Rig Veda Sukta 45
Mandala 6Sukta 4533 Mantras

Sukta 45

Sukta 6.45

Rishi

Bharadvāja Bārhaspatya (traditional for Maṇḍala 6)

Devata

Indra

Chandas

Gāyatrī (probable for RV 6.45 opening; requires verification)

यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उन्हें युवा मित्र और उद्धारक के रूप में, जो कुलों को संकट से निकालकर मार्ग दिखाते हैं और कवि की पुकार का उत्तर रक्षा तथा अनुग्रह से देते हैं। इसमें वीर-स्मृति (तुर्वश और यदु को पूर्वकाल में दिए गए इन्द्र के मार्गदर्शन) को वर्तमान सहायता-याचना के साथ पिरोया गया है, और अंत में दानस्तुति आती है जो उदार आश्रयदाता के दान का गुणगान करती है—यह दर्शाते हुए कि दैवी शक्ति और मानवीय दान मिलकर ऋत और समृद्धि को स्थिर रखते हैं।

Mantras

Mantra 1

य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम् । इन्द्रः स नो युवा सखा ॥

जो सुदूर परावत से सुनीति (सद्-मार्गदर्शन) द्वारा तुर्वश और यदु को ले आया—वह इन्द्र हमारे लिए युवा सखा बने।

Mantra 2

अविप्रे चिद्वयो दधदनाशुना चिदर्वता । इन्द्रो जेता हितं धनम् ॥

अविप्र को भी वह वृद्धि देता है; अनाशु (अयाजक) के घोड़े द्वारा भी—इन्द्र ही हित (नियत) धन का जेता है।

Mantra 3

महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः । नास्य क्षीयन्त ऊतयः ॥

महान् हैं उसके मार्गदर्शन; प्राचीन भी है उसकी प्रशंसनीय महिमा। उसकी सहायताएँ (ऊतयः) कभी क्षीण नहीं होतीं।

Mantra 4

सखायो ब्रह्मवाहसेऽर्चत प्र च गायत । स हि नः प्रमतिर्मही ॥

हे सखाओ, ब्रह्म-वाह (वाणी/स्तोत्र को धारण करने वाले) को अर्चना करो; और गान करो। वही तो हमारे लिए महान् सुमति—सही बुद्धि का मार्गदर्शन—है।

Mantra 5

त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि । उतेदृशे यथा वयम् ॥

हे वृत्रहन्, तुम ही एक के भी सहायक हो और दो के भी। और ऐसे जनों के भी, जैसे हम हैं।

Mantra 6

नयसीद्वति द्विषः कृणोष्युक्थशंसिनः । नृभिः सुवीर उच्यसे ॥

तू द्वेषियों के पार ले जाता है; तू हमें उक्थ-शंसिन्—प्रेरित स्तुति के उद्घोषक—बनाता है। वीर पुरुषों के द्वारा तू ‘सुवीर’—बलवान पुत्रों/शक्तियों से समृद्ध—कहलाता है।

Mantra 7

ब्रह्माणं ब्रह्मवाहसं गीर्भिः सखायमृग्मियम् । गां न दोहसे हुवे ॥

मैं अपने गिर्-भिः—मंत्रोच्चारों से—ब्रह्म-वाहस, ब्रह्म को वहन करने वाली शक्ति, उस ऋग्मिय सखा को पुकारता हूँ जो स्तुतियों से समृद्ध है। मैं उसे गौ को दुहने की भाँति आह्वान करता हूँ—कि ज्ञान की गुप्त रश्मियाँ प्रचुरता से प्रवाहित हों।

Mantra 8

यस्य विश्वानि हस्तयोरूचुर्वसूनि नि द्विता । वीरस्य पृतनाषहः ॥

जिसके दोनों हाथों में समस्त वसुएँ—सम्पत्तियाँ—बार-बार स्थापित की जाती हैं; जो वीर संग्राम-जय, पृतना-षह है—उस इन्द्र की ओर हम मुड़ते हैं, अन्तः-धन की स्थिर प्रतिष्ठा के लिए।

Mantra 9

वि दृळ्हानि चिदद्रिवो जनानां शचीपते । वृह माया अनानत ॥

हे अद्रिवो (वज्रधारी), हे शचीपते! मनुष्यों के भीतर जमे हुए दृढ़ बन्धनों को भी तोड़ दे; माया के छल-आवरणों को चीरकर दूर कर।

Mantra 10

तमु त्वा सत्य सोमपा इन्द्र वाजानां पते । अहूमहि श्रवस्यवः ॥

हे सत्यस्वरूप, सोमपा इन्द्र, हे वाजों के स्वामी! हम श्रवस्यु (यश-श्रवण के अभिलाषी) होकर तुझे पुकारते हैं; आ, और हमारे भीतर विजयी ऊर्जा बढ़ा।

Mantra 11

तमु त्वा यः पुरासिथ यो वा नूनं हिते धने । हव्यः स श्रुधी हवम् ॥

जिसे हमने पहले भी पुकारा था, और जो अब भी हमारे हित-धन में उपस्थित है—हे इन्द्र, तू हव्य (आह्वेय) होकर हमारी हवि सुन; यज्ञ में प्रविष्ट हो, और अंतः-धन को सुरक्षित कर।

Mantra 12

धीभिरर्वद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान् । त्वया जेष्म हितं धनम् ॥

दीप्त बुद्धियों और वेगवान शक्तियों के साथ, हे इन्द्र, हम वे वाज (समृद्धि-बल) जीतें जो श्रवणीय यश को बढ़ाते हैं। तुम्हारे द्वारा ही हम अपने हित में स्थापित प्रिय धन को विजय करें।

Mantra 13

अभूरु वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते । भरे वितन्तसाय्यः ॥

हे वीर, गिर्वण (स्तोत्र-प्रिय), तुमने अपना वीरत्व प्रकट किया है; हे महान इन्द्र, प्रिय धन में तुम्हारा बल महान है। भार-वहन में तुम विजय-गति को दूर तक फैला देते हो।

Mantra 14

या त ऊतिरमित्रहन्मक्षूजवस्तमासति । तया नो हिनुही रथम् ॥

हे अमित्रहन्, तुम्हारी जो सहायता आक्रमण में सर्वाधिक शीघ्र है—उसी से हमारे रथ को आगे हाँको। उसी से हमारी यात्रा को विजय और प्रकाश की ओर प्रेरित करो।

Mantra 15

स रथेन रथीतमोऽस्माकेनाभियुग्वना । जेषि जिष्णो हितं धनम् ॥

हमारे रथ के साथ, अग्र-युग्मित शक्तियों से युक्त, हे जिष्णु (सदा-विजयी), तुम श्रेष्ठ रथी होकर प्रिय हित-धन को जीत लो।

Mantra 16

य एक इत्तमु ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः । पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः ॥

उसी एक की स्तुति करो—जो जनों का विचर्षणि (विस्तृत-द्रष्टा) है; वह स्वामी वृष-क्रतु (वृषभ-सा संकल्प) के साथ जन्मा है।

Mantra 17

यो गृणतामिदासिथापिरूती शिवः सखा । स त्वं न इन्द्र मृळय ॥

हे इन्द्र, जो स्तुति-गान करने वालों के लिए निकट सहारा, रक्षक सहायता, और शिव सखा है—वही तुम हम पर कृपा बरसाओ।

Mantra 18

धिष्व वज्रं गभस्त्यो रक्षोहत्याय वज्रिवः । सासहीष्ठा अभि स्पृधः ॥

हे वज्रिवन्! रक्षो-हत्या के लिए अपने दोनों हस्तों में वज्र धारण कर; सर्वाधिक विजयी होकर विरोधी स्पर्धाओं पर आक्रमण कर, उन्हें दबा दे।

Mantra 19

प्रत्नं रयीणां युजं सखायं कीरिचोदनम् । ब्रह्मवाहस्तमं हुवे ॥

मैं रयियों के प्राचीन युग्मसाथी, कीर्ति-गीत को आगे बढ़ाने वाले मित्र, ब्रह्म-वाहन में सर्वाधिक समर्थ—इन्द्र का आह्वान करता हूँ।

Mantra 20

स हि विश्वानि पार्थिवाँ एको वसूनि पत्यते । गिर्वणस्तमो अध्रिगुः ॥

क्योंकि वही एक समस्त पार्थिव वसुओं पर अधिपत्य करता है; वाणी के गायक-जन में सर्वाधिक प्रिय, अडिग-ग्रहण वाला, वह स्वामित्व धारण करता है।

Mantra 21

स नो नियुद्भिरा पृण कामं वाजेभिरश्विभिः । गोमद्भिर्गोपते धृषत् ॥

वह हमारे कामना-रूप अभिलाष को अपने नियुत् (युजित शक्तियों) से परिपूर्ण करे—बल-समृद्धि और अश्व-वेगों से; प्रकाशमय गो-सम्पदा से। हे गोपते (किरणों/गौओं के स्वामी), धृष्ट बल से प्रवृत्त हो।

Mantra 22

तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्गवे न शाकिने ॥

दबाए हुए सोम में, सखा-भाव से, उसके लिए वही गाओ—बहु-आहूत, सामर्थ्यवान के लिए—जो शान्ति और कल्याण देता है; जैसे गवे (गौ/प्रकाश) के लिए, न कि अशक्त के लिए।

Mantra 23

न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः । यत्सीमुप श्रवद्गिरः ॥

निश्चय ही वसु (कल्याण-सम्पदा) रोकी नहीं जाती—विजयी वाज का दान, गोमद् (प्रकाश-समृद्ध) —जब वह प्रेरित वाणी-गीतों को निकट से सुनता है।

Mantra 24

कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत् । शचीभिरप नो वरत् ॥

क्या वह—दस्यु-हा—गोमन्त (प्रकाश-सम्पन्न) उस व्रज (गो-गोठ) की ओर निश्चय ही आए? और अपनी शचीभिः (कुशल शक्तियों) से हमारे पास से जो बाधक है, उसे दूर हटा दे।

Mantra 25

इमा उ त्वा शतक्रतोऽभि प्र णोनुवुर्गिरः । इन्द्र वत्सं न मातरः ॥

हे शतक्रतो इन्द्र! ये हमारे ये गिरः (स्तुतिवचन) तुम्हारी ओर अभि-प्र नोनुवुः—आगे बढ़कर तुम्हें पुकारते हैं; जैसे माताएँ वत्स को आगे बढ़ाती हैं, वैसे ही हमारे वचन तुम्हें निकट खींच लाते हैं।

Mantra 26

दूणाशं सख्यं तव गौरसि वीर गव्यते । अश्वो अश्वायते भव ॥

हे वीर! तव सख्यं दूणाशं—अविफल, अच्युत है; गव्यते (प्रकाश/गवेषणा के साधक) के लिए तुम गौ हो; और जो अश्वायते (वेग-शक्ति का साधक) है, उसके लिए अश्व बनो।

Mantra 27

स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे । न स्तोतारं निदे करः ॥

हे (इन्द्र)! इस सोम-रस से सचमुच आनन्दित हो, समृद्धि (राधस्) के लिए; अपने देहधारी पराक्रम में महान हो। स्तोता को निन्दा या निषेध के हवाले मत कर।

Mantra 28

इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः । वत्सं गावो न धेनवः ॥

हे गिर्वण (स्तोत्र-प्रिय) प्रभो! सोम के प्रत्येक पेषण में ये वाणी-रूप गिरः तुझ तक पहुँचती हैं; जैसे दुधारू गौएँ अपने बछड़े के पास सटती हैं, वैसे ही ये उच्चारण तुझ तक शीघ्र आते हैं।

Mantra 29

पुरूतमं पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि । वाजेभिर्वाजयताम् ॥

बहु स्तोताओं में जो अत्यन्त प्रचुर है, उसे व्यापक वाणी में प्रकट किया जाए; बल-समृद्धियों (वाज) के द्वारा वे और भी वाज-समृद्धि को जीतें।

Mantra 30

अस्माकमिन्द्र भूतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः । अस्मान्राये महे हिनु ॥

हे इन्द्र, हमारा यह स्तोत्र तेरे लिए सर्वाधिक वहनशील, सर्वाधिक अन्तःस्थ (निकटतम) हो। हमें महत् ‘रयि’—समृद्धि और पूर्णता—की ओर प्रेरित कर।

Mantra 31

अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात् । उरुः कक्षो न गाङ्ग्यः ॥

बृबु पणी-जन के ऊपर, अत्यन्त ऊँचे शिखर-मस्तक पर खड़ा हुआ है। उसका आश्रय-विस्तार विशाल है—गंगा के विस्तृत तट के समान।

Mantra 32

यस्य वायोरिव द्रवद्भद्रा रातिः सहस्रिणी । सद्यो दानाय मंहते ॥

जिसकी शुभ रति (दान) वायु के समान वेग से प्रवाहित होती है, सहस्रगुण समृद्ध—वह दान के कर्म में तत्क्षण महिमामय होता है।

Mantra 33

तत्सु नो विश्वे अर्य आ सदा गृणन्ति कारवः । बृबुं सहस्रदातमं सूरिं सहस्रसातमम् ॥

अतः हमारे लिए सब आर्यजन सदा गान करते हैं—बृबु, सहस्र-दाता, सहस्र-प्राप्ति कराने वाला वीर-सूरि।

Frequently Asked Questions

It presents Indra as a close, youthful ally who guides people out of danger, protects those who chant, and grants strength and prosperity when invoked through praise and offering.

They serve as remembered examples of Indra’s guidance and rescue. By recalling these deeds, the poet strengthens the request that Indra show the same help to the present worshippers.

The ending is a dānastuti—praise of a generous patron. It reflects Vedic ritual culture where divine blessing, inspired poetry, and human generosity support each other in sustaining the rite and the community.

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