Rig Veda Sukta 29
Mandala 6Sukta 296 Mantras

Sukta 29

Sukta 6.29

Rishi

Bharadvāja Bārhaspatya (Mandala 6 default attribution)

Devata

Indra

Chandas

Triṣṭubh

यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ् सूक्त उपासकों को इन्द्र की ओर एक विश्वस्त मित्र (सखा) और महान उपकारी के रूप में उन्मुख करता है, जिन्हें रक्षा और व्यापक सहायता के लिए आह्वान किया जाता है। इसमें इन्द्र-स्तुति को सोम-यज्ञ के भीतर स्थापित किया गया है—निचोड़ा हुआ सोम, तैयार अन्न-भोग और गाए गए उक्थ—ताकि यह अनुष्ठान इन्द्र की अजेय शक्ति का माध्यम बने, जो विघ्नों (वृत्रों) को तोड़ती और शत्रु शक्तियों (दस्युओं) को वश में करती है।

Sanskrit recitationRig Veda 6.29

Mantras

Mantra 1

इन्द्रं वो नरः सख्याय सेपुर्महो यन्तः सुमतये चकानाः । महो हि दाता वज्रहस्तो अस्ति महामु रण्वमवसे यजध्वम् ॥

हे नरगण! सख्य-भाव के लिए तुम इन्द्र की ओर मुड़े हो; महत्त्व की ओर बढ़ते हुए, सुमति में आनन्दित हो। वज्रहस्त निश्चय ही महान दाता है। सहायता के लिए उस महान, रमणीय को यज्ञ करो—ताकि विशाल अनुग्रह तुम में उतर आए।

Mantra 2

आ यस्मिन्हस्ते नर्या मिमिक्षुरा रथे हिरण्यये रथेष्ठाः । आ रश्मयो गभस्त्योः स्थूरयोराध्वन्नश्वासो वृषणो युजानाः ॥

जिसके हाथ में नर्य (वीर्यवान) शक्तियाँ संचित हैं, जो स्वर्णमय रथ पर रथिष्ठ (रथ पर स्थित) है। उसकी दोनों दृढ़ भुजाओं में रश्मियाँ (लगाम) जड़ी हैं; पथ पर उसके वृषण (बलवान) अश्व, युजानाः (जुए में युक्त), दौड़ते हैं—वही शक्ति हमें अवरोधों के पार ले जाती है।

Mantra 3

श्रिये ते पादा दुव आ मिमिक्षुर्धृष्णुर्वज्री शवसा दक्षिणावान् । वसानो अत्कं सुरभिं दृशे कं स्वर्ण नृतविषिरो बभूथ ॥

श्री (यश) के लिए तेरे पाद दान-कर्म में आगे बढ़े हैं; तू धृष्णु (निर्भीक) वज्री, शवसा (बल से) महान, दक्षिṇावान् (दान-शक्ति से सम्पन्न) है। सुरभि अत्क (सुगंधित आवरण/वस्त्र) धारण कर, दर्शन के लिए तू स्वर्ण (सूर्य) के समान हुआ; रण-नृत्य में आवेगवान, गति में शीघ्र।

Mantra 4

स सोम आमिश्लतमः सुतो भूद्यस्मिन्पक्तिः पच्यते सन्ति धानाः । इन्द्रं नरः स्तुवन्तो ब्रह्मकारा उक्था शंसन्तो देववाततमाः ॥

वह सोम, आमिश्लतमः (अत्यन्त मिश्रित/समृद्ध), सुता (निचोड़ा हुआ) होकर प्रकट हुआ—जहाँ पक्ति (पाक/यज्ञ-भोजन) पकती है और धानाः (अन्नकण) उपस्थित हैं। इन्द्र की स्तुति करते नर, ब्रह्मकारा (ब्रह्म-वाणी के कर्ता), उक्था (स्तोत्र) शंसते हुए, देववाततमाः (देव-प्रेरित श्वास से अत्यन्त प्रेरित) हो जाते हैं।

Mantra 5

न ते अन्तः शवसो धाय्यस्य वि तु बाबधे रोदसी महित्वा । आ ता सूरिः पृणति तूतुजानो यूथेवाप्सु समीजमान ऊती ॥

तेरे इस बल का भीतर कोई अन्त नहीं; अपनी महिमा से तूने द्यावा‑पृथिवी को अलग‑अलग फैलाया है। उन (लोकों/शक्तियों) को सूर्य‑सदृश दाता, प्रेरित और उद्यत होकर, भर देता है—जैसे जल में झुंड एकत्र होकर चलता है—तेरी रक्षक ऊति से।

Mantra 6

एवेदिन्द्रः सुहव ऋष्वो अस्तूती अनूती हिरिशिप्रः सत्वा । एवा हि जातो असमात्योजाः पुरू च वृत्रा हनति नि दस्यून् ॥

ऐसा ही इन्द्र—सुहव, ऋष्व—हमारी ऊति और पुनः‑पुनः ऊति—हरिशिप्र, सत्वा—हो। क्योंकि वह ऐसा ही जन्मा है, अजेय ओज वाला; वह बहुत‑से वृत्रों को मारता है और दस्युओं को नीचे दबा देता है।

Frequently Asked Questions

It calls the community to approach Indra as a trusted friend and mighty giver, and to worship him through Soma and hymns so his protection and strength remove obstacles.

Because the hymn is set inside a sacrificial scene: Soma is pressed and offerings are prepared, while the priests’ hymns (ukthas) are sung to invite Indra’s presence and power.

They are images of obstruction and hostility—outer enemies and inner darkness alike. Indra’s role here is to break what blocks progress and to restore strength, order, and well-being.

Ask anything about Sukta 29 of the Rig Veda

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App