Rig Veda Sukta 66
Mandala 6Sukta 6611 Mantras

Sukta 66

Sukta 6.66

Rishi

Bharadvāja (Book 6 family attribution)

Devata

Marut-gaṇa (with Pṛśni as their mother in the hymn’s imagery)

Chandas

Triṣṭubh

यह सूक्त मरुत-गण की स्तुति करता है—रुद्र के उग्र, दीप्तिमान पुत्र, वे तूफ़ानी देव जिनकी वेगवती शक्ति से स्वर्ग और पृथ्वी—दोनों लोक—काँप उठते हैं और मानो ‘जुत’ जाते हैं। पृश्नि को समृद्ध गौ-माता के रूपक में रखकर कवि उनके जन्म, पोषण तथा उस उज्ज्वल तेज का स्मरण कराता है जो मनुष्यों के हित के लिए प्रकट होता है। सूक्त का प्रयोजन स्तुत्य और आह्वान—दोनों है: यज्ञ में मरुतों को बुलाना, ताकि उनकी शक्ति, रक्षा और विजय-प्रेरक वेग उपासक को समर्थ करे।

Mantras

Mantra 1

वपुर्नु तच्चिकितुषे चिदस्तु समानं नाम धेनु पत्यमानम् । मर्तेष्वन्यद्दोहसे पीपाय सकृच्छुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः ॥

जो जानता है, उसके लिए भी वह रूप निश्चय ही ज्ञात हो—नाम में एक ही, पालन-पोषण करने वाली, शासन करने वाली धेनु। परन्तु मर्त्यों में वह अन्य दुहाई के लिए फूलती-भरती है; एक बार उज्ज्वल रस को दुहकर—पृश्नि माता—उसका समृद्धि-भरा थन (ऊध) प्रकट होता है।

Mantra 2

ये अग्नयो न शोशुचन्निधाना द्विर्यत्त्रिर्मरुतो वावृधन्त । अरेणवो हिरण्ययास एषां साकं नृम्णैः पौंस्येभिश्च भूवन् ॥

जो मरुत्—प्रज्वलित किए जाने पर अग्नियों की भाँति दहक उठते हैं—वे दो बार, तीन बार बढ़ते-फूलते हैं। वे अरॆणव (निर्मल, निष्कलंक) हैं; इनके तेज में स्वर्ण-सी आभा है। नृम्ण (पुरुषार्थ-बल) और पौंस्य (वीर्य-शक्ति) के साथ मिलकर वे प्रकट होते हैं और स्थित होते हैं।

Mantra 3

रुद्रस्य ये मीळ्हुषः सन्ति पुत्रा याँश्चो नु दाधृविर्भरध्यै । विदे हि माता महो मही षा सेत्पृश्निः सुभ्वे गर्भमाधात् ॥

रुद्र के जो पुत्र हैं—समृद्धि के दाता—जिन्हें अब दाधृवि हमारे धारण हेतु आगे लाता है; निश्चय ही उनकी माता विदित है—वह महती, वह महानता। पृश्नि ने ही शुभ गर्भाशय में गर्भ को स्थापित किया।

Mantra 4

न य ईषन्ते जनुषोऽया न्वन्तः सन्तोऽवद्यानि पुनानाः । निर्यद्दुह्रे शुचयोऽनु जोषमनु श्रिया तन्वमुक्षमाणाः ॥

वे जन्म से ही न डगमगाते हैं, न पथ से हटते हैं; अस्तित्व में रहकर वे निंद्य को शुद्ध कर देते हैं। जब वे शुचि (पवित्र) जन दुहते हैं, तो प्रसन्न स्वीकृति में दुहते हैं; और अपनी ही तनु पर श्री (दीप्ति, वैभव) को उँडेलते हुए उसे बढ़ाते हैं।

Mantra 5

मक्षू न येषु दोहसे चिदया आ नाम धृष्णु मारुतं दधानाः । न ये स्तौना अयासो मह्ना नू चित्सुदानुरव यासदुग्रान् ॥

वे शीघ्रगामी (मरुत्) जिनके बीच दुहाई (दोह) के समय भी कोई चूक नहीं होती—वे अपने ही नाम में धृष्णु मरुत्-बल को धारण करते हैं। वे स्तुति में दुर्बल नहीं, महिमा में न्यून नहीं; अब तो उदार दाता भी उन उग्रों के आगे नत हो जाता है।

Mantra 6

त इदुग्राः शवसा धृष्णुषेणा उभे युजन्त रोदसी सुमेके । अध स्मैषु रोदसी स्वशोचिरामवत्सु तस्थौ न रोकः ॥

वे उग्र (मरुत) बल से, धृष्णु-सेना के साथ, सुयोजित होकर दोनों रोदसी (द्यावा-पृथिवी) को जुतते हैं। तब उन दोनों रोदसी के बीच स्वयंज्योति तेज, महावानों में, उज्ज्वल निवास-सा, स्थिर हो खड़ा होता है।

Mantra 7

अनेनो वो मरुतो यामो अस्त्वनश्वश्चिद्यमजत्यरथीः । अनवसो अनभीशू रजस्तूर्वि रोदसी पथ्या याति साधन् ॥

हे मरुतो, तुम्हारा यह याम (गमन) अविच्छिन्न हो—अश्वहीन होकर भी वह दौड़ता है, रथहीन होकर भी रथी-सा चलता है। लगाम बिना, कोड़े बिना, रजस् (मध्यलोक) का तूर्य (अतिक्रामी) चलता है; वह दोनों रोदसी के बीच पथ बनाकर अपना साधन (कार्य) सिद्ध करता है।

Mantra 8

नास्य वर्ता न तरुता न्वस्ति मरुतो यमवथ वाजसातौ । तोके वा गोषु तनये यमप्सु स व्रजं दर्ता पार्ये अध द्योः ॥

हे मरुतो! जिसे तुम वाज-साति (समृद्धि-विजय) में सहारा देते हो, उसके लिए न लौटना है, न उसे कोई परास्त कर सकता है। चाहे बालक में, चाहे गौओं में, चाहे सन्तान में, चाहे अप्सु (जल-तत्त्व) में—वह दूरस्थ सीमा पर भी, द्यौ (आकाश) के अधीन, व्रज (बाड़ा/आवरण) को तोड़कर खोल देता है।

Mantra 9

प्र चित्रमर्कं गृणते तुराय मारुताय स्वतवसे भरध्वम् । ये सहांसि सहसा सहन्ते रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः ॥

शीघ्रगामी, स्व-तेजस्वी मरुत-शक्ति के लिए गाने वाले को यह चित्र (दीप्त) अर्क/स्तोत्र आगे लाओ। जो बल से प्रतिरोधों को सहते और जीतते हैं—हे अग्ने! उनके मख (यज्ञ) से पृथ्वी काँप उठती है।

Mantra 10

त्विषीमन्तो अध्वरस्येव दिद्युत्तृषुच्यवसो जुह्वो नाग्नेः । अर्चत्रयो धुनयो न वीरा भ्राजज्जन्मानो मरुतो अधृष्टाः ॥

दीप्ति-सम्पन्न, अध्वर (यज्ञ) की विद्युत् के समान, शीघ्र-चेष्टा में चंचल मरुत—मानो अग्नि की ज्वलित जिह्वाएँ हों। वे अर्चत्र (स्तोत्र-गायक) हैं, धुनि (गर्जन) के समान उन्मत्त, वीरों की भाँति; तेज में जन्मे, मरुत अजेय हैं।

Mantra 11

तं वृधन्तं मारुतं भ्राजदृष्टिं रुद्रस्य सूनुं हवसा विवासे । दिवः शर्धाय शुचयो मनीषा गिरयो नाप उग्रा अस्पृध्रन् ॥

उस बढ़ते हुए मारुत-बल को, चमकती भाला-दृष्टि वाले, रुद्र के पुत्र को, मैं हवन-आह्वान और अभिलाषा-भरे स्तवन से पूजता हूँ। दिव्य शर्धा (देव-गण) के लिए मेरी मनीषा शुचि हो उठती है; वे पर्वतों की भाँति, उग्र जलधाराओं की भाँति, अजेय स्पर्धा में आगे बढ़ते हैं।

Frequently Asked Questions

They are a fierce but beneficent troop of storm-deities—Rudra’s sons—described as radiant, spear-bearing, roaring in thunder, and moving together with disciplined power.

Pṛśni is used as a vivid maternal image: an abundant Cow whose ‘bright essence’ is milked out, symbolizing the Maruts’ birth/nourishment and the life-giving release of power (like rain and vitality) for mortals.

It means the Maruts dynamically connect heaven and earth through their storm-force—making the cosmic realms act in concert and bringing down energizing, rain-bearing power into the human sphere.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App