
Sukta 2.31
Gṛtsamada (Bhārgava)
Mitra-Varuṇa (with collective invocation of Ādityas, Rudras, Vasus)
Triṣṭubh
यह सूक्त मित्र और वरुण का आह्वान करता है—ऋत और सम्यक् संबंध के स्थिरकारी बलों के रूप में—और उनसे, आदित्यों, रुद्रों तथा वसुओं सहित, यजमान की यात्रा के “रथ” को संभालने और स्थिर रखने की प्रार्थना करता है। आगे यह व्यापक विश्वदेव-समाह्वान में विस्तार पाता है—त्वष्टृ, इळा, भग, द्यावा-रोदसी, पूषन्, पुरन्धि और अश्विनों को बुलाकर—ताकि प्रत्येक सहायक ब्रह्माण्डीय कार्य इस यज्ञ में अपना आसन ग्रहण करे। अंत में कवि अपने वचनों को नव-निर्मित स्तुति-रथ की भाँति “गढ़ता” है और श्रवस् (यश/प्रेरित श्रवण), वाज (बल-तेज) तथा धीति (प्रकाशित विचार) की कामना करता है।
Mantra 1
अस्माकं मित्रावरुणावतं रथमादित्यै रुद्रैर्वसुभिः सचाभुवा । प्र यद्वयो न पप्तन्वस्मनस्परि श्रवस्यवो हृषीवन्तो वनर्षदः ॥
हे मित्र-वरुण! हमारे लिए इस यात्रा-रथ को संभालो, आदित्यों, रुद्रों और वसुओं के साथ—जो एक ही संयोग में गतिमान हैं। जब हमारी श्रवस्यु (यश-प्रार्थी) शक्तियाँ अपने गृह-आश्रय के चारों ओर पक्षियों की भाँति उछलकर आगे बढ़ें, तब वे प्राण-शक्तियों के हर्ष से हर्षित हों और विशाल में अपना आसन ग्रहण करें।
Mantra 2
अध स्मा न उदवता सजोषसो रथं देवासो अभि विक्षु वाजयुम् । यदाशवः पद्याभिस्तित्रतो रजः पृथिव्याः सानौ जङ्घनन्त पाणिभिः ॥
तब निश्चय ही, हे एक-मन देवो, हमारे लिए उस रथ को उठाओ/आगे बढ़ाओ जो जनों (विक्षु) के बीच बल-सम्पदा (वाज) को जीतने वाला है। जब वे शीघ्र शक्तियाँ अपने पद-चिह्नों से पृथ्वी की पीठ/कगार पर उठती धूल (रजः) को लाँघती हैं, तब वे अपने हाथों से आगे प्रहार करती हुई—यात्रा-विजय का पथ सुसज्जित कर देती हैं।
Mantra 3
उत स्य न इन्द्रो विश्वचर्षणिर्दिवः शर्धेन मारुतेन सुक्रतुः । अनु नु स्थात्यवृकाभिरूतिभी रथं महे सनये वाजसातये ॥
और वह इन्द्र भी—जो समस्त मनुष्यों के लिए कार्य करने वाला (विश्वचर्षणि) है—दिव्य मरुत-गण के साथ, उज्ज्वल संकल्प (सुक्रतु) सहित, अब हमारे पीछे-पीछे खड़ा रहता है; अवृक (अविश्वासी/अधोमुख न करने वाली) रक्षाओं (ऊतिभिः) के साथ। महान् लाभ के लिए, वाज-प्राप्ति के लिए, वह रथ को स्थिर करता/स्थापित करता है।
Mantra 4
उत स्य देवो भुवनस्य सक्षणिस्त्वष्टा ग्नाभिः सजोषा जूजुवद्रथम् । इळा भगो बृहद्दिवोत रोदसी पूषा पुरंधिरश्विनावधा पती ॥
और वह देव—भुवन का आधार (सक्षणि) त्वष्टा—ज्ञानी शक्तियों (ग्नाभिः) के साथ, एक-रस/एक-मन (सजोषा) होकर, रथ को चलाता/प्रेरित करता है। इळा, भग, विस्तीर्ण द्यौः तथा दोनों रोदसी, पूषन्, पुरन्धि, और फिर वे दोनों स्वामी—अश्विनौ—ये सब शक्तियाँ हमारे सुव्यवस्थित गमन में अपना-अपना स्थान ग्रहण करें।
Mantra 5
उत त्ये देवी सुभगे मिथूदृशोषासानक्ता जगतामपीजुवा । स्तुषे यद्वां पृथिवि नव्यसा वचः स्थातुश्च वयस्त्रिवया उपस्तिरे ॥
और वे दोनों देवियाँ—सुभगा, एक-दृष्टि वाली—उषा और रात्रि, जो समस्त चलायमान जगत् को आगे बढ़ाती हैं; हे पृथिवी, जब मैं तुम्हारे लिए नूतन वचन से स्तुति करता हूँ, तब स्थावर प्राणी और त्रिविध जीवन की पंखयुक्त शक्तियाँ तुम्हारी वृद्धि के लिए उपस्तर (शय्या-सा आधार) बनकर फैल जाती हैं।
Mantra 6
उत वः शंसमुशिजामिव श्मस्यहिर्बुध्न्योऽज एकपादुत । त्रित ऋभुक्षाः सविता चनो दधेऽपां नपादाशुहेमा धिया शमि ॥
और मैं तुम्हारा शंसन वैसे ही कहता हूँ जैसे उशिज् (अग्नि-प्रज्वालक) पुरोहित कहते हैं—अहि बुध्न्य, अज (अजन्मा) एकपाद भी; तथा त्रित, ऋभुक्षन् और सविता हमारे लिए उसे स्थापित करते हैं; और अपाम् नपात, आशु-हेम (शीघ्र-स्वर्णिम), धिया (चेतना/विचार) में शमि—शान्ति और सम्यक् स्थापन—धारण करता है।
Mantra 7
एता वो वश्म्युद्यता यजत्रा अतक्षन्नायवो नव्यसे सम् । श्रवस्यवो वाजं चकानाः सप्तिर्न रथ्यो अह धीतिमश्याः ॥
ये वचन मैं तुम्हारे लिए गढ़कर, उठाकर प्रस्तुत करता हूँ, हे यजनीय शक्तियो; ऋषियों ने इन्हें नूतन रूप से समरसता में गढ़ा है। श्रवस् (यश-प्रेरित मान्यता) के अभिलाषी और वाज (बल-समृद्धि) के आकांक्षी होकर, हम उस धीति (प्रेरित विचार) को प्राप्त करें—जैसे रथ के योग्य, सुयोजित अश्व—यात्रा-पथ पर वेगवान।
The primary deities are Mitra and Varuṇa. The hymn also calls in allied groups—Ādityas, Rudras, and Vasus—and names other supportive powers like Tvaṣṭṛ, Pūṣan, Bhaga, Dyāvā-Rodasī, and the Aśvins.
The chariot is a ritual and life-journey symbol: the sacrifice must move forward in a straight, protected, well-yoked way. Asking the gods to uphold or set the chariot in motion means asking for orderly progress, safety, and successful completion.
It asks for śravas (renown/inspired hearing), vāja (vigor and winning strength), and dhīti (clear, illumined thought). The closing verse presents the hymn itself as carefully crafted so these attainments can be reached.
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