
Sukta 6.33
Bharadvāja Bārhaspatya
Indra
Triṣṭubh
इन्द्र को समर्पित यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ् सूक्त देव से उसके सर्वाधिक शक्तिशाली “मद” (वीर-उत्साह से भरा प्रेरक उन्माद) की याचना करता है, जो विजय, समृद्धि और यथोचित भोग-आनन्द प्रदान करता है। इसमें युद्ध में बाधक शक्तियों के विरुद्ध इन्द्र के निर्णायक वध का स्मरण किया गया है और अंत में उसकी रक्षा के लिए प्रार्थना की गई है—केवल तात्कालिक आवश्यकताओं में ही नहीं, बल्कि “परे” भी, उस दूरस्थ, प्रकाशमय स्वर्गीय अवस्था में।
Mantra 1
य ओजिष्ठ इन्द्र तं सु नो दा मदो वृषन्त्स्वभिष्टिर्दास्वान् । सौवश्व्यं यो वनवत्स्वश्वो वृत्रा समत्सु सासहदमित्रान् ॥
हे इन्द्र! जो सबसे ओजस्वी मद (उत्साह-आनन्द) है, उसे हमें दे—हे वृषभ, स्वभिष्टि (उचित भोग का दाता) दास्वान् (उदार दाता)! वह सौवश्व्य (सु-अश्वों की शोभा/बल) जो वनवत् (वन-समृद्धि की भाँति) विजयी है, जिसके द्वारा तूने समर में वृत्रों को जीता और युद्धों में अमित्रों को दबाया—वही हमें प्रदान कर।
Mantra 2
त्वां हीन्द्रावसे विवाचो हवन्ते चर्षणयः शूरसातौ । त्वं विप्रेभिर्वि पणीँरशायस्त्वोत इत्सनिता वाजमर्वा ॥
हे इन्द्र! तेरी ही सहायता के लिए, शूर-विजय में, अनेक-वाणी वाले जन तुझे पुकारते हैं। तू ऋषियों के साथ पणियों को परास्त कर बिखेर देता है; तेरे ही आश्रय से वेगवान (अश्व) वाज—बल-सम्पदा—को जीतता है।
Mantra 3
त्वं ताँ इन्द्रोभयाँ अमित्रान्दासा वृत्राण्यार्या च शूर । वधीर्वनेव सुधितेभिरत्कैरा पृत्सु दर्षि नृणां नृतम ॥
हे शूर इन्द्र! तूने दोनों प्रकार के शत्रुओं को—दास-रूप अवरोधकों को और आर्य-प्रतिरोधों को भी—मारा; जैसे वन-छेदक तीक्ष्ण कुल्हाड़ियों से (वृक्ष) काटता है, वैसे ही तूने उन्हें काट गिराया। युद्धों में तू मनुष्यों में नृतम—सबसे पुरुषार्थी—दिखाई देता है।
Mantra 4
स त्वं न इन्द्राकवाभिरूती सखा विश्वायुरविता वृधे भूः । स्वर्षाता यद्ध्वयामसि त्वा युध्यन्तो नेमधिता पृत्सु शूर ॥
हे इन्द्र! अपनी अडिग ऊतियों के साथ तू हमारे लिए सचमुच मित्र बन; समस्त जीवन का सहचर, हमारी वृद्धि का रक्षक हो। जब हम तुझे स्वः के विजेता के रूप में पुकारते हैं, तब, हे शूर, युद्धों में हम ऐसे होकर लड़ते हैं जो नींव दृढ़ रखते हैं और भूमि नहीं छोड़ते।
Mantra 5
नूनं न इन्द्रापराय च स्या भवा मृळीक उत नो अभिष्टौ । इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्मन्दिवि ष्याम पार्ये गोषतमाः ॥
अब निश्चय ही, हे इन्द्र, हमारे लिए परे के लोक में भी सहायक हो (केवल निकट में ही नहीं); हमारे लिए मृळीक—कृपामय—बन, और हमारी अभिष्टि (वांछित सिद्धि) में भी हमारे साथ रह। इस प्रकार स्तुति करते हुए, हम तेरी महिमा के आश्रय में, उस परे के दिवि (स्वर्ग) में निवास करें—प्रकाश-किरणों से अति-समृद्ध।
The hymn asks Indra to grant his strongest “mada”—an energizing, victorious power that helps the worshipper overcome obstacles and succeed in conflict and goals.
It stresses how decisively Indra removes resistance: as a woodman cuts through wood cleanly, Indra cuts down obstructing forces in battle.
It expands the prayer from immediate help to lasting spiritual protection—seeking Indra’s shelter not only in present life but also in the farther, luminous realm of well-being.
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