Rig Veda Sukta 165
Mandala 1Sukta 16515 Mantras

Sukta 165

Sukta 1.165

Rishi

Agastya Mānavā (traditional for RV 1.165, Indra–Marut dialogue)

Devata

Maruts (addressed; within an Indra–Marut dialogic frame)

Chandas

Tr̥ṣṭubh (probable; metrical verification recommended)

ऋग्वेद 1.165 स्तुति के रूप में रचा गया एक नाटकीय इन्द्र–मरुत संवाद है। कवि मरुतों की एकरूप दीप्ति और सामर्थ्य पर प्रश्न उठाता है, जबकि इन्द्र वृत्र-वध में अपनी स्वतंत्र विजय और मनुष्यों पर किए गए उपकारों का प्रतिपादन करता है। यह सूक्त देव-प्रधानता और मैत्री/संधि का मंथन करता है—तूफ़ानी देव और वज्रधारी किस प्रकार साथ कार्य करते हैं—और अंत में मरुतों को उनके बल-समूह सहित आने तथा तेज, रक्षा और वृद्धि प्रदान करने का आमंत्रण देता है।

Mantras

Mantra 1

कया शुभा सवयसः सनीळाः समान्या मरुतः सं मिमिक्षुः । कया मती कुत एतास एतेऽर्चन्ति शुष्मं वृषणो वसूया ॥

किस शुभ सामंजस्य से—समवयस्क और एक ही नीड (निवास) वाले—मरुत् एक साथ मिल गए? किस मति (प्रेरित बुद्धि) से, कहाँ से ये आए हैं, कि ये वृषण (वीर्यवान) वसूया (सच्चे धन की कामना) करते हुए अपना शुष्म (बल) गाते हैं?

Mantra 2

कस्य ब्रह्माणि जुजुषुर्युवानः को अध्वरे मरुत आ ववर्त । श्येनाँ इव ध्रजतो अन्तरिक्षे केन महा मनसा रीरमाम ॥

किसके ब्रह्म (पवित्र स्तोत्र/सूक्त) को इन युवाओं ने स्वीकारा है? किसने मरुतों को अध्वर (यज्ञ-कर्म) की ओर मोड़ा? अन्तरिक्ष में चमकते श्येन (बाज़) की भाँति—किस महा मनस् (महान् मन) से हम उनके निकट जाएँ और उन्हें रिझाएँ?

Mantra 3

कुतस्त्वमिन्द्र माहिनः सन्नेको यासि सत्पते किं त इत्था । सं पृच्छसे समराणः शुभानैर्वोचेस्तन्नो हरिवो यत्ते अस्मे ॥

हे इन्द्र, महिमन्-युक्त! तू कहाँ से आता है कि, हे सत्पते, तू अकेला ही जाता है? तू ऐसा क्यों पूछता है, अपने शुभ (दीप्त) साथियों के साथ आकर? हे हरिवन्, जो तेरे मन में हमारे लिए है, वह हमें कह दे।

Mantra 4

ब्रह्माणि मे मतयः शं सुतासः शुष्म इयर्ति प्रभृतो मे अद्रिः । आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नो अच्छ ॥

मेरे ब्रह्म (प्रेरित वचन) और मेरी मतियाँ कल्याणकारी हैं; सुता हुआ सोम तैयार है, और मेरा शुष्म (वीर्य-बल) उठता है—मेरा अद्रि (सोम-पाषाण) उन्नत है। उक्थ (स्तुति-हिम्न) पुकारते हैं; वे हर्ष से प्रत्युत्तर देते हैं। हे हरि (दो कपिश/ताम्र अश्व), तुम उन्हें हमारे पास यहाँ ले आओ।

Mantra 5

अतो वयमन्तमेभिर्युजानाः स्वक्षत्रेभिस्तन्वः शुम्भमानाः । महोभिरेताँ उप युज्महे न्विन्द्र स्वधामनु हि नो बभूथ ॥

अतः हम, इन निकटतम शक्तियों के साथ युक्त होकर, उनके स्वक्षत्र (स्वाधीन प्रभुत्व) से अपनी तनु (अस्तित्व) को शोभित करते हुए, उनकी महिमाओं द्वारा उनसे जुड़ते हैं। हे इन्द्र, अपनी स्वधा (स्व-नियम/स्वभाव-धर्म) के अनुसार चलो—क्योंकि तुम सचमुच हमारे लिए वैसे ही हो गए हो।

Mantra 6

क्व स्या वो मरुतः स्वधासीद्यन्मामेकं समधत्ताहिहत्ये । अहं ह्युग्रस्तविषस्तुविष्मान्विश्वस्य शत्रोरनमं वधस्नैः ॥

तब कहाँ थी तुम्हारी स्वधा, हे मरुतो, जब तुमने मुझे अकेले अहिहत्ये (सर्प-वध) के लिए लगा दिया? क्योंकि मैं—उग्र, तविष (बलवान), तुविष्मान (अत्यन्त पराक्रमी)—समस्त के प्रत्येक शत्रु को अपने वधस्नैः (वध-शस्त्रों) से झुका देता हूँ।

Mantra 7

भूरि चकर्थ युज्येभिरस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः । भूरीणि हि कृणवामा शविष्ठेन्द्र क्रत्वा मरुतो यद्वशाम ॥

हे वृषभ-बलवान्! तूने अपने युक्त (जुते) हुए सामर्थ्यों से, अपने समान और स्वजन-से पौरुषों से हमारे लिए बहुत-सा कार्य किया है। क्योंकि हम भी—हे अति-शक्तिशाली इन्द्र—मरुतों की इच्छा के अनुसार और क्रतु (संकल्प-शक्ति) के बल से, जब-जब हम वशता/अधिकार की ओर प्रवृत्त हों, बहुत-से कार्य सिद्ध करना चाहते हैं।

Mantra 8

वधीं वृत्रं मरुत इन्द्रियेण स्वेन भामेन तविषो बभूवान् । अहमेता मनवे विश्वश्चन्द्राः सुगा अपश्चकर वज्रबाहुः ॥

हे मरुतो! मैंने अपने ही इन्द्रिय (इन्द्र-बल) से वृत्र—आवरण करने वाले—का वध किया; अपने ही तेज से मैं प्रचण्ड हुआ। वज्र-बाहु मैं ही—मनुष्य के लिए—इन जलों को, सर्वत्र प्रकाशमान, सुगम-गमन योग्य, प्रसन्न प्रगति के पथों के रूप में, प्रवाहित/सुलभ कर गया।

Mantra 9

अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावाँ अस्ति देवता विदानः । न जायमानो नशते न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध ॥

हे मघवन्! तेरा महत्त्व अनुपम है; जानने वाला कोई भी देव तुझ-सा नहीं है। न जन्म लेता हुआ, न जन्मा हुआ—कोई भी—उन कर्मों तक नहीं पहुँच सकता जिन्हें तू करेगा; हे निरन्तर प्रवर्धमान! तू उन्हें कर दिखा।

Mantra 10

एकस्य चिन्मे विभ्वस्त्वोजो या नु दधृष्वान्कृणवै मनीषा । अहं ह्युग्रो मरुतो विदानो यानि च्यवमिन्द्र इदीश एषाम् ॥

एक ही के लिए भी मुझे वह सर्वव्यापी बल प्राप्त हो, जिससे मैं धृष्टता के साथ अपनी मनीषा (विचार-शक्ति) को गढ़ सकूँ। क्योंकि मैं ही, हे मरुतो, उग्र हूँ—जानने वाला; जो-जो मैं चलाता/प्रेरित करता हूँ, उन सब पर इन्द्र ही एकमात्र अधिपति है।

Mantra 11

अमन्दन्मा मरुतः स्तोमो अत्र यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र । इन्द्राय वृष्णे सुमखाय मह्यं सख्ये सखायस्तन्वे तनूभिः ॥

यहाँ मरुतों ने स्तोत्र-गान से मुझे आनन्दित किया, जब वीरों ने मेरे लिए श्रवण-योग्य ब्रह्म (वाणी/वचन) रचा। वृषभ इन्द्र के लिए, सुमुख (सुन्दर-मुख) के लिए, और मेरे लिए—सख्य में सखा—वे अपने शरीरों सहित मेरी देहधारी सत्ता के पास आए।

Mantra 12

एवेदेते प्रति मा रोचमाना अनेद्यः श्रव एषो दधानाः । संचक्ष्या मरुतश्चन्द्रवर्णा अच्छान्त मे छदयाथा च नूनम् ॥

ऐसे ही ये, मेरी ओर प्रकाशमान होते हुए, निष्कलंक श्रव (यश) और यह प्रेरणा धारण करते हैं। हे चन्द्र-वर्ण मरुतो, साथ-साथ मुझे देखकर तुम निकट आए; और अब तुम मुझे ढँकते हो—रक्षा करते, आवृत करते।

Mantra 13

को न्वत्र मरुतो मामहे वः प्र यातन सखीँरच्छा सखायः । मन्मानि चित्रा अपिवातयन्त एषां भूत नवेदा म ऋतानाम् ॥

हे मरुतो! यहाँ कौन है जो तुम्हारा महिमान गा सके? हे सखाओ, अपने सखाओं के पास अग्रसर हो। मेरे नाना-वर्ण विचारों को (प्राण-वायु की भाँति) प्रवाहित करो; और मेरे लिए ऋत (ऋतानाम्) के नूतन-ज्ञाता बनो।

Mantra 14

आ यद्दुवस्याद्दुवसे न कारुरस्माञ्चक्रे मान्यस्य मेधा । ओ षु वर्त्त मरुतो विप्रमच्छेमा ब्रह्माणि जरिता वो अर्चत् ॥

जब गायक सेवा के लिए सेवा करना चाहता है, तब मान्य (पूज्य) की मेधा ने हमें (स्तुति का) साधन बना दिया है। अतः, हे मरुतो, विप्र के पास मुड़ो; यह जरिता (स्तुतिकर्ता) तुम्हारे लिए ये ब्रह्माणि—वाणी-शक्तियाँ—उच्चारित करता है।

Mantra 15

एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः । एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

हे मरुतो! यह तुम्हारा स्तोम है; यह मान्य (पूज्य) माण्डार्य गायक की वाणी है। इसे लेकर हमारे तनु (देह) के पास आओ, ताकि हम इस प्रबल गण को—शीघ्र दान करने वाले—इस बल-समृद्धि को जान सकें।

Frequently Asked Questions

It is a hymn in the form of a dialogue where the Maruts are praised for their unified storm-power, and Indra asserts his own decisive role in slaying Vṛtra and freeing the waters.

The line emphasizes Indra’s sovereignty and independent might, while still keeping the Maruts within the sacred conversation as allied forces whose collective energy shapes the storm and supports cosmic order.

It can be recited as a prayer for courage, protection, and clear progress—symbolized by “easy-moving waters”—invoking the Maruts for energized harmony and Indra for decisive removal of obstacles.

Ask anything about Sukta 165 of the Rig Veda

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free Google sign-in keeps your chat saved across web and the app.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App