
Sukta 6.3
Bharadvāja Bārhaspatya
Agni (with Mitra-Varuṇa invoked as allied powers)
Trishtubh (probable; verify)
यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें ऋत (ब्रह्माण्डीय सत्य/नियम) का रक्षक और साक्षात् स्वरूप कहा गया है। वही शक्ति साधक को “विस्तृत प्रकाश” की ओर ले जाती है और मर्त्य को संकुचित करने वाले क्लेश से बचाती है। अग्नि को एक ओर रात्रि में पक्षी की भाँति वेग से विचरने वाली, दीप्तिमान शक्ति के रूप में, और दूसरी ओर स्तुतियों से समर्थित विद्युत्-सदृश तेज के रूप में महिमामंडित किया गया है; जो मित्र–वरुण के साथ समन्वय में रहकर व्यवस्था और सुरक्षा को स्थिर रखती है।
Mantra 1
अग्ने स क्षेषदृतपा ऋतेजा उरु ज्योतिर्नशते देवयुष्टे । यं त्वं मित्रेण वरुणः सजोषा देव पासि त्यजसा मर्तमंहः ॥
हे अग्नि! वह पुरुष समृद्ध होता है—ऋतपा, ऋतेजा (ऋत से उत्पन्न तेज वाला)—जो देव-प्रिय पथ में विस्तृत ज्योति को प्राप्त करता है। जिस मर्त्य की, हे देव, तुम मित्र और वरुण के साथ एक-भाव से, अपने विजयी तेज/बल द्वारा रक्षा करते हो—वह मर्त्य अंहस् (संकुचन, क्लेश) से बच जाता है।
Mantra 2
ईजे यज्ञेभिः शशमे शमीभिॠधद्वारायाग्नये ददाश । एवा चन तं यशसामजुष्टिर्नांहो मर्तं नशते न प्रदृप्तिः ॥
उसने यज्ञों द्वारा इज्या की है; शमी (शांतिदायक) स्तुतियों/स्वरों से वह शान्त हुआ है; उसने ‘विस्तृत द्वारों’ वाले अग्नि को दान दिया है। इस प्रकार यशस्वी शक्तियों की अस्वीकृति उस मर्त्य तक नहीं पहुँचती—न अंहस् (संकुचन) और न ही प्रदृप्ति (अहंकारी उन्माद)।
Mantra 3
सूरो न यस्य दृशतिररेपा भीमा यदेति शुचतस्त आ धीः । हेषस्वतः शुरुधो नायमक्तोः कुत्रा चिद्रण्वो वसतिर्वनेजाः ॥
सूर्य के समान उसकी दृष्टि निर्मल, अरेपस् (कलंक-रहित) है; जब वह अपनी शुचि-ज्वाला में अग्रसर होता है, तब उसकी धीर् (विचार-शक्ति) भीषण हो उठती है। गर्जन करता, रोकना कठिन—वह रात्रि में विश्राम नहीं करता; इस वनज (वन-जन्य) शक्ति का रमणीय निवास आखिर कहाँ है?
Mantra 4
तिग्मं चिदेम महि वर्पो अस्य भसदश्वो न यमसान आसा । विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् ॥
तीक्ष्ण ही उसका आक्रमण है, महान् उसका स्वरूप; वह मुख फैलाकर जुए में खिंचे अश्व की भाँति हाँफता है। चलती हुई परशु (कुल्हाड़ी) की तरह वह अपनी जिह्वा को चाबुक-सा लपलपाता है; द्रावक (गलाने वाले) की भाँति वह पिघलाता है—उसने काष्ठ को दग्ध कर दिया।
Mantra 5
स इदस्तेव प्रति धादसिष्यञ्छिशीत तेजोऽयसो न धाराम् । चित्रध्रजतिररतिर्यो अक्तोर्वेर्न द्रुषद्वा रघुपत्मजंहाः ॥
वह लक्ष्य की ओर मुख किए हुए-सा स्वयं को स्थिर करता है; अयस (लोहे) की धार की भाँति अपनी तेजस्विता को धार देता है। चित्र-ध्वज-सा दीप्तिमान प्रवाह लिए, अथक, रात्रि में वह काष्ठ पर पक्षी की भाँति चलता है—शीघ्र-पंख, तीव्र-पद, वेगवान।
Mantra 6
स ईं रेभो न प्रति वस्त उस्राः शोचिषा रारपीति मित्रमहाः । नक्तं य ईमरुषो यो दिवा नॄनमर्त्यो अरुषो यो दिवा नॄन् ॥
वह रेभ (कुशल स्तोत्रगायक) की भाँति उषाओं के प्रकाश में अपने को आवृत करता है; अपनी शोचिषा (ज्वाला) से वह मित्र-स्वरूप दिनों को गुंजित कर देता है। जो रात्रि में अरुष (रक्तवर्ण) है, और जो दिवस में मनुष्यों का पथ-प्रवर्तक है—अमर्त्य, वही अरुष जो दिवस में मनुष्यों का पथ-प्रवर्तक है।
Mantra 7
दिवो न यस्य विधतो नवीनोद्वृषा रुक्ष ओषधीषु नूनोत् । घृणा न यो ध्रजसा पत्मना यन्ना रोदसी वसुना दं सुपत्नी ॥
जिसका नित्य-नवीन तेज़ उपासक को—मानो स्वयं द्यौ (स्वर्ग) की भाँति—नव कर देता है; वह वृषभ (अग्नि), दीप्तिमान, अपनी शक्ति को औषधियों/वनस्पतियों में प्रवाहित करता है। घृत-सी उष्ण प्रभा के समान, वह ध्रजस् (ज्वलन) के साथ वेग से चलता है; वह दोनों रोदसी (द्यावा-पृथिवी) के पास, वसु (समृद्धि) सहित, मानो अपने गृह में—उन दोनों सु-पत्नी (सुसंयुक्त) शक्तियों के पास—आ पहुँचता है।
Mantra 8
धायोभिर्वा यो युज्येभिरर्कैर्विद्युन्न दविद्योत्स्वेभिः शुष्मैः । शर्धो वा यो मरुतां ततक्ष ऋभुर्न त्वेषो रभसानो अद्यौत् ॥
चाहे धारण-शक्तियों (धायोभिः) और युक्त स्तोत्र-ऋचाओं (युज्येभिः अर्कैः) के द्वारा वह अपने ही शुष्म (पराक्रम) से विद्युत् की भाँति चमक उठे; अथवा चाहे उसने मरुतों के शर्ध (दल) को गढ़ा हो—ऋभु के समान, तीक्ष्ण और वेगवान, वह आज दीप्त हो उठा है।
It teaches that Agni, aligned with ṛta (truth and cosmic order), leads the devotee to a broad, clear “light” and protects the person from distress and narrowing fear.
Mitra–Varuṇa represent moral and cosmic order; the hymn shows Agni working in harmony with them so protection is not just power, but power guided by truth and right law.
As a bright, sharp, fast-moving fire—active even in the night—who can flash like lightning and who carries prayers and offerings while guarding the worshipper.
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