
Sukta 1.51
Vasiṣṭha (traditional attribution for RV 1.51)
Indra
Triṣṭubh (typical for many Indra hymns; this verse is in longer cadence than gāyatrī)
ऋग्वेद 1.51 एक प्रबल इन्द्र-स्तोत्र है, जो उन्हें धन-समृद्धि के उमड़ते महासागर और अजेय वीर-नायक के रूप में महिमामंडित करता है, जिनकी महानता मानव-मान से परे है। कवि संघर्ष और सामूहिक प्रयत्न में इन्द्र की सहायता चाहता है—वे मित्रों और शत्रुओं में भेद करें, अधर्म/नियम-विहीन शक्तियों को दबाएँ, और यजमानों को वीर-बल तथा रक्षात्मक आश्रय प्रदान करें।
Mantra 1
अभि त्यं मेषं पुरुहूतमृग्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम् । यस्य द्यावो न विचरन्ति मानुषा भुजे मंहिष्ठमभि विप्रमर्चत ॥
उस मेष-सदृश, पुरुहूत, ऋग्मिय इन्द्र—समृद्धि के सागर—की ओर आनंददायक स्तुतियों से बढ़ो। जिसके परिमाण को मनुष्य, द्यौ के समान, पार नहीं कर सकते—हे विप्रों, भोग के लिए परम उदार उस द्रष्टा की आराधना करो।
Mantra 2
अभीमवन्वन्त्स्वभिष्टिमूतयोऽन्तरिक्षप्रां तविषीभिरावृतम् । इन्द्रं दक्षास ऋभवो मदच्युतं शतक्रतुं जवनी सूनृतारुहत् ॥
सहायक शक्तियाँ उसे ही लक्ष्य करके, स्व-अभिष्टि (सच्ची सिद्धि) की खोज में, आगे बढ़ती हैं; अन्तरिक्ष को भर देने वाली अपनी तविषियों (पराक्रम-शक्तियों) से इन्द्र आवृत है। दक्ष ऋभु—ऋत-रचना के कुशल—मद से अच्युत, शतक्रतु (सौ संकल्पों/कर्म-शक्तियों वाले) इन्द्र को उन्नत करते हैं; और शीघ्र सूनृता (सत्य-वाणी/कल्याणकारी सत्य) उसके पास आरोहण करती है।
Mantra 3
त्वं गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरपोतात्रये शतदुरेषु गातुवित् । ससेन चिद्विमदायावहो वस्वाजावद्रिं वावसानस्य नर्तयन् ॥
तुमने अङ्गिरसों के लिए गोत्र (गुप्त प्रकाश) को खोल दिया; और अत्रि के लिए जलों को मुक्त किया—सौ अवरोधों के बीच मार्ग को जानने वाले। सासेन के साथ भी तुम विमदाय के लिए वसु (समृद्धि) ले आए; संग्राम में, वज्रधारी, तुमने शिला/अवरोध को झुका दिया, और धन-स्वामी को विजय-नृत्य में नचाया।
Mantra 4
त्वमपामपिधानावृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु । वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित्सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे ॥
तुमने जलों के आवरण खोल दिए; और पर्वत पर धनु-सम्पन्न वसु (समृद्ध निधि) को स्थापित किया। जब, हे इन्द्र, अपने शवस (बल) से तुमने वृत्र—अहि (सर्प)—का वध किया, तब तुमने सूर्य को दिव्य लोक में आरोहण कराया, ताकि वह दृष्टि को दिखाई दे—और दर्शन लौट आए।
Mantra 5
त्वं मायाभिरप मायिनोऽधमः स्वधाभिर्ये अधि शुप्तावजुह्वत । त्वं पिप्रोर्नृमणः प्रारुजः पुरः प्र ऋजिश्वानं दस्युहत्येष्वाविथ ॥
तू अपनी मायाओं से मायावी छलियों—उन अधमों—को गिरा देता है, जो अपनी स्वधा के बल से ‘निद्रा’ को पुकारते हैं। हे नर-बल के स्वामी, तूने पिप्रु के दुर्गों को फोड़ डाला; और दस्यु-वध के कर्मों में तूने ऋजिश्वान की सहायता की—अन्धकार को चीरकर मार्ग बनाया।
Mantra 6
त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारन्धयोऽतिथिग्वाय शम्बरम् । महान्तं चिदर्बुदं नि क्रमीः पदा सनादेव दस्युहत्याय जज्ञिषे ॥
शुष्ण-वध में तूने कुत्स की सहायता की; अतिथिग्व के लिए तूने शम्बर को अधीन कर दिया। महाबली अर्बुद को भी तूने अपने पग से रौंद डाला। सनातन से ही तू दस्यु-वध के लिए जन्मा है—प्राचीन से प्राचीन, प्रकाश-विजय की नित्य शक्ति।
Mantra 7
त्वे विश्वा तविषी सध्र्यग्घिता तव राधः सोमपीथाय हर्षते । तव वज्रश्चिकिते बाह्वोर्हितो वृश्चा शत्रोरव विश्वानि वृष्ण्या ॥
तुझमें समस्त शक्तियाँ सम्यक् संतुलन में प्रतिष्ठित हैं; सोमपान के लिए तेरा राधस् (समृद्धि) उल्लसित होता है। तेरा वज्र जाग्रत है, तेरी भुजाओं में स्थित; शत्रु की सब उग्र शक्तियों को काट गिरा—तेरी वृष्ण्य (पुरुष-ऊर्जाएँ) प्रबल हों।
Mantra 8
वि जानीह्यार्यान्ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान् । शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन ॥
आर्यों और जो दस्यु हैं—दोनों को भली-भाँति पहचान। जो बर्हिष् (यज्ञ-आसन) बिछाता है, उसके लिए धर्म से विमुख, व्रतहीन जनों को वश में कर। यजमान की प्रेरणा से समर्थ बन; और तेरी ये समस्त शक्तियाँ सधमाद (सामूहिक सोम-आनन्द) में हर्ष पावें।
Mantra 9
अनुव्रताय रन्धयन्नपव्रतानाभूभिरिन्द्रः श्नथयन्ननाभुवः । वृद्धस्य चिद्वर्धतो द्यामिनक्षतः स्तवानो वम्रो वि जघान संदिहः ॥
ऋत के अनुव्रत (अनुशासन) में लाकर वह अपव्रतों को वश करता है; अपने प्रहारों से इन्द्र अ-समर्थों को चूर-चूर कर देता है। बढ़ते हुए, विस्तीर्ण होते हुए, द्यौ (स्वर्ग) को छूते हुए भी—स्तुत होकर—वह बलवान् अवरोध की सघन गाँठ को अलग-अलग कर देता है।
Mantra 10
तक्षद्यत्त उशना सहसा सहो वि रोदसी मज्मना बाधते शवः । आ त्वा वातस्य नृमणो मनोयुज आ पूर्यमाणमवहन्नभि श्रवः ॥
जब उशना ने तुम्हारे लिए बल से बल रचा, तब तुम्हारी शक्ति अपने महत्त्व से दोनों रोदसी (द्यावा-पृथिवी) को अलग कर दबाती है। तब वात (वायु) की मनोयुज् (मन से जुती) नृमणो शक्तियाँ—तुम्हें भरती हुई—प्रेरित श्रवस् और कीर्ति की पूर्णता की ओर ले चलीं।
Mantra 11
मन्दिष्ट यदुशने काव्ये सचाँ इन्द्रो वङ्कू वङ्कुतराधि तिष्ठति । उग्रो ययिं निरपः स्रोतसासृजद्वि शुष्णस्य दृंहिता ऐरयत्पुरः ॥
अत्यन्त आनन्ददायक वह (इन्द्र), जब उशना काव्य के साथ संग होकर चलता है, तब वह वक्र-से-वक्रतर ऊँचाई पर स्थित होता है। वह उग्र वीर प्रवाहमान धारा से जलों को मुक्त करता है; और शुष्ण के दृढ़ किए हुए दुर्गों को चूर-चूर कर, उसके पुरों को विदीर्ण कर देता है।
Mantra 12
आ स्मा रथं वृषपाणेषु तिष्ठसि शार्यातस्य प्रभृता येषु मन्दसे । इन्द्र यथा सुतसोमेषु चाकनोऽनर्वाणं श्लोकमा रोहसे दिवि ॥
हे इन्द्र! बलशाली भुजाओं वाले (वीरों/शक्तियों) के बीच, शार्यात के वे अर्पण जो प्रस्तुत किए जाते हैं—जिनमें तू आनन्दित होता है—उनमें तू रथ पर आसीन होकर स्थित होता है। जैसे तू सुत-सोमों में प्रसन्न होता है, वैसे ही तू मनोमय दिवि में अखण्ड श्लोक—स्तुति-वाणी—पर आरोहण करता है।
Mantra 13
अददा अर्भां महते वचस्यवे कक्षीवते वृचयामिन्द्र सुन्वते । मेनाभवो वृषणश्वस्य सुक्रतो विश्वेत्ता ते सवनेषु प्रवाच्या ॥
हे इन्द्र, दीप्त संकल्प वाले! तूने सोम पेरने वाले, महान वाचस्य—गायक—कक्षीवत को ‘अर्भ’ (लघु संतान/बीज) प्रदान किया। हे सुक्रतो, वृषणश्व के लिए तू प्रेरक और सुबुद्धि-परामर्श बना; इसलिए तेरे ये समस्त कर्म प्रत्येक सवन में प्रख्यात किए जाने योग्य हैं।
Mantra 14
इन्द्रो अश्रायि सुध्यो निरेके पज्रेषु स्तोमो दुर्यो न यूपः । अश्वयुर्गव्यू रथयुर्वसूयुरिन्द्र इद्रायः क्षयति प्रयन्ता ॥
इन्द्र ने—शुद्ध विवेक वाले—विस्तृत खुले प्रदेशों में दृढ़ आश्रय लिया है; पज्रों के बीच यह स्तोत्र गृह-स्तम्भ (यूप) की भाँति स्थिर खड़ा है। अश्व-शक्ति का अन्वेषी, गो-रश्मियों (गव्यों) का अन्वेषी, रथ-शक्ति का अन्वेषी, वसु-समृद्धि का अन्वेषी—इन्द्र ही यज्ञीय/आध्यात्मिक धन (रायः) का नियन्ता होकर निवास करता है, दाता बनकर।
Mantra 15
इदं नमो वृषभाय स्वराजे सत्यशुष्माय तवसेऽवाचि । अस्मिन्निन्द्र वृजने सर्ववीराः स्मत्सूरिभिस्तव शर्मन्त्स्याम ॥
यह नमस्कार बलवान वृषभ, स्वराज, सत्य-शुष्म (सच्चे तेज) और तवस् (पराक्रम) वाले तुझे अर्पित किया गया है। हे इन्द्र, इस संघर्ष/रण में हम सर्ववीर हों; अपने सूरी (प्रकाशित नायक) जनों सहित हम तेरे शरण-शर्म में निवास करें।
It asks Indra for strength and victory in struggle, for clear discernment of supportive versus hostile forces, and for lasting protection and well-being for the worshippers.
The image means Indra’s capacity to give abundance is vast and overflowing—beyond ordinary human measure—so the poet approaches him as the supreme source of prosperity and power.
In the hymn’s ritual setting it is a prayer for Indra to distinguish those aligned with right order and the sacrifice from forces that oppose it, and to restrain what is lawless (avratāḥ).
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