाः सूरिभ्य इन्द्रावरुणा रयिः ष्यात् । येषां शुष्मः पृतनासु साह्वान्प्र सद्यो द्युम्ना तिरते ततुरिः ॥
और हमारे लिए, हे इन्द्र-वरुण—सुत्रात्र (सुप्रतिरक्षक), देवगोपाः (देव-रक्षक)—सूरिभ्यः (दीप्तिमान् नायकों) के लिए रयि हो। जिनका शुष्म (तेज, पराक्रम) रणों में विजयी है, उनकी ततुरिः (शीघ्र विजय-गति) तत्क्षण द्युम्न (दीप्ति, यश) को पार ले जाती है।
Mantra 8
नू न इन्द्रावरुणा गृणाना पृङ्क्तं रयिं सौश्रवसाय देवा । इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्धोऽपो न नावा दुरिता तरेम ॥
अब, हे इन्द्र–वरुण, हम स्तुति-गान में तुम्हें पुकारते हुए—हे देवो—हममें रयि (समृद्धि) का संयोग करो, जो सुश्रवस् (सत्कीर्ति, शुभ-श्रवण) बनकर प्रकट हो। इस प्रकार महिमा के शर्ध (समूह) में स्तुति करते हुए, जैसे नाव से जल पार करते हैं, वैसे ही हम दुरित (कठिन आपदाएँ) पार कर जाएँ।
Mantra 9
प्र सम्राजे बृहते मन्म नु प्रियमर्च देवाय वरुणाय सप्रथः । अयं य उर्वी महिना महिव्रतः क्रत्वा विभात्यजरो न शोचिषा ॥
अब प्रिय मन्म (विचार) को आगे बढ़ाओ और उसे देव वरुण—विस्तृत, महान् सम्राट—के लिए अर्पित करो। वही, जो अपनी महिमा से उर्वी (विस्तृत पृथ्वी/जगत्) को धारण करता है, महाव्रत (महान् व्रत) में दृढ़; वह अपने क्रतु (संकल्प-शक्ति) से प्रकाशित होता है—ज्योति की भाँति, अजर, दीप्तिमान।
Mantra 10
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रता । युवो रथो अध्वरं देववीतये प्रति स्वसरमुप याति पीतये ॥
हे इन्द्र–वरुण! सुतपान करने वाले, इस सुत सोम को—मद्य, आनन्द-प्रद—पान करो, हे धृतव्रत! देव-वीति (देव-आह्वान) के लिए यज्ञ की ओर तुम्हारा रथ समीप आता है; स्वसर (आह्वान/वाणी) के प्रत्युत्तर में पीने के लिए निकट आता है।
Mantra 11
इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम् । इदं वामन्धः परिषिक्तमस्मे आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयेथाम् ॥
हे इन्द्र–वरुण! वृषणौ (दोनों वृषभ), मधुमत्तम वृष्णः सोम से बलवान होओ। यह अन्धः (रस/सार) हमारे यहाँ तुम्हारे लिए चारों ओर परिषिक्त है; इस बर्हिष् (यज्ञासन) पर आसीन होकर आनन्दित होओ।
The hymn pairs Indra’s conquering strength with Varuṇa’s rule of ṛta (truth and order). It asks for success that is both powerful and rightly governed.
It asks for iṣ (driving impulse), sumná (grace/favor), protection in struggles, and rayi (prosperity), with victory achieved through alignment with ṛta.
Alongside mythic foes, it also points to anything that blocks life—fear, disorder, drought, or inner resistance. Indra–Varuṇa are praised for removing such obstruction through truth-based power.
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