Rig Veda Sukta 40
Mandala 6Sukta 405 Mantras

Sukta 40

Sukta 6.40

Rishi

Bharadvāja Bārhaspatya (traditional for 6.40)

Devata

Indra

Chandas

Triṣṭubh (probable)

यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र देवता को अत्यन्त तात्कालिक आमन्त्रण देता है कि जब अग्नि प्रज्वलित हो और सोम पेरकर निकाला जाए, तब वह यज्ञ में आए, पान करे और हर्षित हो। कवि इन्द्र से प्रार्थना करता है कि वह रथ के अश्वों को खोलकर उपासक-समूह के साथ बैठे और बल, ‘सुविता’ (सुगम/कल्याणकारी गमन), तथा संरक्षण प्रदान करे। चाहे इन्द्र स्वर्ग में दूर हो या अपने ही गुप्त आसन में, फिर भी उससे विनती है कि वह मरुतों के साथ मिलकर इस यज्ञकर्म की रक्षा करे।

Mantras

Mantra 1

इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायाव स्य हरी वि मुचा सखाया । उत प्र गाय गण आ निषद्याथा यज्ञाय गृणते वयो धाः ॥

हे इन्द्र, पियो—तुम्हारे लिए सोम मादक आनन्द हेतु निचोड़ा गया है; हे सखा, अपने दोनों हरि अश्वों को खोल दो। और गाओ; गण के साथ आकर बैठो—तब यज्ञ के लिए, स्तुति करने वाले को देहधारी जीवन हेतु बल-सम्पदा प्रदान करो।

Mantra 2

अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन् । तमु ते गावो नर आपो अद्रिरिन्दुं समह्यन्पीतये समस्मै ॥

इसी का पियो—उसका, जो तुममें जन्मा, हे इन्द्र, जिसे तुमने माद के लिए और क्रतु (इच्छा-शक्ति) के लिए पिया, हे व्यापक-कर्मन्। तुम्हारे लिए गौ-रश्मियाँ, नर-शक्तियाँ, जल और अद्रि (पेषण-शिला) ने इस सोम-बिन्दु को एक साथ हाँका है—एक साथ तुम्हारे पान हेतु, एक साथ तुम्हारे लिए।

Mantra 3

समिद्धे अग्नौ सुत इन्द्र सोम आ त्वा वहन्तु हरयो वहिष्ठाः । त्वायता मनसा जोहवीमीन्द्रा याहि सुविताय महे नः ॥

समिद्ध अग्नि में और सुते हुए सोम के समय, हे इन्द्र, तुम्हें वहन करने वाले अति-श्रेष्ठ हरि अश्व तुम्हें यहाँ ले आएँ। तुम्हारी ओर पूर्णतः उन्मुख मन से मैं तुम्हें पुकारता हूँ—हे इन्द्र, हमारे महत् कल्याण, सुगम गमन और विजयमय प्रगति के लिए आओ।

Mantra 4

आ याहि शश्वदुशता ययाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम् । उप ब्रह्माणि शृणव इमा नोऽथा ते यज्ञस्तन्वे वयो धात् ॥

हे इन्द्र, जिस प्रिय पथ से तुम सदा आते हो, उसी से, महा-मन के साथ, सोमपान के लिए आओ। हमारे ये ब्रह्म (प्रेरित स्तोत्र-वचन) निकट से सुनो; तब तुम्हारा यह यज्ञ तुम्हारे अपने प्राकट्य-तनु में बल और जीवन-रस स्थापित करे।

Mantra 5

यदिन्द्र दिवि पार्ये यदृधग्यद्वा स्वे सदने यत्र वासि । अतो नो यज्ञमवसे नियुत्वान्त्सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः ॥

हे इन्द्र, चाहे तुम दिवि के परे हो, या पृथक् कहीं, या अपने ही सदन में—जहाँ भी तुम वास करते हो—वहीं से हमारी रक्षा के लिए हमारे यज्ञ की रक्षा करो। नियुत (जुते हुए रथ-घोड़े) सहित, एक-मन होकर, हे गिर्वण (स्तोत्रप्रिय), मरुतों के साथ हमारी रक्षा करो।

Frequently Asked Questions

It invites Indra to come to the Soma sacrifice, drink the pressed Soma, and then grant strength, successful progress (suvitā), and protection to the worshippers.

Because the hymn assumes a Soma-yajña setting: Agni is kindled to carry offerings, and Soma is pressed as Indra’s special drink that energizes his help.

The Maruts are storm-like powers allied to Indra; invoking them together asks for coordinated force—both protection of the ritual and victory over obstacles.

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