
Sukta 1.117
Dīrghatamas Āucathya (traditional attribution for RV 1.117)
Aśvinau (Nāsatyā)
Triṣṭubh
ऋग्वेद 1.117 अश्विनौ (नासत्य) के लिए एक प्रबल आमंत्रण है—वे तीव्रगामी दिव्य वैद्य हैं—कि वे सोम-यज्ञ में आएँ और अपना वाजः, अर्थात् वृद्धि और विजय देने वाली शक्तियाँ, प्रदान करें। यह सूक्त उनके प्रसिद्ध उद्धार-कर्मों को एक-एक कर जोड़ता है (वृद्धों को नवजीवन देना, पीड़ितों की रक्षा करना, समृद्धि तथा सुरक्षित गमन देना) और इन्हें युगल देवों की विश्वसनीयता के प्रमाण तथा वर्तमान सहायता के आधार के रूप में प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य एक ओर अनुष्ठानिक है—देवताओं को यज्ञ की ओर आकर्षित करना—और दूसरी ओर व्यावहारिक—उपासकों के लिए आरोग्य, संरक्षण और समृद्ध बल सुनिश्चित करना।
Mantra 1
मध्वः सोमस्याश्विना मदाय प्रत्नो होता विवासते वाम् । बर्हिष्मती रातिर्विश्रिता गीरिषा यातं नासत्योप वाजैः ॥
मधुर सोम के मद (आनन्द) के लिए, हे अश्विनौ, प्राचीन होतृ तुम्हें यज्ञ में बुलाता है। बर्हिस पर दान-वृष्टि विस्तृत है, और पोषण की प्रेरणा से वाणी मुक्त हुई है; हे नासत्यौ, वाज-शक्तियों—विजयी ऊर्जा की पूर्णताओं—के साथ समीप आओ।
Mantra 2
यो वामश्विना मनसो जवीयान्रथः स्वश्वो विश आजिगाति । येन गच्छथः सुकृतो दुरोणं तेन नरा वर्तिरस्मभ्यं यातम् ॥
हे अश्विनौ! तुम्हारा वह रथ, जो मन से भी अधिक वेगवान, सु-अश्वयुक्त है और जनों तक पहुँचता है—जिस सिद्ध, सु-निष्पन्न गति से तुम सु-निर्मित गृह (दुरोण) को जाते हो, उसी अग्रसर पथ से, हे नरौ, हमारे पास आओ।
Mantra 3
ऋषिं नरावंहसः पाञ्चजन्यमृबीसादत्रिं मुञ्चथो गणेन । मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्वं वृषणा चोदयन्ता ॥
हे नरौ! तुम दोनों ने पंचजन्य (पाँच प्रकार के मानव-समुदाय से संबद्ध) ऋषि अत्रि को घोर संकटकाल के दमन से, अपने गण (शक्तियों के समूह) के साथ, मुक्त किया—और अशिव दस्यु की माया को क्रमशः तोड़ते हुए, हे वृषणौ, विजय-गति को आगे बढ़ाते रहे।
Mantra 4
अश्वं न गूळ्हमश्विना दुरेवैॠषिं नरा वृषणा रेभमप्सु । सं तं रिणीथो विप्रुतं दंसोभिर्न वां जूर्यन्ति पूर्व्या कृतानि ॥
जैसे छिपा हुआ अश्व मिल जाता है, वैसे ही, हे अश्विनौ, हे वृषण नरौ! तुमने जलों में पड़े ऋषि रेभ को—टूटा-फूटा, बिखरा हुआ—अपने दंस (कौशल-शक्तियों) से खोजकर समेट लिया। तुम्हारे प्राचीन कृत्य जीर्ण नहीं होते।
Mantra 5
सुषुप्वांसं न निॠतेरुपस्थे सूर्यं न दस्रा तमसि क्षियन्तम् । शुभे रुक्मं न दर्शतं निखातमुदूपथुरश्विना वन्दनाय ॥
जैसे विनाश (निॠति) की गोद में सोया हुआ, जैसे अँधेरे में निवास करता सूर्य, जैसे शोभायमान स्वर्णाभूषण जो दृष्टि से छिपा कर गाड़ दिया गया हो—हे अद्भुत अश्विनौ (दस्रा), तुमने वन्दना को ऊपर उठाया, उसे फिर प्रकाश और अस्तित्व के लोक में ले आए।
Mantra 6
तद्वां नरा शंस्यं पज्रियेण कक्षीवता नासत्या परिज्मन् । शफादश्वस्य वाजिनो जनाय शतं कुम्भाँ असिञ्चतं मधूनाम् ॥
हे नरौ, नासत्यौ! पज्रि-पुत्र कक्षीवत् द्वारा तुम्हारा यह कर्म गाया जाने योग्य है। वेगवान अश्व के खुर से तुमने मनुष्य के लिए मधु के सौ कुम्भ उँडेल दिए—आनन्द और बल की परिपूर्णता।
Mantra 7
युवं नरा स्तुवते कृष्णियाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय । घोषायै चित्पितृषदे दुरोणे पतिं जूर्यन्त्या अश्विनावदत्तम् ॥
हे नरौ! स्तुति करने वाले कृष्णिय को तुमने सर्वव्यापी विष्णाप्व प्रदान किया। और घोषा को—जो पिता के घर (पितृषद् दुरोण) में ही रहती थी—क्षीण होती हुई को तुमने पति दिया, हे अश्विनौ; इस प्रकार तुम भाग्य को पूर्णता की ओर मोड़ देते हो।
Mantra 8
युवं श्यावाय रुशतीमदत्तं महः क्षोणस्याश्विना कण्वाय । प्रवाच्यं तद्वृषणा कृतं वां यन्नार्षदाय श्रवो अध्यधत्तम् ॥
हे अश्विनौ! तुम दोनों ने श्याव के लिए उस दीप्तिमती (रुशती) को, महत् क्षोण के लिए, कण्व को प्रदान किया। हे वृषणौ (बलवानो)! तुम्हारा यह कृत्य प्रशंसनीय और उद्घोष्य है—जब तुमने नार्षदाय पर श्रवस् (यश) को अधिष्ठित किया, सत्य-श्रवण की प्रतिष्ठा की।
Mantra 9
पुरू वर्पांस्यश्विना दधाना नि पेदव ऊहथुराशुमश्वम् । सहस्रसां वाजिनमप्रतीतमहिहनं श्रवस्यं तरुत्रम् ॥
हे अश्विनौ! अनेक रूप धारण करते हुए तुमने पेदु के लिए एक वेगवान अश्व उतारा। वह सहस्र-विजयी वाजिन्, आक्रमण में अप्रतीत (अजेय), अहिहन् (सर्प-शक्ति का संहारक), श्रवस्य (यशस्वी), तरुत्र (बलवान उद्धारक) था।
Mantra 10
एतानि वां श्रवस्या सुदानू ब्रह्माङ्गूषं सदनं रोदस्योः । यद्वां पज्रासो अश्विना हवन्ते यातमिषा च विदुषे च वाजम् ॥
हे सुदानू (उदार दाता) अश्विनौ! ये तुम्हारे श्रवस्य (प्रेरित यश) के कृत्य हैं—यह ब्रह्म-उद्गीथ, यह दोनों लोकों (रोदसी) के बीच का सदन। जब पज्र जन तुम्हें पुकारते हैं, हे अश्विनौ, तो विदुषे के लिए इषा (पोषण-शक्ति) और वाज (विजय-बल) लेकर आओ।
Mantra 11
सूनोर्मानेनाश्विना गृणाना वाजं विप्राय भुरणा रदन्ता । अगस्त्ये ब्रह्मणा वावृधाना सं विश्पलां नासत्यारिणीतम् ॥
हे अश्विनौ! पुत्र के मान (माप) से गाते हुए, प्रेरित विप्र को वाज प्रदान करते हुए, और अगस्त्य के ब्रह्म से वर्धित होकर—हे नासत्यो! तुमने विश्पला को सम्यक् व्यवस्थित किया और पुनः स्थापित किया; यात्रा में जो अंग-भंग हो, उसे तुम पूर्ण कर देते हो।
Mantra 12
कुह यान्ता सुष्टुतिं काव्यस्य दिवो नपाता वृषणा शयुत्रा । हिरण्यस्येव कलशं निखातमुदूपथुर्दशमे अश्विनाहन् ॥
हे दिवो नपाता, वृषणौ, शीघ्रगामी अश्विनौ! कवि की सुष्टुति (सु-रची स्तुति) की ओर तुम कहाँ गए? जैसे गड़ा हुआ स्वर्ण-कलश ऊपर निकाला जाता है, वैसे ही तुमने नीचे छिपे आनन्द को ऊपर उठाया—हे अश्विनौ! दसवें दिन तुमने उसे प्रकट कर दिया।
Mantra 13
युवं च्यवानमश्विना जरन्तं पुनर्युवानं चक्रथुः शचीभिः । युवो रथं दुहिता सूर्यस्य सह श्रिया नासत्यावृणीत ॥
हे अश्विनौ! अपनी शची (प्रभावी शक्तियों) से तुमने जर्जर च्यवान को फिर से युवा कर दिया। और सूर्य की दुहिता ने, श्री के सहित, तुम्हारे रथ को चुना—हे नासत्यो! संयोग-यात्रा के लिए।
Mantra 14
युवं तुग्राय पूर्व्येभिरेवैः पुनर्मन्यावभवतं युवाना । युवं भुज्युमर्णसो निः समुद्राद्विभिरूहथुॠज्रेभिरश्वैः ॥
हे अश्विनौ! तुम दोनों तुग्र के लिए अपने प्राचीन पराक्रमी प्रेरणाओं से फिर से मन से युवावस्था को प्राप्त हुए। और तुमने भुज्यु को उफनते जल से—समुद्र से—अपने उज्ज्वल-गामी, अनेक साधनों वाले अश्वों के द्वारा बाहर उठा लिया।
Mantra 15
अजोहवीदश्विना तौग्र्यो वां प्रोळ्हः समुद्रमव्यथिर्जगन्वान् । निष्टमूहथुः सुयुजा रथेन मनोजवसा वृषणा स्वस्ति ॥
हे अश्विनौ! तौग्र्य ने तुम्हें पुकारा, जब वह सहारे के बिना, दूर तक ढोया हुआ समुद्र में जा पहुँचा। तब तुमने उसे—सुसंयोजित रथ से, मनोवेग-सम—हे वृषणौ (बलवानो)! स्वस्ति और कल्याण में निकाल लिया।
Mantra 16
अजोहवीदश्विना वर्तिका वामास्नो यत्सीममुञ्चतं वृकस्य । वि जयुषा ययथुः सान्वद्रेर्जातं विष्वाचो अहतं विषेण ॥
हे अश्विनौ! वर्तिका ने तुम्हें पुकारा, जब तुमने उसे वृक (भेड़िये) के मुख से छुड़ाया। तब तुम विजयी बल से आगे बढ़े; और पर्वत-ढाल पर जन्मे उस सर्वभक्षी को तुमने अपने विष—चिकित्सक-प्रतिबल—से मार गिराया।
Mantra 17
शतं मेषान्वृक्ये मामहानं तमः प्रणीतमशिवेन पित्रा । आक्षी ऋज्राश्वे अश्विनावधत्तं ज्योतिरन्धाय चक्रथुर्विचक्षे ॥
जब ऋज्राश्व ने उस मादा-भेड़िये को सौ मेष (मेंढ़े) देकर, अपने ही अशिव (निर्दयी) पिता द्वारा घोर तमस् में ले जाया गया, तब हे अश्विनौ, तुमने उसके भीतर नेत्र स्थापित किए। तुमने अन्धे के लिए ज्योति रची, ताकि वह विवेकपूर्ण दृष्टि से देख सके।
Mantra 18
शुनमन्धाय भरमह्वयत्सा वृकीरश्विना वृषणा नरेति । जारः कनीन इव चक्षदान ऋज्राश्वः शतमेकं च मेषान् ॥
अन्धे के लिए जो भार था, वही ‘शुनम्’ (सौभाग्य) कहलाया; तब वह वृकी (मादा-भेड़िया) पुकार उठी—‘हे अश्विनौ, हे वृषणौ नर!’ ऋज्राश्व ने, जैसे कोई जार (प्रेमी) कन्या को दृष्टि देता हो, वैसे ही दृष्टि पाकर, सौ और एक मेष अर्पित किए।
Mantra 19
मही वामूतिरश्विना मयोभूरुत स्रामं धिष्ण्या सं रिणीथः । अथा युवामिदह्वयत्पुरंधिरागच्छतं सीं वृषणाववोभिः ॥
हे अश्विनौ, तुम्हारी ऊति (सहायता) महान है, जो आनन्द देने वाली है; और हे धिष्ण्य (प्रज्ञावान) जनो, तुम दुर्बलता और श्रम-क्षीणता को भी सम्यक् कर देते हो। इसलिए पुरंधि ने ही तुम्हें पुकारा—आओ उसके पास, हे वृषणौ, अपने अवोभिः (रक्षाओं और सहायों) सहित।
Mantra 20
अधेनुं दस्रा स्तर्यं विषक्तामपिन्वतं शयवे अश्विना गाम् । युवं शचीभिर्विमदाय जायां न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषाम् ॥
हे दस्र अश्विनो! जो दुहाई न देने वाली, रोकी हुई (अधेनु) गाय थी, उसे तुमने शयव के लिए दूध से प्रवाहित कर दिया। और अपनी शची-शक्तियों से तुमने विमद के लिए पुरुमित्र की कन्या—उसकी वधू—को ले आकर प्रदान किया।
Mantra 21
यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा । अभि दस्युं बकुरेणा धमन्तोरु ज्योतिश्चक्रथुरार्याय ॥
हे दस्र अश्विनो! हल से जौ बोते हुए, और मनुष्य के लिए पोषण-समृद्धि का दुग्ध-प्रवाह निकालते हुए—तुम बकुर से दस्यु पर फूँक मारते हुए आर्य के लिए विस्तृत ज्योति रचते हो, व्यापक प्रकाश-मार्ग स्थापित करते हो।
Mantra 22
आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् । स वां मधु प्र वोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपिकक्ष्यं वाम् ॥
हे अश्विनो! अथर्वण के लिए तुमने दधीचि का अश्व-शीर्ष फिर से उठाकर स्थापित किया। तब उसने तुम्हें ऋत का मधुर मधु—त्वष्टृ-जन्य वह रहस्य-विद्या—कहा, जो, हे दस्रों, तुम्हारे अंतः-गुह्य आश्रय में छिपी थी।
Mantra 23
सदा कवी सुमतिमा चके वां विश्वा धियो अश्विना प्रावतं मे । अस्मे रयिं नासत्या बृहन्तमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथाम् ॥
हे कवी-स्वरूप अश्विनौ! मैं सदा आपकी सुमति—कल्याणकारी बुद्धि—की ओर उन्मुख होता हूँ; मेरी समस्त धियों (प्रेरित विचार-चेतनाओं) का आप पालन-पोषण करें। हे नासत्यौ! हमारे लिए महान् रयि (समृद्धि/पूर्णता) स्थापित करें—जो अपत्य-साच् (संतति/आत्म-परम्परा को साथ ले जाने वाली) हो और श्रुत्य (श्रुति में गायी जाने योग्य, स्मरणीय) बने।
Mantra 24
हिरण्यहस्तमश्विना रराणा पुत्रं नरा वध्रिमत्या अदत्तम् । त्रिधा ह श्यावमश्विना विकस्तमुज्जीवस ऐरयतं सुदानू ॥
हे अश्विनौ, हर्षित होकर, हे नर-वीरौ, आपने वध्रिमती को हिरण्यहस्त-सा (स्वर्णहस्त-तुल्य) पुत्र प्रदान किया। और हे सुदानू (उदार दाता) अश्विनौ, त्रिधा (तीन प्रकार से) खण्डित-क्षीण हुए श्याव को आपने फिर से जीवन के लिए उठाया, जाग्रत किया।
Mantra 25
एतानि वामश्विना वीर्याणि प्र पूर्व्याण्यायवोऽवोचन् । ब्रह्म कृण्वन्तो वृषणा युवभ्यां सुवीरासो विदथमा वदेम ॥
हे अश्विनौ! ये आपके वीर्य—प्राचीन कर्म—साधक जनों ने घोषित किए हैं। हे वृषणौ (बलवानो), आपके लिए ब्रह्म (मन्त्र-शक्ति) रचते हुए, हम सुवीरासः (अन्तरंग वीरों से सम्पन्न) होकर विदथ (यज्ञ-सभा/जागरण-सभा) में वाणी उच्चारित करें।
The Aśvins (Nāsatyā) are twin Vedic gods known for swift help—especially healing, rescue in danger, and restoring strength. They are closely linked with dawn and quick arrival in a shining chariot.
The hymn invites the Aśvins to come to the Soma offering and bring vāja—winning strength, prosperity, and vital energy—along with protection and health for the worshippers.
Cyavāna’s renewal is a famous example used to show the Aśvins’ real power to restore life and vigor. By recalling such deeds, the poet strengthens the claim that they can help ‘here and now’ in the ritual and in human life.
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