Rig Veda Sukta 11
Mandala 6Sukta 116 Mantras

Sukta 11

Sukta 6.11

Rishi

Bharadvāja

Devata

Agni (with invited deities: Mitra-Varuṇa, Aśvins, Dyāvā-Pṛthivī)

Chandas

Triṣṭubh

भरद्वाज का यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ सूक्त अग्नि—अन्तःप्रेरित होतृ—से प्रार्थना करता है कि वह मरुतों-सी प्रचण्ड शक्ति से यज्ञ को आगे बढ़ाए और सहचर देवताओं को हवि पर आमंत्रित करे। इसमें अग्नि की स्वयंज्योति, सर्वव्यापी दीप्ति की स्तुति की गई है और निवेदन है कि वह ‘देवों के साथ’ प्रज्वलित होकर समृद्धि प्रदान करे तथा उपासकों को दुःख, संकट और भय से परे पार उतार दे।

Mantras

Mantra 1

यजस्व होतरिषितो यजीयानग्ने बाधो मरुतां न प्रयुक्ति । आ नो मित्रावरुणा नासत्या द्यावा होत्राय पृथिवी ववृत्याः ॥

हे होतृ! भीतर से प्रेरित होकर यज्ञ कर; हे अग्नि! तू अति-यजनीय है—मरुतों के वेग-प्रहार-सा बाधक-बल। मित्र-वरुण हमारे पास आएँ, नासत्य (अश्विनौ) भी; द्यावा-पृथिवी हमारे होत्र (याज्ञिक अर्पण) की ओर उन्मुख हों।

Mantra 2

त्वं होता मन्द्रतमो नो अध्रुगन्तर्देवो विदथा मर्त्येषु । पावकया जुह्वा वह्निरासाग्ने यजस्व तन्वं तव स्वाम् ॥

तू हमारा सर्वाधिक आनंददायक होतृ है, अचूक; मर्त्यों की सभाओं (विदथ) में भीतर स्थित देव। पावक जुहू से, वह्नि (वहन करने वाली ज्वाला) बनकर, हे अग्नि! अपनी ही तनु—अपने स्व-स्वरूप का यज्ञ कर।

Mantra 3

धन्या चिद्धि त्वे धिषणा वष्टि प्र देवाञ्जन्म गृणते यजध्यै । वेपिष्ठो अङ्गिरसां यद्ध विप्रो मधु च्छन्दो भनति रेभ इष्टौ ॥

हाँ, निश्चय ही—तेरे भीतर धिषणा (प्रेरित बुद्धि) भी धन्य, समृद्ध होती है; वह यजमान-गायक के लिए यज्ञ करने हेतु देवताओं को आगे प्रवृत्त करती है। हे अङ्गिरसों में अति-वेगवान्, जब विप्र—रेभ (स्तोता), इष्टि (वाञ्छित यज्ञ) में मधुर छन्द/ऋचा का उच्चारण करता है।

Mantra 4

अदिद्युतत्स्वपाको विभावाग्ने यजस्व रोदसी उरूची । आयुं न यं नमसा रातहव्या अञ्जन्ति सुप्रयसं पञ्च जनाः ॥

वह प्रकट होकर चमका है—स्वयंसिद्ध, व्यापक-दीप्तिमान। हे अग्नि, दोनों उरूची (विस्तृत-प्रकाशमान) रोदसी—द्यावा-पृथिवी—को यज। आयु के समान, उसे—जिसके लिए हवि अर्पित है—पाँच जन (पञ्च जना:) नमस्कार से अभिषिक्त करते हैं; उसे, जो सु-प्रयस् (सुन्दर अग्रगति/सुगमन) वाला है।

Mantra 5

वृञ्जे ह यन्नमसा बर्हिरग्नावयामि स्रुग्घृतवती सुवृक्तिः । अम्यक्षि सद्म सदने पृथिव्या अश्रायि यज्ञः सूर्ये न चक्षुः ॥

जब मैं नमस्कार सहित अग्नि के लिए बर्हि (यज्ञ-तृण) बिछाता हूँ, और घृतवती स्रुच् (घृत-युक्त करछुल) को आगे बढ़ाता हूँ—और सु-वृक्ति (सु-रचित स्तुति-वाणी) को—तब पृथिवी के सद्म/सदन (आवास-स्थान) में गृह स्पर्शित होता है; यज्ञ सूर्य में नेत्र के समान स्थिर-प्रतिष्ठित हो जाता है।

Mantra 6

दशस्या नः पुर्वणीक होतर्देवेभिरग्ने अग्निभिरिधानः । रायः सूनो सहसो वावसाना अति स्रसेम वृजनं नांहः ॥

हे अनेक-रूपों वाले होतृ! हे अग्नि! देवों के साथ, अग्नियों के साथ प्रज्वलित होकर हम पर अनुग्रह करो। हे सहस (बल) के पुत्र! समृद्धि की कामना करते हुए, हम दुःख-पीड़ा के उस कठिन संकटकाल को—मानो भयावह निर्जन वन को पार करते हों—अतिक्रम कर जाएँ।

Frequently Asked Questions

It asks Agni, the sacrificial priest (Hotṛ), to power the rite, bring other gods to the offering, and protect the worshippers so they can move beyond hardship and danger.

Agni is the inviter and messenger in the sacrifice. By calling these deities, the hymn shows that the fire-rite gathers powers of order (Mitra-Varuṇa), help and healing (Aśvins), and cosmic support (Dyāvā-Pṛthivī) around the yajña.

It is both a practical and spiritual prayer: to be led safely through crises and obstacles, and to be guided by Agni’s light and right impulse toward well-being and fullness (rāyas).

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