
Sukta 2.41
Gṛtsamada (and/or the Gṛtsamada lineage)
Vāyu
Gāyatrī (likely; short 3-pāda structure typical of gāyatrī invites)
यह सूक्त मुख्यतः वेगवान प्राण-वायु, वायु देव को आमंत्रित करता है कि वे अपने सहस्र-शक्तियुक्त रथों पर शीघ्र आएँ और सोमपान करें, जिससे उपासकों का प्राणबल जाग्रत, ऊर्जस्वित और निर्मल हो। यज्ञ के क्रम में प्रार्थना का विस्तार रक्षण और कल्याण की ओर होता है—इन्द्र की अनुग्रह-शक्ति का आह्वान करते हुए, तथा यज्ञार्ह (यज्ञ-योग्य) देवसमूह से भी निवेदन करता है कि वे अपने आसन ग्रहण करें और हवि/सोम का भाग लें।
Mantra 1
वायो ये ते सहस्रिणो रथासस्तेभिरा गहि । नियुत्वान्त्सोमपीतये ॥
हे वायो, तुम्हारे जो सहस्र-शक्तिमान रथ हैं, उन्हीं के साथ यहाँ आओ; नियुत् (युग्मित दलों) से युक्त होकर सोम-पान के लिए आओ।
Mantra 2
नियुत्वान्वायवा गह्ययं शुक्रो अयामि ते । गन्तासि सुन्वतो गृहम् ॥
हे वायो, नियुत् से युक्त होकर आओ; यह उज्ज्वल सोम मैं तुम्हारे लिए अर्पित/प्रसारित करता हूँ। तुम सुन्वत (सोम निचोड़ने वाले) के गृह—यज्ञ-गृह—में अवश्य आओगे।
Mantra 3
शुक्रस्याद्य गवाशिर इन्द्रवायू नियुत्वतः । आ यातं पिबतं नरा ॥
आज उज्ज्वल सोम का—गो-रस से मिश्रित—हे इन्द्र और वायु, नियुत् (युग्मित रथ-दल) सहित; आओ। हे दोनों वीरों, पियो।
Mantra 4
अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा । ममेदिह श्रुतं हवम् ॥
हे मित्र-वरुण, ऋत के वर्धक, यह तुम्हारे लिए निचोड़ा हुआ सोम है। यहाँ-ही-अभी मेरी हवि/हवन-आह्वान सुनो।
Mantra 5
राजानावनभिद्रुहा ध्रुवे सदस्युत्तमे । सहस्रस्थूण आसाते ॥
दोनों राजा—अविश्वासी नहीं, द्रोह-रहित—ध्रुव, सभा के उत्तम आसन में विराजते हैं; सहस्र स्तंभों से समर्थित।
Mantra 6
ता सम्राजा घृतासुती आदित्या दानुनस्पती । सचेते अनवह्वरम् ॥
वे दोनों सम्राट, घृत-धारा से समृद्ध, आदित्य—दानुनस्पति (दान के स्वामी)—सीधे, अविचल पथ की ओर एकचित्त होकर चलते हैं; हमारी गति को विचलन-रहित करते हैं।
Mantra 7
गोमदू षु नासत्याश्वावद्यातमश्विना । वर्ती रुद्रा नृपाय्यम् ॥
हे नासत्य, हे अश्विनौ, गोमद् (गो-समृद्धि/प्रकाशमय संपदा) और अश्ववत् (शीघ्र-शक्ति) लेकर आओ; और हे रुद्रगण, मनुष्य-यात्रा की रक्षा करने वाला वह वर्ती (रक्षक मार्ग) भी प्रदान करो।
Mantra 8
न यत्परो नान्तर आदधर्षद्वृषण्वसू । दुःशंसो मर्त्यो रिपुः ॥
हे वृषण्वसू (बल-समृद्ध दाता), न बाहर का न भीतर का कोई शत्रु तुम्हें दबा सकता है; दु:शंस (कुटिल-वाणी) मर्त्य रिपु भी प्रबल नहीं हो सकता।
Mantra 9
ता न आ वोळ्हमश्विना रयिं पिशङ्गसंदृशम् । धिष्ण्या वरिवोविदम् ॥
हे अश्विनौ, उस रयि (समृद्धि) को हमारे पास ले आओ—जो पिशङ्ग (दीप्तिमान) रूप से देखने में उज्ज्वल है। हे धिष्ण्य (प्रकाशमय कौशल के स्वामी), हमारे भीतर वरिवोविद् (विस्तृत अवकाशों के खोजी) बनो।
Mantra 10
इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत् । स हि स्थिरो विचर्षणिः ॥
इन्द्र ने निश्चय ही उस महान भय का सामना किया और उसे दूर फेंक दिया; क्योंकि वही स्थिर है—विचर्षणि, जो व्यापक रूप से विचरने वाली शक्ति होकर मनुष्य-स्वभाव को उसकी सीमाओं से परे बढ़ाती है।
Mantra 11
इन्द्रश्च मृळयाति नो न नः पश्चादघं नशत् । भद्रं भवाति नः पुरः ॥
और इन्द्र हम पर कृपा करे; हमारे पीछे से कोई अघ (अनिष्ट) हमें न पकड़े। हमारे आगे भद्र (मंगल) ही अग्रणी बने।
Mantra 12
इन्द्र आशाभ्यस्परि सर्वाभ्यो अभयं करत् । जेता शत्रून्विचर्षणिः ॥
इन्द्र हमारे चारों ओर, सब दिशाओं से, हमें अभय कर दे। वह सर्वदर्शी/विचक्षण वीर शत्रुओं का जयकर्ता हो।
Mantra 13
विश्वे देवास आ गत शृणुता म इमं हवम् । एदं बर्हिर्नि षीदत ॥
हे विश्वदेवो, आओ; मेरे इस हव (आह्वान) को सुनो। इस बर्हि (पवित्र आसन/विस्तार) पर नीचे बैठो।
Mantra 14
तीव्रो वो मधुमाँ अयं शुनहोत्रेषु मत्सरः । एतं पिबत काम्यम् ॥
यह तीव्र, मधुमय सोम-रस तुम्हारे लिए है—शुनहोत्र (शुद्ध/सुद्रुत होम) के यज्ञों में यह उत्साहदायक है। इस काम्य (इष्ट) पेय को पियो।
Mantra 15
इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः पूषरातयः । विश्वे मम श्रुता हवम् ॥
हे इन्द्र-ज्येष्ठ मरुद्गण! हे देवो, पूषन् की रतियाँ (समृद्धियाँ) देने वाले! तुम सब मेरे इस हव (आह्वान) को सुनो।
Mantra 16
अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥
हे अम्बितमे—अति-श्रेष्ठ माता! हे नदीतमे—अति-श्रेष्ठ नदी! हे देवितमे—अति-श्रेष्ठ देवी, सरस्वती! हम मानो अप्रशस्त (अप्रशंसित) हैं; हे अम्बा, हमारे लिए सच्ची प्रशस्ति—उचित स्तुति—कर दे।
Mantra 17
त्वे विश्वा सरस्वति श्रितायूंषि देव्याम् । शुनहोत्रेषु मत्स्व प्रजां देवि दिदिड्ढि नः ॥
हे सरस्वती, देवि! तुझ में ही हमारे सब आयूंषि—जीवन-प्रवाह—देवी-आश्रय पाते हैं। शुनहोत्रेषु—शीघ्र, सत्य होत्रों में—तू मत्स्व, आनन्द ले; और हे देवि, हमारे लिए प्रजां—संतति/वृद्धि—को दृढ़ कर दे।
Mantra 18
इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व वाजिनीवति । या ते मन्म गृत्समदा ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति ॥
हे वाजिनीवति सरस्वती, इन ब्रह्म-वचनों को स्वीकार कर। गृत्समद का जो मनन-भाव (मन्म) तुम्हें अर्पित है—हे ऋतावरि, ऋत की वरणकर्त्री, देवों में प्रिय—वही देवशक्तियों में आहुति-रूप से उंडेला जाता है।
Mantra 19
प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा युवामिदा वृणीमहे । अग्निं च हव्यवाहनम् ॥
यज्ञ के लिए शम्भुवा—शान्ति और कल्याण की दो शक्तियाँ—आगे बढ़ो। आज हम तुम दोनों को चुनते हैं: इड़ा (इडा) और हव्यवाहन अग्नि।
Mantra 20
द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् । यज्ञं देवेषु यच्छताम् ॥
द्यावा और पृथिवी, आज हमारे लिए इस सिद्ध, दिविस्पृश यज्ञ को धारण करो—जो दीप्त लोकों को स्पर्श करता है। हमारे यज्ञ को देवों में स्थापित करो।
Mantra 21
आ वामुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्ञियाः । इहाद्य सोमपीतये ॥
हे (अश्विनौ) अद्रुह—निर्दोष—तुम्हारे उपस्थान, तुम्हारे आसन पर आज यज्ञ के योग्य देवगण आकर विराजें। यहाँ, अभी, सोम-पान के लिए—(यज्ञ में) वे शक्तियाँ एकत्र हों और प्रकाशमय आनन्द में सहभागी बनें।
The hymn mainly addresses Vāyu, the Wind and Life-Breath, inviting him to come quickly and drink Soma. Some verses also call on Indra and the wider group of gods to bless and protect the worshippers.
On the ritual level it means Vāyu is invited to partake of the pressed Soma offering. On an inner level it suggests the life-force (breath/prāṇa) receiving clarity, vigor, and luminous joy through the sacred rite.
It is a concise prayer for protection and right direction in life: may harm not overtake us unexpectedly, and may what is good and благоприятное lead our path forward. Many readers remember it as a universal Vedic blessing for safe progress.
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