
Sukta 6.56
Bharadvāja
Pūṣan
Triṣṭubh (contextual; verify)
यह Pūṣan को समर्पित संक्षिप्त स्तुति-गीत मार्गदर्शन, संरक्षण और समग्र कल्याण की प्रार्थना करता है। इसमें यह प्रतिपादित है कि देवता को केवल नाम-रूप और बाह्य वर्णनों से नहीं, बल्कि सच्ची पहचान और जीवन में स्थापित संबंध से जाना जाता है। स्तुति बाहरी परिभाषाओं से परे Pūṣan के स्वरूप का संकेत करते हुए उपासक के अभिप्राय की सफल सिद्धि की याचना करती है और अंत में आज तथा कल के लिए सुरक्षा और पूर्णता का स्पष्ट आशीर्वाद देती है।
Mantra 1
य एनमादिदेशति करम्भादिति पूषणम् । न तेन देव आदिशे ॥
जो उसे ‘करम्भ-सम्बन्धी पूषण’ कहकर मात्र नाम से दिखलाता है, उससे देव का यथार्थ निर्देश नहीं होता; वह तो भीतर की पहचान से जाना जाता है, केवल लेबल से नहीं।
Mantra 2
उत घा स रथीतमः सख्या सत्पतिर्युजा । इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते ॥
और निश्चय ही वह—रथियों में श्रेष्ठ, सख्य-भाव और युजा (जोड़) से सत्पति—इन्द्र, वृत्रों (अवरोधक शक्तियों) का संहार करता है; वह हमारे गमन का मार्ग प्रशस्त करता है।
Mantra 3
उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम् । न्यैरयद्रथीतमः ॥
और वहाँ, उस कठोर गो-क्षेत्र पर, सूर्य ने स्वर्णमय चक्र को चलाया; रथियों में श्रेष्ठ ने उसे नीचे, सुव्यवस्थित गति में प्रवाहित किया—कठिन पदार्थ में भी तेजस्वी ऋत-क्रम स्थापित करते हुए।
Mantra 4
यदद्य त्वा पुरुष्टुत ब्रवाम दस्र मन्तुमः । तत्सु नो मन्म साधय ॥
हे पुरुष्टुत, हे दस्र, हे मन्तुमान्! आज जो वचन हम तुम्हें कहते हैं—उसको हमारे लिए सिद्ध कर दो; हमारे मन के संकल्प को यथार्थ बोध में सफल करो।
Mantra 5
इमं च नो गवेषणं सातये सीषधो गणम् । आरात्पूषन्नसि श्रुतः ॥
और यह हमारा गोवेषण—विजय के लिए किरणों (गवों) की खोज—यह अग्रसर होता हुआ गण; हे पूषन्, निकट से सुनो; तुम तो शीघ्र प्रत्युत्तर देने वाले, प्रसिद्ध हो।
Mantra 6
आ ते स्वस्तिमीमह आरेअघामुपावसुम् । अद्या च सर्वतातये श्वश्च सर्वतातये ॥
हम तुमसे स्वस्ति की याचना करते हैं—अघ (अनिष्ट) को दूर रखने वाली और सच्चे वसु (समृद्धि) को निकट लाने वाली; आज भी सर्वताति के लिए और कल भी सर्वताति के लिए।
Pūṣan is the Vedic guide and nourisher who protects travelers, helps one reach the right goal, and brings practical welfare—safety, prosperity, and right attainment.
It suggests that merely calling the god by a label does not truly reveal him; real knowing comes through inner recognition, devotion, and lived connection.
It asks for continuous well-being—protection from harm, nearness of true wealth, and complete welfare that extends beyond the present moment into the next day.
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