Rig Veda Sukta 26
Mandala 2Sukta 264 Mantras

Sukta 26

Sukta 2.26

Rishi

Gṛtsamada (Āṅgirasa) (traditional ascription for Mandala 2 hymns)

Devata

Brahmaṇaspati (Br̥haspati) as the power of the formative Word and right-discriminating will (implicit across RV 2.26)

Chandas

Triṣṭubh (probable for RV 2.26; verse-length and cadence align with triṣṭubh usage in this hymn)

ऋग्वेद 2.26 में ब्रह्मणस्पति (बृहस्पति) का आवाहन पवित्र वाणी के स्वामी के रूप में किया गया है, जो उच्चारण को सीधा, विजयी और ‘अदेव’ (अर्पण-रहित) प्रवृत्ति के विरुद्ध प्रभावी बनाते हैं। यह सूक्त श्रद्धापूर्वक आहुति देने वाले को प्राप्त होने वाली समृद्धि, सामाजिक सहारा और आंतरिक बल की स्तुति करता है, और अंत में बृहस्पति द्वारा सही मार्ग पर मार्गदर्शन तथा दुःख और आघात से व्यापक संरक्षण का वर्णन करता है।

Mantras

Mantra 1

ऋजुरिच्छंसो वनवद्वनुष्यतो देवयन्निददेवयन्तमभ्यसत् । सुप्रावीरिद्वनवत्पृत्सु दुष्टरं यज्वेदयज्योर्वि भजाति भोजनम् ॥

जो वाणी ऋजु और सत्य है, जो लक्ष्य की ओर उन्मुख होकर खोजती है—वह प्रयत्नशील के लिए विजेता की भाँति विजय दिलाती है; और देव-यजन की आकांक्षा-शक्ति से वह अदेवयन्त (देव-विमुख) को भी आ घेर लेती है। वह कठिन संग्रामों में भी सु-प्रवीर (उत्तम वीर-शक्ति) को जीत लेती है; यज्वा (यज्ञकर्ता) यज्य और अयज्य के बीच ‘भोजन’—अर्थात् पोषण/भाग—का विवेकपूर्वक विभाजन करता है।

Mantra 2

यजस्व वीर प्र विहि मनायतो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये । हविष्कृणुष्व सुभगो यथाससि ब्रह्मणस्पतेरव आ वृणीमहे ॥

हे वीर, यजस्व; जो मन लक्ष्य की ओर दौड़ता है, उस संकल्प को आगे बढ़ा—वृत्र-तूर्य (आवरण-भेदन) में मन को भद्र, शुभ और प्रकाशमय साधन बना। हवि की रचना कर, ताकि तू यथोचित सिद्धि-पथ में सु-भाग (सौभाग्यवान) हो; हम ब्रह्मणस्पति की रक्षात्मक सहायता को चुनते हैं और उसे अपने भीतर उतारते हैं।

Mantra 3

स इज्जनेन स विशा स जन्मना स पुत्रैर्वाजं भरते धना नृभिः । देवानां यः पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मणस्पतिम् ॥

वह ही जनों से, विशा (समुदाय) से, जन्म से—सबसे समर्थित होता है; पुत्रों द्वारा वह वाज (बल-समृद्धि) को धारण करता है, और नर-जन द्वारा धना—अस्तित्व की संपदा—को। जो श्रद्धामन होकर हवि से देवों के पिता ब्रह्मणस्पति की सेवा करता है और उनका स्वागत करता है।

Mantra 4

यो अस्मै हव्यैर्घृतवद्भिरविधत्प्र तं प्राचा नयति ब्रह्मणस्पतिः । उरुष्यतीमंहसो रक्षती रिषोंऽहोश्चिदस्मा उरुचक्रिरद्भुतः ॥

जो इस (देव) के लिए घृतयुक्त हवियों से विधिपूर्वक अर्पण करता है, उसे ब्रह्मणस्पति पूर्वाभिमुख, सन्मार्ग पर अग्रसर करते हैं। वे विस्तृत अभय-स्थान रचते हैं, अंहस (क्लेश) और रिष (आघात) से रक्षा करते हैं; संकुचन से भी उसकी रक्षा करते हैं—अद्भुत, दूर तक कार्य करने वाले, प्रभावी कर्मवाले।

Frequently Asked Questions

Brahmaṇaspati (Br̥haspati) is the lord of brahman—sacred, effective speech and the guiding power that makes prayer and offering succeed.

It means speech aligned with truth (ṛta): words spoken with clarity, right intention, and faith, which become a force for victory and right discernment.

The hymn asks for forward guidance on the right path, strength and prosperity for the offerer, and broad protection from distress, harm, and inner constriction.

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