Rig Veda Sukta 27
Mandala 2Sukta 2717 Mantras

Sukta 27

Sukta 2.27

Rishi

Gṛtsamada (Āṅgirasa) (traditional for Mandala 2; hymn 2.27 addressed to Ādityas)

Devata

Ādityas (Mitra, Varuṇa, Aryaman, Bhaga, Dakṣa, Aṃśa)

Chandas

Triṣṭubh (probable for RV 2.27)

ऋग्वेद 2.27 गृत्समद का त्रिष्टुभ छन्द का सूक्त है, जिसमें आदित्यों का आह्वान किया गया है—वे प्राचीन राजा हैं जो ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) को धारण करते हैं और सीधे मार्ग पर चलने वाले मनुष्य की रक्षा करते हैं। सूक्त ‘घृत’ के समान स्तुति अर्पित करता है और देवताओं—विशेषतः मित्र, वरुण, अर्यमन्, भग, दक्ष और अंश—से मार्गदर्शन, नैतिक स्थिरता, समृद्धि और निष्कलंक पथ की याचना करता है। अंत में वरुण से व्यक्तिगत प्रार्थना है कि हम दिव्य अनुग्रह से न गिरें और सभा में बलपूर्वक ‘बृहत्’ (विस्तृत/महान वाणी) का उच्चारण कर सकें।

Mantras

Mantra 1

इमा गिर आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि । शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः ॥

घृतस्नू—घृत-धारा से सिक्त—ये वाणी-वचन मैं जुहू (आहुति-चम्मच) से आदित्यों को, सनातन राजाओं को, होम करता हूँ। मित्र सुनें, अर्यमा सुनें, और हमारे लिए भग; तथा तुविजात वरुण—दक्ष और अंश भी (सुनें)।

Mantra 2

इमं स्तोमं सक्रतवो मे अद्य मित्रो अर्यमा वरुणो जुषन्त । आदित्यासः शुचयो धारपूता अवृजिना अनवद्या अरिष्टाः ॥

सक्रतव—दृढ़ संकल्पवाले—मित्र, अर्यमा और वरुण आज मेरे इस स्तोम को स्वीकार करें। आदित्यगण शुचि हैं, धार से शुद्ध किए हुए; अवृजिन—कुटिलता-रहित, अनवद्य—दोष-रहित, अरिष्ट—अहिंसित—वे हमारी वाणी-आहुति में प्रसन्न हों।

Mantra 3

त आदित्यास उरवो गभीरा अदब्धासो दिप्सन्तो भूर्यक्षाः । अन्तः पश्यन्ति वृजिनोत साधु सर्वं राजभ्यः परमा चिदन्ति ॥

वे आदित्य विशाल और गम्भीर हैं, छल से अछूते, रक्षण की अभिलाषा वाले, बहु-नेत्र (बहु-दृष्टि) युक्त। वे भीतर से ही टेढ़े और सीधे—दोनों को, समस्त को देखते हैं; राजाओं-से वे परम तक भी पहुँचते हैं, और अंतःसत्य को जान लेते हैं।

Mantra 4

धारयन्त आदित्यासो जगत्स्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः । दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि ॥

आदित्य चलायमान जगत को धारण करते हैं—देव, समस्त भुवन के गोपा (रक्षक)। दीर्घ-धिया (दूर तक पहुँचने वाली बुद्धि) से वे असुर्य (दैवी तेज) की रक्षा करते हैं; ऋतवान होकर वे ऋणों को समेटते और चुकाते हैं—असंतुलन को संतुलन में लौटाते हैं।

Mantra 5

विद्यामादित्या अवसो वो अस्य यदर्यमन्भय आ चिन्मयोभु । युष्माकं मित्रावरुणा प्रणीतौ परि श्वभ्रेव दुरितानि वृज्याम् ॥

हे आदित्यो, हम आपके इस रक्षक अनुग्रह को जानें—हे अर्यमन्, भय आ पड़े तब भी—जो आपकी शक्ति आनंदमय बन जाती है। हे मित्र-वरुण, आपकी प्रणीति (नेतृत्व) में हम अपने दुरितों को चारों ओर से वैसे ही दूर फेंक दें, जैसे कोई उन्हें गड्ढे में डाल दे।

Mantra 6

सुगो हि वो अर्यमन्मित्र पन्था अनृक्षरो वरुण साधुरस्ति । तेनादित्या अधि वोचता नो यच्छता नो दुष्परिहन्तु शर्म ॥

हे अर्यमन् और मित्र! निश्चय ही तुम्हारा पथ सुगम है; हे वरुण! वह अच्युत, अविच्छिन्न और साधु (धर्ममय) है। उसी पथ से, हे आदित्यों! हमारे ऊपर शासन-वाणी करो, हमें अनुशासित करो; हमें वह शरण प्रदान करो जो सब दुष्परिहन्तु (कठिन आपदाओं) को दूर कर दे।

Mantra 7

पिपर्तु नो अदिती राजपुत्राति द्वेषांस्यर्यमा सुगेभिः । बृहन्मित्रस्य वरुणस्य शर्मोप स्याम पुरुवीरा अरिष्टाः ॥

राजपुत्रा (राजवंशजा) अदिति हमें परिपूर्ण करे, पोषित करे, और सब द्वेषों के पार ले जाए; अर्यमा हमें सुगम पथों से ले चले। मित्र और वरुण के विशाल शर्म (आश्रय) के निकट हम पहुँचें—बहुवीर्य (अनेक वीर-शक्तियों) से युक्त और अरिष्ट (अहिंसित) होकर।

Mantra 8

तिस्रो भूमीर्धारयन्त्रीँरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् । ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन्वरुण मित्र चारु ॥

तुम तीन भूमियों को धारण करते हो, और तीन दीप्तिमान द्युलोकों को भी; तुम्हारे विदथ (सभा) के भीतर तुम्हारे त्रिविध व्रत (नियम) स्थापित हैं। ऋत के द्वारा, हे आदित्यों! महान है तुम्हारा महत्त्व—यह तुम्हारा रमणीय कार्य है, हे अर्यमन्, वरुण, मित्र।

Mantra 9

त्री रोचना दिव्या धारयन्त हिरण्ययाः शुचयो धारपूताः । अस्वप्नजो अनिमिषा अदब्धा उरुशंसा ऋजवे मर्त्याय ॥

वे तीन दिव्य प्रकाश-लोकों को धारण करते हैं—स्वर्णमय, पवित्र, अपनी धारा में परिशुद्ध। निद्रा से अजनमे, अनिमेष, अच्युत—उदार प्रशंसा-योग्य; ऋजु-मार्गी मर्त्य के लिए वे व्यापक स्तुति और सहायतारूप हैं।

Mantra 10

त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देवा असुर ये च मर्ताः । शतं नो रास्व शरदो विचक्षेऽश्यामायूंषि सुधितानि पूर्वा ॥

हे वरुण, तुम ही सबके राजा हो—असुर-स्वरूप देवों के भी और मर्त्यों के भी। हे विचक्षे, हमें सौ शरदें प्रदान करो; पूर्व से नियत, सुदृढ़ आयु-कालों को हम प्राप्त करें।

Mantra 11

न दक्षिणा वि चिकिते न सव्या न प्राचीनमादित्या नोत पश्चा । पाक्या चिद्वसवो धीर्या चिद्युष्मानीतो अभयं ज्योतिरश्याम् ॥

हे आदित्यो, न दाहिना जाना जाता है, न बायाँ; न पूर्व, न पश्चिम। बाल-बुद्धि से भी, धीर-बुद्धि से भी—तुम्हारे द्वारा नीत होकर, हे वसवो, मैं अभय ज्योति को प्राप्त करूँ।

Mantra 12

यो राजभ्य ऋतनिभ्यो ददाश यं वर्धयन्ति पुष्टयश्च नित्याः । स रेवान्याति प्रथमो रथेन वसुदावा विदथेषु प्रशस्तः ॥

जो ऋत के राजसि-धारक जनों को दान देता है, जिसे नित्य पुष्टियाँ बढ़ाती रहती हैं—वह रथ पर प्रथम आगे बढ़ता है; तेजस्वी समृद्धि से युक्त, वसु-दान करने वाला, और विदथों (सभाओं) में प्रशंसित होता है।

Mantra 13

शुचिरपः सूयवसा अदब्ध उप क्षेति वृद्धवयाः सुवीरः । नकिष्टं घ्नन्त्यन्तितो न दूराद्य आदित्यानां भवति प्रणीतौ ॥

अपने आपः (जल-शक्तियों) में शुचि, सुयवसा (सत्पोषक अन्न) से समृद्ध, अदब्ध (अक्षत) वह निकट वास करता है—वृद्धवयाः (परिपक्व वृद्धि वाला), सुवीर (वीर-बल से युक्त)। जो आदित्यों की प्रणीति (नेतृत्व) में होता है, उसे कोई न निकट से, न दूर से, आघात कर सकता है।

Mantra 14

अदिते मित्र वरुणोत मृळ यद्वो वयं चकृमा कच्चिदागः । उर्वश्यामभयं ज्योतिरिन्द्र मा नो दीर्घा अभि नशन्तमिस्राः ॥

हे अदिति, मित्र, वरुण—कृपा करो, यदि हमने तुम्हारे प्रति कोई भी आगः (अपराध) किया हो। हे इन्द्र, हम अभय ज्योति में विस्तार पाएं; दीर्घ अन्धकार हमारे ऊपर न छा जाएँ, न हमें नष्ट करें।

Mantra 15

उभे अस्मै पीपयतः समीची दिवो वृष्टिं सुभगो नाम पुष्यन् । उभा क्षयावाजयन्याति पृत्सूभावर्धौ भवतः साधू अस्मै ॥

दोनों शक्तियाँ उसे सम्यक् परस्परता में पोषित करें; स्वर्ग की वर्षा को बढ़ाएँ। ‘सुभग’ नामक (देवी) पुष्यन्—समृद्धि को पुष्ट करे। दोनों निवास-स्थानों को जीतकर वह संग्रामों में पुरस्कार की ओर जाता है; उसके लिए दोनों पक्ष साधक, समर्थ और सिद्ध हों।

Mantra 16

या वो माया अभिद्रुहे यजत्राः पाशा आदित्या रिपवे विचृत्ताः । अश्वीव ताँ अति येषं रथेनारिष्टा उरावा शर्मन्त्स्याम ॥

हे यजनीय आदित्यो, जो तुम्हारा मायाबल है—शत्रु के लिए जो पाश तुमने काट दिए हैं—उन्हीं के द्वारा हम रथ सहित तीव्र अश्वों की भाँति पार हो जाएँ। अविघ्न, विस्तृत आश्रय में, हम शान्ति में प्रतिष्ठित हों।

Mantra 17

माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः । मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ॥

हे वरुण, दानशील दाता के प्रिय अनुग्रह से मैं कभी विच्युत न होऊँ; आपः (जल-तत्त्व) से उपजने वाला विस्तृत सुख मैं प्राप्त करूँ। हे राजन्, सुमर्यादा-युक्त नियमन (ऋत) से प्राप्त आध्यात्मिक धन-सम्पदा नीचे न गिरे। हम विदथ (सभा) में बृहद् वाणी बोलें, और सुवीर हों।

Frequently Asked Questions

They are a group of divine powers linked with truth and order (ṛta), especially Mitra, Varuṇa, Aryaman, Bhaga, Dakṣa, and Aṃśa. The hymn treats them as ancient royal protectors who keep the world and society in right balance.

It asks for protection and steady guidance on a straight, truthful path, along with lawful prosperity and well-being. The closing prayer focuses on Varuṇa’s favor so that spiritual wealth does not ‘slip away’ from good discipline.

It means the Ādityas are always vigilant—nothing escapes their awareness, and their protection does not fail. In simple terms, the hymn says that truth and moral law are continuously watched over, supporting those who live honestly.

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