Rig Veda Sukta 23
Mandala 2Sukta 2319 Mantras

Sukta 23

Sukta 2.23

Rishi

Gṛtsamada (of the Bhṛgu-Aṅgiras line)

Devata

Bṛhaspati / Brahmaṇaspati (Lord of the Word; organizer of the inner hosts)

Chandas

Triṣṭubh

यह सूक्त बृहस्पति/ब्रह्मणस्पति का आवाहन करता है—पवित्र वाणी के अधिपति, जो अंतःस्थ “गणों” (gaṇāḥ) को संगठित करते हैं और प्रेरित वचन तथा विजय के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। उनसे प्रार्थना है कि वे उपासक के अंतःआसन में विराजें, शत्रुतापूर्ण या दुष्ट-वाणी शक्तियों से रक्षा करें, और स्वयं स्तुति-गीत का मार्गदर्शन करें, ताकि कुल समृद्ध हो और सभा में “बृहत्” (विस्तीर्ण/महान) वाणी बोले।

Mantras

Mantra 1

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥

गणों के गणपति, हम तुम्हें पुकारते हैं—कवियों में कवि, अनुपम-श्रवणीय, सर्वाधिक यशस्वी। हे ब्रह्मणों के ज्येष्ठ राजा, हे ब्रह्मणस्पति—हमारी सुनो; अपनी सहायताओं के साथ आकर हमारे आसन (अन्तः-धाम) में विराजो।

Mantra 2

देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्ञियं भागमानशुः । उस्रा इव सूर्यो ज्योतिषा महो विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि ॥

हे असुर्य (तेजस्वी) बृहस्पते! देवगण भी—जो प्रचेतस् (दूरदर्शी, प्रबुद्ध) हैं—तेरे द्वारा ही अपना यज्ञीय भाग प्राप्त करते हैं। उषा-गावों के महान् प्रकाश से युक्त सूर्य के समान, तू ही वास्तव में समस्त ब्रह्मों/मंत्रों का जनक है।

Mantra 3

आ विबाध्या परिरापस्तमांसि च ज्योतिष्मन्तं रथमृतस्य तिष्ठसि । बृहस्पते भीमममित्रदम्भनं रक्षोहणं गोत्रभिदं स्वर्विदम् ॥

आवरण करने वाले तम और शत्रु-पीड़ाओं को दूर हटा कर, तू ऋत (सत्य-व्यवस्था) के ज्योतिर्मय रथ पर स्थित होता है। हे बृहस्पते! तू भीषण है—शत्रु के दम्भ का भंजक, रक्षस्-हन्ता, गोत्र (गुहा/आवरण) का भेदक, और स्वः (प्रकाश-लोक) का अन्वेषक।

Mantra 4

सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान्न तमंहो अश्नवत् । ब्रह्मद्विषस्तपनो मन्युमीरसि बृहस्पते महि तत्ते महित्वनम् ॥

सुनीति (सद्-मार्ग) से तू जन को ले चलता है, उसकी रक्षा करता है; जो तुझे दान/समर्पण करता है, वह दुःख-आँहो में नहीं पड़ता। ब्रह्म-द्विषों के लिए तू तपाने वाला है, शत्रु-क्रोध का मर्दक है। हे बृहस्पते! महान् है—वास्तव में—तेरा यह महत्त्व।

Mantra 5

न तमंहो न दुरितं कुतश्चन नारातयस्तितिरुर्न द्वयाविनः । विश्वा इदस्माद्ध्वरसो वि बाधसे यं सुगोपा रक्षसि ब्रह्मणस्पते ॥

जिसकी तुम, हे ब्रह्मणस्पते, सु-रक्षा करते हो—उसे न कोई अंहस् (क्लेश) छूता है, न कहीं से दुरित (पाप/अनिष्ट), न शत्रु-आक्रमणकारी, न द्वयाविन (दोगले) उसे लाँघ पाते हैं। उससे सब टेढ़ी-मेढ़ी हिंसाएँ और कुटिल उपद्रव तुम दूर हटा देते हो।

Mantra 6

त्वं नो गोपाः पथिकृद्विचक्षणस्तव व्रताय मतिभिर्जरामहे । बृहस्पते यो नो अभि ह्वरो दधे स्वा तं मर्मर्तु दुच्छुना हरस्वती ॥

तुम हमारे गोपा (रक्षक), पथिकृत् (मार्ग-निर्माता), विचक्षण (स्पष्टदर्शी) हो; हम अपनी मतियों से तुम्हारे व्रत (धर्म-नियम/कार्य-विधान) में बढ़ने की याचना करते हैं। हे बृहस्पते, जो कोई हमारे विरुद्ध ह्वरस (कुटिल हानि) धरे—उसे तुम्हारी स्व-शक्ति ही दुच्छुना (भयंकर अनिष्ट) से मर्दित करे, हे हरस्वती।

Mantra 7

उत वा यो नो मर्चयादनागसोऽरातीवा मर्तः सानुको वृकः । बृहस्पते अप तं वर्तया पथः सुगं नो अस्यै देववीतये कृधि ॥

और यदि कोई निःपाप हम पर भी कोई मर्त्य—अरातीव (शत्रु-भाव वाला), सानुक (रेंगता/छिपकर चलने वाला), वृक (भेड़िया-सा)—घाव करने को उद्यत हो; हे बृहस्पते, उसे हमारे पथ से दूर फेर दो। इस देववीति (देव-आह्वान/देव-आगमन) के लिए हमारा मार्ग सुगम और खुला कर दो।

Mantra 8

त्रातारं त्वा तनूनां हवामहेऽवस्पर्तरधिवक्तारमस्मयुम् । बृहस्पते देवनिदो नि बर्हय मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन् ॥

हे बृहस्पते! हम तुम्हें अपने तनुओं के त्राता, अपस्पर्त (दूर भगाने वाले), हमारे लिए वचन बोलने वाले अधिवक्ता, अविमूढ़—ऐसे तुम्हें पुकारते हैं। देव-निन्दकों को नीचे गिरा दो; दुरेवा (कुचेष्टा करने वाले) हमारे उत्तम सुम्न (कल्याण/अनुग्रह) तक न पहुँचें।

Mantra 9

त्वया वयं सुवृधा ब्रह्मणस्पते स्पार्हा वसु मनुष्या ददीमहि । या नो दूरे तळितो या अरातयोऽभि सन्ति जम्भया ता अनप्नसः ॥

हे ब्रह्मणस्पते, सुवृद्ध (भली-भाँति बढ़ाने वाले)! तुम्हारे साथ हम स्पृह्य मानुष वसु—मानवी समृद्धियाँ—प्राप्त करें। जो दूर से आघात करने वाले हैं और जो अरातयः (शत्रुताएँ) हम पर दबाव डालती हैं—उन्हें जंभय (कुचल) दो, ताकि वे अनप्नसः—निष्फल और निष्कर्म—हो जाएँ।

Mantra 10

त्वया वयमुत्तमं धीमहे वयो बृहस्पते पप्रिणा सस्निना युजा । मा नो दुःशंसो अभिदिप्सुरीशत प्र सुशंसा मतिभिस्तारिषीमहि ॥

हे बृहस्पते! तुम्हारे साथ हम उत्तम वयः—श्रेष्ठ प्राण-पूर्णता—धारण करते हैं, पप्रिणा (परिपूर्ण/उफनते) और सस्निना (विजयी) के साथ युक्त। दु:शंस (कु-वक्ता) जो हमें आहत करना चाहता है, वह हम पर ईशत—अधिकार—न पाए; अपितु सुशंसा मति (सद्-प्रशंसक/मंगल-विचार) से हम पार उतरें और पहुँचें।

Mantra 11

अनानुदो वृषभो जग्मिराहवं निष्टप्ता शत्रुं पृतनासु सासहिः । असि सत्य ऋणया ब्रह्मणस्पत उग्रस्य चिद्दमिता वीळुहर्षिणः ॥

हे ब्रह्मणस्पति! तुम अडिग वृषभ हो, जो आह्वान पर संग्राम की ओर अग्रसर होता है; रणों में शत्रु को दग्ध कर देता है और युद्धों में विजयी रहता है। तुम सत्यस्वरूप हो, ऋणया—ऋत के पथ के साधकों में प्रेरक—और उग्र बल को भी वश में करने वाले, हे वीरों को हर्षित करने वाली प्रचण्ड शक्ति!

Mantra 12

अदेवेन मनसा यो रिषण्यति शासामुग्रो मन्यमानो जिघांसति । बृहस्पते मा प्रणक्तस्य नो वधो नि कर्म मन्युं दुरेवस्य शर्धतः ॥

जो देवविहीन मन से हमें आघात करता है, शासन में उग्र, अपने को महाबली मानकर मारने को उद्यत होता है—हे बृहस्पते! उसका प्रहार हम तक न पहुँचे; दुरेवस् (दुष्ट-भाव) के क्रोध और उसके शत्रु-समूह को नीचे गिरा दो।

Mantra 13

भरेषु हव्यो नमसोपसद्यो गन्ता वाजेषु सनिता धनंधनम् । विश्वा इदर्यो अभिदिप्स्वो मृधो बृहस्पतिर्वि ववर्हा रथाँ इव ॥

संग्रामों के भार में वह हवनीय है; नमस्कार से वह उपसदनीय—समीप जाने योग्य—है। वाजों की प्राप्ति में वह आता है, धन पर धन का विजेता। ईर्ष्यालु आक्रान्ता के सब आघातों को बृहस्पति रथों की भाँति दूर हटा देता है, मानो मार्ग के अवरोधों को चीरकर निकाल दे।

Mantra 14

तेजिष्ठया तपनी रक्षसस्तप ये त्वा निदे दधिरे दृष्टवीर्यम् । आविस्तत्कृष्व यदसत्त उक्थ्यं बृहस्पते वि परिरापो अर्दय ॥

हे बृहस्पते! अपनी सर्वाधिक तीक्ष्ण, दहकती तपनी शक्ति से उन राक्षसी अन्धकार-बलों को दग्ध कर, जिन्होंने तुम्हारे प्रकट वीर्य को जानते हुए भी तुम्हें निन्दा में धरा। जो हमारे भीतर अभी असत्-सा, अप्रकट और उक्थ्य (स्तुत्य) था—उसे प्रकट कर; और चारों ओर से घेरने वाले आक्रमणों को चूर कर दूर हटा दे।

Mantra 15

बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥

हे बृहस्पते! जब आर्य (श्रेष्ठ) जनों में वह अर्ह (योग्य) पुरुष साधारण पात्रता से भी परे, द्युमान् होकर, क्रतु-सम्पन्न होकर दीप्त होता है—जब हे ऋत-प्रजात! तुम अपने श्वस (बल) से उसे प्रज्वलित कर देते हो—तब वही चित्त्र (बहुरूप) द्रविण (सम्पदा) हमारे भीतर स्थापित कर।

Mantra 16

मा नः स्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः । आ देवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ॥

हमारे पास वे स्तेन (चोर) न पहुँचें, जो हमारे पद (आधार) के विरुद्ध द्रोह की योजना करते हैं—वे निरामिण (अचिकित्स्य) रिपु, जो अन्नों पर लोलुप हैं। हे बृहस्पते! तुम देवों की रक्षक ओट बुनते हो; हृदय में व्रय (बन्धन/आवरण) को खोल देते हो—सामन् के रहस्य को तुमसे बढ़कर कोई नहीं जानता।

Mantra 17

विश्वेभ्यो हि त्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत्साम्नःसाम्नः कविः । स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि ॥

समस्त भुवनों से, उन्हें चारों ओर से व्याप्त करके, त्वष्टा ने तुम्हें रचा—ऋषियों के भी ऋषि, साम्नों के भीतर साम। वह ब्रह्मणस्पति ऋण में पड़े हुए जनों के बीच भी ऋण-निवारक होकर चलता है; वह द्रोह का संहारक, महा ऋत का धारक है।

Mantra 18

तव श्रिये व्यजिहीत पर्वतो गवां गोत्रमुदसृजो यदङ्गिरः । इन्द्रेण युजा तमसा परीवृतं बृहस्पते निरपामौब्जो अर्णवम् ॥

तुम्हारी श्री के लिए पर्वत फाड़ा गया; हे अङ्गिरस्, जब तुमने गवों का गोत्र (गुप्त बाड़ा) खोलकर छोड़ दिया। इन्द्र के साथ युग्म होकर, तमसा से आवृत उस अर्णव को तुमने अपां से बाहर निकाला—हे बृहस्पति, छिपी हुई बाढ़ को तुमने मुक्त किया।

Mantra 19

ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व । विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ॥

हे ब्रह्मणस्पति, तुम ही इस सुक्त के यन्ता (सारथी) और मार्गदर्शक हो; इसे जानो, जागो, और हमारी सन्तति को पुष्ट करो। जो कुछ भद्र है, वही है जिसे देव रक्षित करते हैं—हम विदथ (सभा) में बृहद् का उच्चारण करें, सुवीर (अन्तर-वीर) से सम्पन्न हों।

Frequently Asked Questions

The hymn addresses Bṛhaspati, also called Brahmaṇaspati—lord of brahman (sacred speech) and the guiding power behind effective hymns and right counsel.

Here “Gaṇapati” means “leader of the hosts (gaṇas)”—the power that gathers and organizes many energies and thoughts so the mantra and the rite can succeed.

It asks for inspired and protected speech, victory over harmful or hostile words, and auspicious growth of the family/lineage, culminating in the ability to ‘speak the Vast’ in the assembly.

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