
Sukta 2.37
Vasiṣṭha (Maṇḍala 2 context)
Draviṇodāḥ (a giving aspect/title, here addressed with Soma drinking; often linked with Indra/Soma-giving function)
Triṣṭubh (probable; needs verification)
यह संक्षिप्त सूक्त द्रविणोदाः—“धन/वर देने वाले”—का आह्वान करता है, जो सोमपान करने वाली शक्ति हैं और विधिपूर्वक क्रमबद्ध याज्ञिक कर्म तथा ऋतु (उचित समय) पर दी गई आहुति से प्रसन्न होते हैं। इसमें होतृ, पोतृ, नेष्टृ और अध्वर्यु आदि ऋत्विजों के माध्यम से सोमयाग का क्रम निरूपित है और अंत में देवता से “चतुर्थ पात्र” पीने की प्रार्थना की जाती है, जिससे यजमान को समृद्धि, बल और यज्ञ-सिद्धि प्राप्त हो।
Mantra 1
मन्दस्व होत्रादनु जोषमन्धसोऽध्वर्यवः स पूर्णां वष्ट्यासिचम् । तस्मा एतं भरत तद्वशो ददिर्होत्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः ॥
होतृ के आह्वान के पीछे-पीछे, सोम-रस के सार से आनन्दित हो; हे अध्वर्युजन, वह पूर्णतः उँडेला हुआ पान (आसिचम्) चाहता है। यह उसे ले आओ—उसकी इच्छा के वशीभूत होकर। हे द्रविणोद (धन-प्रदाता), होतृ से सोम का पान कर, ऋतु-ऋतु में, ऋत के विधानानुसार।
Mantra 2
यमु पूर्वमहुवे तमिदं हुवे सेदु हव्यो ददिर्यो नाम पत्यते । अध्वर्युभिः प्रस्थितं सोम्यं मधु पोत्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः ॥
जिसे मैंने पहले पुकारा था, उसी को अब फिर पुकारता हूँ; वही हवि के योग्य है—दधिर्य, जो नाम से ही स्वामी है। अध्वर्युजनों द्वारा प्रस्तुत सोम्य मधु (सोम का मधुर रस) है; हे द्रविणोद, पोतृ से सोम का पान कर, ऋतु-ऋतु में, ऋत के अनुरूप।
Mantra 3
मेद्यन्तु ते वह्नयो येभिरीयसेऽरिषण्यन्वीळयस्वा वनस्पते । आयूया धृष्णो अभिगूर्या त्वं नेष्ट्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः ॥
तेरे वह्नि (वाहक) तैयार हों, जिनके द्वारा तू गमन करता है; हे वनस्पते, अहिंसनीय होकर आगे बढ़, स्तुति स्वीकार। हे धृष्णु, आयु-समेत निकट आ, रक्षण में सटकर; हे द्रविणोद, नेष्ट्र से सोम का पान कर, ऋतु-ऋतु में, ऋत के लय-विधान में।
Mantra 4
अपाद्धोत्रादुत पोत्रादमत्तोत नेष्ट्रादजुषत प्रयो हितम् । तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यं द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः ॥
उसने होतृ से पान किया; पोतृ से वह प्रमुदित हुआ; और नेष्टृ से उसने स्थापित (नियत) हवि को स्वीकार किया। द्रविणोदाः चौथा पात्र पिए—अमिश्रित, अमर्त्य; और द्रविणोदस् (समृद्धि-दाता) भी पान करें।
Mantra 5
अर्वाञ्चमद्य यय्यं नृवाहणं रथं युञ्जाथामिह वां विमोचनम् । पृङ्क्तं हवींषि मधुना हि कं गतमथा सोमं पिबतं वाजिनीवसू ॥
आज यहाँ तुम्हारे विमोचन और व्यापक कर्म के लिए, मनुष्य-वाहक, अग्रगामी रथ को जोतो। हवियों को मधु-रस से मिश्रित करो; हमारे इस आह्वान पर निश्चय ही आओ; और फिर, हे वाजिनीवसू, सोम का पान करो।
Mantra 6
जोष्यग्ने समिधं जोष्याहुतिं जोषि ब्रह्म जन्यं जोषि सुष्टुतिम् । विश्वेभिर्विश्वाँ ऋतुना वसो मह उशन्देवाँ उशतः पायया हविः ॥
हे अग्ने, समिधा में आनंद ले; आहुति में आनंद ले; हमारे अस्तित्व से जन्मे ब्रह्म (मंत्र-वचन) में आनंद ले; सु-रचित स्तुति में आनंद ले। हे वसु, ऋत के अनुशासन में, समस्त देवों के साथ—देवों को, जो स्वयं इच्छुक हैं, इच्छित कर; और उन्हें हवि का पान करवा।
Draviṇodāḥ is a Vedic divine title meaning “giver of wealth/abundance.” In RV 2.37 it is addressed as a Soma-drinking power that, when satisfied, grants prosperity and success to the sacrificer.
It means the offering should be made at the correct ritual moments and in harmony with ṛta (right order). The hymn teaches that prosperity comes when timing, speech, and action in the sacrifice are properly aligned.
It is a specific Soma cup in the ritual sequence, highlighted as a decisive draught for Draviṇodāḥ. By inviting the deity to drink this cup, the hymn marks the point where the rite is expected to yield its fruit—plenitude and well-being.
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