Rig Veda Sukta 64
Mandala 6Sukta 646 Mantras

Sukta 64

Sukta 6.64

Rishi

Bharadvāja (Bārhaspatya) (traditional for this hymn cluster in Maṇḍala 6)

Devata

Uṣas (Dawn)

Chandas

Triṣṭubh

यह संक्षिप्त उषस्-सूक्त उषा की स्तुति करता है—वह दीप्तिमान जाग्रत्-कर्त्री है, जो चमकती तरंगों-सी उठती है, समस्त प्राणियों को गति में प्रवृत्त करती है, और जगत् के पथों को “चलने योग्य, सुगम” बनाती है। इसमें प्रकाश के आगमन को ऋजु-गमन/सम्यक् प्रगति से जोड़ा गया है—समृद्धि, उदार दान (दक्षिणा), तथा उपासक के लिए जीवन-यात्रा का सुरक्षित पारगमन।

Mantras

Mantra 1

उदु श्रिय उषसो रोचमाना अस्थुरपां नोर्मयो रुशन्तः । कृणोति विश्वा सुपथा सुगान्यभूदु वस्वी दक्षिणा मघोनी ॥

उषाएँ अपनी श्री में उदित हुईं, दीप्तिमान—जैसे जल की उज्ज्वल तरंगें; वे सब पथों को सु-पथ, सु-गमन बनाती हैं। और वस्वी, मघोनी दक्षिणा (समृद्ध दान-शक्ति) प्रकट हुई—प्रचुर, उदार—ताकि जीव ऋत के सम्यक् पथ पर अग्रसर हो।

Mantra 2

भद्रा ददृक्ष उर्विया वि भास्युत्ते शोचिर्भानवो द्यामपप्तन् । आविर्वक्षः कृणुषे शुम्भमानोषो देवि रोचमाना महोभिः ॥

हे भद्रा उषा! अपनी विशाल व्यापकता में तू दृष्टिगोचर होती है और प्रकट होकर चमकती है; तेरी ज्वाला और किरणें उछलकर द्युलोक तक जा पहुँचती हैं। तू अपना वक्षः प्रकट करती है, स्वयं को अलंकृत करती हुई; हे देवी उषस्, प्रकाशमयी, अपने महान् सामर्थ्यों से दीप्त होती हुई।

Mantra 3

वहन्ति सीमरुणासो रुशन्तो गावः सुभगामुर्विया प्रथानाम् । अपेजते शूरो अस्तेव शत्रून्बाधते तमो अजिरो न वोळ्हा ॥

लालिमा लिए, दीप्तिमान गौएँ (किरणें) उसे आगे वहन करती हैं—उस सौभाग्यवती को, जो व्यापक रूप से फैलती है। धनुषधारी वीर की भाँति वह शत्रुओं को दूर हटाती है; वह अजेय सारथी की तरह वेगवती होकर तमस् को परास्त करती है।

Mantra 4

सुगोत ते सुपथा पर्वतेष्ववाते अपस्तरसि स्वभानो । सा न आ वह पृथुयामन्नृष्वे रयिं दिवो दुहितरिषयध्यै ॥

तेरे पथ सुगम हैं, तेरी सड़कें उत्तम हैं—पर्वतों पर भी; स्वभानु (स्वयं-दीप्त) होकर तू जलों और वायुओं के ऊपर से पार जाती है। अतः हे पृथुयामन्, ऊँची और व्यापक-गामिनी! द्यौः की दुहिता से प्राप्त ‘रयि’—समृद्धि—हमारे पास ला, हमारे वर्धन और प्रेरणा के लिए।

Mantra 5

सा वह योक्षभिरवातोषो वरं वहसि जोषमनु । त्वं दिवो दुहितर्या ह देवी पूर्वहूतौ मंहना दर्शता भूः ॥

हे उषा! अपने अश्वों के साथ उसे यहाँ जोत; तू आनंद के अनुसार श्रेष्ठ वरदान वहन करती है। तू द्यौः की दुहिता, वह देवी है जो प्राचीन काल से आहूत होकर उदार होती है और हमारे दर्शन के लिए दृश्य बनती है।

Mantra 6

उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ । अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय ॥

तेरे उदय होते ही, अपने वास-स्थान से पक्षी भी उड़ चले; और जो पितृ-भागी (जीवन-आहार के सहभागी) मनुष्य हैं, वे उषाकाल में जाग उठे। हे देवी उषा! यहाँ उपस्थित होकर तू दान करने वाले मर्त्य के लिए बहुत-सा प्रिय कल्याण और आनंद वहन करती है।

Frequently Asked Questions

The hymn worships Uṣas, the goddess of Dawn, praised as the radiant power that brings light, awakens life, and renews the day.

Dawn is not only light in the sky; she ‘makes the paths good’—supporting safe movement, right effort, and prosperity that grows with generosity and offering.

Recite it at dawn facing east, reflect on awakening and clear intentions for the day, and follow it with a small act of dakṣiṇā—charity or helpful giving—to embody its spirit.

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