Rig Veda Sukta 59
Mandala 6Sukta 5910 Mantras

Sukta 59

Sukta 6.59

Rishi

Bharadvāja (Bārhaspatya)

Devata

Indrāgnī (dual deity)

Chandas

Triṣṭubh (probable; requires metrical verification)

यह सूक्त सोम-यज्ञ में संयुक्त विजेता रूप से इन्द्र और अग्नि—इन युगल शक्तियों—की स्तुति करता है: इन्द्र को विजयकारी बल के रूप में और अग्नि को दहकती पुरोहित-इच्छा के रूप में, जो आहुति को वहन करती है। यह उनके प्राचीन कर्मों का स्मरण कराता है और पहेली-सदृश बिंबों द्वारा संकेत देता है कि उनकी दिव्य ऊर्जा सीमाओं को उलट सकती है। अंत में उन्हें आमंत्रित करता है कि वे आएँ, निचोड़े हुए सोम का पान करें, और स्तोत्र तथा यजमान को उन्नत करें।

Mantras

Mantra 1

प्र नु वोचा सुतेषु वां वीर्या यानि चक्रथुः । हतासो वां पितरो देवशत्रव इन्द्राग्नी जीवथो युवम् ॥

अब मैं सोम-रस के निचोड़े में तुम्हारे वे वीर्य-कर्म कहता हूँ, जो तुमने किए हैं। तुम्हारे वे पितर, जो देवों के शत्रु थे, मारे गए; हे इन्द्र-अग्नि, तुम दोनों जीवित हो—विजयी बल और ज्वलित संकल्प बनकर।

Mantra 2

बळित्था महिमा वामिन्द्राग्नी पनिष्ठ आ । समानो वां जनिता भ्रातरा युवं यमाविहेहमातरा ॥

निश्चय ही महान है तुम्हारी महिमा, हे इन्द्र-अग्नि—आक्रमण में परम प्रबल। तुम्हारा जनक एक ही है; भ्राता होकर तुम यमल हो—यहाँ एक ही माता से उत्पन्न—एक ही कार्य के लिए संयुक्त दो शक्तियाँ।

Mantra 3

ओकिवांसा सुते सचाँ अश्वा सप्ती इवादने । इन्द्रा न्वग्नी अवसेह वज्रिणा वयं देवा हवामहे ॥

सुते हुए सोम के संग, अपने घर में स्थित दो अश्वों के समान; विजय के निमित्त जुते हुए युगल घोड़ों के समान—हम यहाँ सहायता के लिए इन्द्र और अग्नि को पुकारते हैं। हे देवो, वज्रधारी के साथ—हम में विजय-बल का जन्म हो।

Mantra 4

य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृतावृधा । जोषवाकं वदतः पज्रहोषिणा न देवा भसथश्चन ॥

हे इन्द्राग्नी, जो सुते हुए सोम-यज्ञों में तुम्हारा स्तवन करता है—हे ऋत-वर्धक—तुम्हारी प्रसन्नता जीतने वाला वचन, दृढ़-स्वर सामर्थ्य से बोलता है; हे देवो, तुम उसे किसी भी प्रकार से नहीं छोड़ते।

Mantra 5

इन्द्राग्नी को अस्य वां देवौ मर्तश्चिकेतति । विषूचो अश्वान्युयुजान ईयत एकः समान आ रथे ॥

हे इन्द्राग्नी, तुम दोनों देवों को कौन-सा मर्त्य यथार्थ जान पाता है? जो भिन्न दिशाओं में दौड़ने वाले अश्वों को जूता कर चलता है—और फिर भी एक ही रथ-आसन पर एक ही गति से बढ़ता है; इसी प्रकार साधक तुम्हारे संयुक्त कर्म की एकता को समझता है।

Mantra 6

इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात्पद्वतीभ्यः । हित्वी शिरो जिह्वया वावदच्चरत्त्रिंशत्पदा न्यक्रमीत् ॥

हे इन्द्र–अग्नि! यह प्राचीन शक्ति पगवाले प्राणियों में से पगहीन होकर प्रकट हुई। उसने शिर (शीर्ष) को त्यागकर जिह्वा से वाणी की; वह चलता हुआ चला और तीस पगों में नीचे उतर आया।

Mantra 7

इन्द्राग्नी आ हि तन्वते नरो धन्वानि बाह्वोः । मा नो अस्मिन्महाधने परा वर्क्तं गविष्टिषु ॥

हे इन्द्र–अग्नि! तुम वीरों की भाँति अपनी भुजाओं में धनुष्यों को तानते हो। इस महाधन (महायुद्ध) में, गविष्टि—गौओं/किरणों की खोज—में हमसे मुँह न मोड़ो।

Mantra 8

इन्द्राग्नी तपन्ति माघा अर्यो अरातयः । अप द्वेषांस्या कृतं युयुतं सूर्यादधि ॥

हे इन्द्र–अग्नि! माघ (दुष्ट) और अराति—शत्रु शक्तियाँ—मुझ पर तपती/दहकती हैं। उन्होंने जो द्वेष रचा है उसे दूर हाँको; उसे सूर्य के ऊपर से—प्रकाश-लोक से—अलग कर दो।

Mantra 9

इन्द्राग्नी युवोरपि वसु दिव्यानि पार्थिवा । आ न इह प्र यच्छतं रयिं विश्वायुपोषसम् ॥

हे इन्द्र और अग्नि! दिव्य और पार्थिव—दोनों प्रकार के वसु (धन-सम्पदा) तुम्हारे ही हैं। यहाँ हमें वह रयि प्रदान करो जो समस्त आयु को पोषित करे और हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व की वृद्धि का आधार बने।

Mantra 10

इन्द्राग्नी उक्थवाहसा स्तोमेभिर्हवनश्रुता । विश्वाभिर्गीर्भिरा गतमस्य सोमस्य पीतये ॥

हे इन्द्रा-अग्नी! उक्थ को वहन करने वाले, स्तोत्रों से आह्वान सुनने वाले—हमारी समस्त गिराओं (गीतों) सहित आओ; इस सोम के पान हेतु उपस्थित होओ।

Frequently Asked Questions

Indrāgnī means Indra and Agni invoked together as one paired deity—Indra brings conquering strength, and Agni brings the sacrificial fire that carries offerings and awakens inspired speech.

It is primarily an invitation hymn for the Soma ritual: it praises Indra-Agni’s past victories and asks them to come, hear the call, and drink the pressed Soma while protecting and empowering the sacrificer.

Such imagery compresses a deeper idea: divine power is not limited by ordinary rules. In ritual context it suggests that Indra-Agni’s energy can break obstacles and reveal a hidden order behind what seems fixed or impossible.

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