
Sukta 6.53
Bharadvāja (Bārhaspatya) tradition (Mandala 6 attribution)
Pūṣan (Pathaspati)
Gayatri (likely; short 3×8 pattern—needs verification)
यह सूक्त पथों के स्वामी पृषन् (पथस्पति) का आवाहन करता है कि वे अपनी मार्गदर्शक शक्ति को ऋषि की धिया/चिन्तन से युक्त करें और सुरक्षित गमन, सही दिशा तथा पोषण-प्राप्ति का विजय प्रदान करें। इसमें पृषन् से यह भी प्रार्थना है कि वे पणि (धन रोकने वाले) के संचित धन को भेदकर प्रकट करें और छिपे हुए ‘प्रिय’ खजानों को उपासक के न्यायोचित अधिकार में ला दें। सूक्त का समापन ऐसी विजयी, पुरुषार्थपूर्ण प्रेरणा (धी) की कामना से होता है जो गौ, अश्व और जीवनदायी समृद्धि को प्राप्त कर भोग और अर्पण के लिए उपलब्ध कराए।
Mantra 1
वयमु त्वा पथस्पते रथं न वाजसातये । धिये पूषन्नयुज्महि ॥
हे पथस्पति! वाजसाति (समृद्धि-विजय) के लिए हम तुम्हें रथ की भाँति जोतते हैं। हे पूषन्, चेतना-यात्रा के सिद्ध होने हेतु हम तुम्हें अपनी धिया (अन्तर्बुद्धि) से युक्त करते हैं।
Mantra 2
अभि नो नर्यं वसु वीरं प्रयतदक्षिणम् । वामं गृहपतिं नय ॥
हमारी ओर नर्यं वसु—वीर्यवान् धन, सुयोजित दक्षिणा (साधन-शक्ति) वाला—ले आओ। प्रिय गृहपति को, हमारे लिए कल्याणकारी, यहाँ ले चलो।
Mantra 3
अदित्सन्तं चिदाघृणे पूषन्दानाय चोदय । पणेश्चिद्वि म्रदा मनः ॥
हे अघृणे पूषन्, जो दान नहीं देता—उसे भी दान के लिए प्रेरित कर; और पणी के हृदय में भी गाँठ को खोल दे—उसके मन को मृदु कर, उदारता की ओर मोड़ दे।
Mantra 4
वि पथो वाजसातये चिनुहि वि मृधो जहि । साधन्तामुग्र नो धियः ॥
वाजसाति—समृद्धि-प्राप्ति के लिए मार्गों को विस्तृत कर; विरोधी बाधाओं को दूर कर, नष्ट कर। हे उग्र, हमारी धियाँ (प्रेरित बुद्धियाँ) अपना कार्य सिद्ध करें।
Mantra 5
परि तृन्धि पणीनामारया हृदया कवे । अथेमस्मभ्यं रन्धय ॥
हे कवे पूषन्, विवेक-इच्छा के भीतर के भाले से पणियों को हृदय-प्रदेश से चारों ओर से काट दे; फिर उनकी रोकी हुई समृद्धि हमें प्राप्त करा।
Mantra 6
वि पूषन्नारया तुद पणेरिच्छ हृदि प्रियम् । अथेमस्मभ्यं रन्धय ॥
हे पूषन्, तीक्ष्ण भेदन-बिन्दु से (उसे) अलग कर; पणि के हृदय में जो प्रिय—गुप्त आनन्द और प्रकाश—है, उसे खोज। फिर उसे हमारे अधिकार में ला दे।
Mantra 7
आ रिख किकिरा कृणु पणीनां हृदया कवे । अथेमस्मभ्यं रन्धय ॥
हे कवि-पूषन्, भीतर तक खोद; पणियों के हृदय को टूटता-खड़खड़ाता कर दे। फिर जो वे धारण किए हैं, उसे हमारे लिए वश में कर दे।
Mantra 8
यां पूषन्ब्रह्मचोदनीमारां बिभर्ष्याघृणे । तया समस्य हृदयमा रिख किकिरा कृणु ॥
हे अघृणे पूषन्, ब्रह्म (वाणी) से प्रेरित और दीप्त तप से संचालित जो भाला-नोक तुम धारण करते हो—उसी से वक्र और संकुचित (अवरोधक) के हृदय में खोद; उसे खंडित कर, खड़खड़ाता कर दे।
Mantra 9
या ते अष्ट्रा गोपशाघृणे पशुसाधनी । तस्यास्ते सुम्नमीमहे ॥
हे दीप्तिमान् पूषन्! तेरी जो अष्ट्रा (अंकुश/प्रेरक-छड़ी) है—जो गोपशा (गोरक्षिणी) और पशुसाधनी (पशुधन-प्राप्ति कराने वाली) है—उसकी कृपा और शुभ संरक्षण हम माँगते हैं।
Mantra 10
उत नो गोषणिं धियमश्वसां वाजसामुत । नृवत्कृणुहि वीतये ॥
और हमारे लिए गोषणि (गौ-प्राप्ति कराने वाली) धिया (प्रेरित बुद्धि/विचार) बना दे; तथा अश्वसां (अश्व-प्राप्ति कराने वाली) और वाजसाम् (बल-समृद्धि देने वाली) भी। उसे नृवत्—पुरुषार्थयुक्त—कर दे, ताकि वह हमारे वीतये (प्राप्ति और उपभोग) के लिए समर्थ हो।
Pūṣan is a Vedic deity of guidance and nourishment. He is called Pathaspati, “Lord of the paths,” because he protects journeys, helps one find the right way, and brings the seeker safely to the goal.
The Paṇi represents the withholder who hides wealth and light. The hymn asks Pūṣan to pierce concealment and reveal the hidden treasure—so it can come into rightful possession and be used for good purpose.
It can be recited before travel or any important undertaking to seek clarity, protection, and right direction. Many also use it as a prayer for recovering what is lost and for gaining steady prosperity with a focused, strong mind.
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