Ramayana Yuddha Kanda Sarga 89
Yuddha KandaSarga 8942 Verses

Sarga 89

इन्द्रजित्–लक्ष्मणयोर् घोरः शरयुद्धः (Indrajit and Lakshmana’s Fierce Exchange of Arrows)

युद्धकाण्ड

इस 89वें सर्ग में लक्ष्मण और इन्द्रजित का द्वंद्व वाक्-युद्ध और शर-युद्ध के क्रमिक उतार-चढ़ाव के साथ और भी घोर हो उठता है। लक्ष्मण क्रोध को संयमित कर अचूकता से बाण चलाते हैं; धनुष की टंकार से राक्षस-नायक के मन में कंपकंपी फैलती है। विभीषण इन्द्रजित के चेहरे की पीलापन को मनोबल में आई दरार का संकेत मानते हैं। इन्द्रजित पूर्व युद्ध में लक्ष्मण के मूर्च्छित होने की बात छेड़कर उन्हें उकसाता है, स्मृति को चुनौती देता है और ‘यमलोक’ की ओर बढ़ने का दुस्साहसिक निमंत्रण देता है। फिर दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगती है—लक्ष्मण की बाण-वृष्टि के प्रत्युत्तर में इन्द्रजित लक्ष्मण, हनुमान और विभीषण को भी बेध देता है; कवच, ढाल और ध्वज-चिह्न टूट-फूट जाते हैं। वर्णन में धैर्य का विशेष बल है—न कोई पीछे हटता है, न थकान दिखती है। आकाश बाणों के जाल से भर जाता है, मानो प्रलयकाल के मेघ छा गए हों। रक्तधाराएँ जलप्रपात-सी बहती हैं और घायल देह पुष्पित वृक्षों-सी चमकती हैं—यह युद्ध-शास्त्र का पाठ है: संयम, लक्ष्य-भेदन और मनोवैज्ञानिक बढ़त न छोड़ना। सर्ग के अंत में विभीषण अजेय-से लक्ष्मण के सहायक बनकर आगे आते हैं, मित्रधर्म और रण-सेवा का संकेत देते हुए।

Shlokas

Verse 1

ततश्शरान् दाशरथिस्सन्धायामित्रकर्शणः ।ससर्जराक्षसेन्द्रायकृद्धस्सर्पइवश्वसन् ।।6.89.1।।

तब दाशरथि लक्ष्मण, शत्रुओं का संहार करने वाले, बाणों को संधान कर क्रोध से फुफकारते हुए सर्प के समान राक्षस-राज पर छोड़ने लगे।

Verse 2

तस्यज्यातलनिर्घोषं स श्रुत्वाराक्षसाधिपः ।विवर्णवदनोभूत्वालक्ष्मणंसमुदैक्षत ।।6.89.2।।

लक्ष्मण की धनुष-डोरी की तीक्ष्ण टंकार सुनकर राक्षसाधिपति का मुख विवर्ण हो गया और वह लक्ष्मण को एकटक देखने लगा।

Verse 3

विषण्णवदनंदृष्टवाराक्षसंरावणात्मजे ।सौमित्रिंयुद्धसंयुक्तंप्रत्युवाचविभीषणः ।।6.89.3।।

रावण के पुत्र उस राक्षस को उदास मुख और खिन्न देखकर, युद्ध में तत्पर और संलग्न सौमित्रि (लक्ष्मण) से विभीषण ने कहा।

Verse 4

निमित्तान्युपपश्यामियान्यस्मिन् रावणात्मजे ।त्वरतेनमहाबाहोभग्नएष न संशयः ।।6.89.4।।

हे महाबाहो! मैं इस रावणपुत्र में जो अपशकुन-चिह्न देख रहा हूँ; वह शीघ्र ही डगमगा रहा है—निःसंदेह इसका मनोबल टूट चुका है।

Verse 5

ततस्सन्धायसौमित्रिश्शरानग्निशिखोपमान् ।मुमोचनिशितांस्तस्मिन् सर्पानिवमहाविषान् ।।6.89.5।।

तब सौमित्रि (लक्ष्मण) ने धनुष पर अग्निशिखा-सदृश बाण संधान कर, उसे लक्ष्य करके तीक्ष्ण बाण छोड़े—मानो महाविषधर सर्प हों।

Verse 6

शक्राशनिसमस्पर्शैर्लक्ष्मणेनाहतश्शरैः ।मुहूर्तमभवन्मूक्षःसर्वसंक्षुभितेन्द्रियः ।।6.89.6।।

लक्ष्मण के बाणों से—जो इन्द्र के वज्र-स्पर्श के समान थे—आहत होकर वह क्षणभर मूढ़ हो गया; उसकी समस्त इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं।

Verse 7

उपलभ्यमुहूर्तेनसंज्ञांप्रत्यागतेन्द्रियः ।ददर्शावस्थितंवीरंवीरोदशरथात्मजम् ।।6.89.7।।

क्षणभर में चेतना पाकर, इन्द्रियाँ लौट आने पर, उस वीर ने स्थिर खड़े हुए वीर—दशरथनन्दन—को देखा।

Verse 8

सोऽभिचक्रामसौमित्रिंरोषात्संरक्तलोचनः ।अब्रवीच्चैनमासाद्यपुनस्सपरुषंवचः ।।6.89.8।।

क्रोध से लाल नेत्रों वाला वह सौमित्रि की ओर बढ़ा; उसके पास पहुँचकर उसने फिर कठोर वचन कहे।

Verse 9

किं न स्मरसितद्युद्धेप्रथमेमत्पराक्रमम् ।निबद्धस्त्वंसहभ्रात्रायदाभुविविचेष्टसे ।।6.89.9।।

क्या तुम उस प्रथम युद्ध में मेरा पराक्रम नहीं स्मरण करते—जब तुम अपने भ्राता सहित मेरे द्वारा बाँधे जाकर भूमि पर छटपटाते थे?

Verse 10

युवांखलुमहायुद्धेशक्रानिसमैश्शरैः ।शायितौप्रथमंभूमौविसंज्ञौसपुरस्सरौ ।।6.89.10।।

उस महायुद्ध में तुम दोनों ही पहले भूमि पर गिराए गए थे—मेरे शक्र-वज्र-समान बाणों से, अग्रगामी वीरों सहित, मूर्छित होकर।

Verse 11

स्मृतिर्वानास्तितेमन्येव्यक्तंवायमसादनम् ।गन्तुमिच्छसियस्मात्त्वमंधर्षयितुमिच्छसि ।।6.89.11।।

मुझे लगता है, या तो तुम्हारी स्मृति नष्ट हो गई है, या तुम स्पष्ट ही यमलोक जाना चाहते हो—क्योंकि तुम मुझे ललकारना चाहते हो।

Verse 12

यदितेप्रथमेयुद्धे न दृष्टोमत्पराक्रमः ।अद्यतेदर्शयिष्यामितिष्ठेदानींव्यवस्थितः ।।6.89.12।।

यदि पहले युद्ध में तुमने मेरा पराक्रम नहीं देखा, तो आज मैं तुम्हें दिखाऊँगा—अब दृढ़ होकर, युद्ध के लिए तैयार खड़े रहो।

Verse 13

इत्युक्त्वासप्तभिर्भाणैरभिविव्याथलक्ष्मणम् ।दशभिस्तुहनूमन्तंतीक्ष्णधाश्शरोत्तमैः ।।6.89.13।।

यह कहकर उसने लक्ष्मण को सात बाणों से बेधा और तीक्ष्ण धार वाले श्रेष्ठ बाणों से हनुमान् को दस बाण मारकर आहत किया।

Verse 14

ततःशरशतेनैवसुप्रयुक्तेनवीर्यवान् ।क्रोथाव्दिगुणसम्रब्धोनिर्बिभेदविभीषणम् ।।6.89.14।।

तब वह पराक्रमी क्रोध से दुगुना उग्र होकर, भली-भाँति चलाए गए सौ बाणों से विभीषण को बेधने लगा।

Verse 15

तद्दष्टवेन्द्रजिताकर्मकृतंरामानुजस्तदा ।अचिन्तयित्वाप्रहसन्नैतत्किञ्चिदितिब्रुवन् ।।6.89.15।।मुमोच च शरान् घोरान् सम्गृह्यनरपुङ्गवः ।अभीतवदनःक्रुद्धोरावणिंलक्ष्मणोयुधि ।।6.89.16।।

इन्द्रजित का किया हुआ कर्म देखकर राम के अनुज लक्ष्मण ने उसकी परवाह न की; हँसकर बोले—“यह तो कुछ भी नहीं।” फिर मनुष्यों में श्रेष्ठ लक्ष्मण, निर्भय मुख वाले, क्रोध से दहकते हुए, युद्ध में भयानक बाणों को उठाकर रावण-पुत्र पर छोड़ने लगे।

Verse 16

तद्दष्टवेन्द्रजिताकर्मकृतंरामानुजस्तदा ।अचिन्तयित्वाप्रहसन्नैतत्किञ्चिदितिब्रुवन् ।।6.89.15।।मुमोच च शरान् घोरान् सम्गृह्यनरपुङ्गवः ।अभीतवदनःक्रुद्धोरावणिंलक्ष्मणोयुधि ।।6.89.16।।

इन्द्रजित का किया हुआ कर्म देखकर राम के अनुज लक्ष्मण ने उसकी परवाह न की; हँसकर बोले—“यह तो कुछ भी नहीं।” फिर मनुष्यों में श्रेष्ठ लक्ष्मण, निर्भय मुख वाले, क्रोध से दहकते हुए, युद्ध में भयानक बाणों को उठाकर रावण-पुत्र पर छोड़ने लगे।

Verse 17

नैवंरणगताःशूराःप्रहरन्तिनिशाचर ।लघवश्चाल्पवीर्याश्चशरासुखास्तवहीमे ।।6.89.17।।

हे निशाचर! रण में उतरे शूरवीर इस प्रकार प्रहार नहीं करते। तुम्हारे ये बाण हल्के और अल्प-बल वाले हैं; मुझे तो ये मानो सुखद ही लगते हैं।

Verse 18

नैवंशूरास्तुयुध्यन्तेसमरेजयकाङ्क्षिणः ।इत्येवंतंब्रुवाणस्तुधन्वीशरैरभिववर्ष ह ।।6.89.18।।

“विजय की कामना करने वाले शूरवीर समर में ऐसे नहीं लड़ते।” ऐसा कहकर धनुर्धर ने उस पर बाणों की वर्षा कर दी।

Verse 19

स्यबाणैस्सुविध्वस्तंकवचंकाञ्चनंमहत् ।व्यशीर्यतरथोपस्थेताराजालमिव्बारात् ।।6.89.19।।

उसके बाणों से बुरी तरह चूर-चूर हुआ वह विशाल स्वर्ण-कवच टूटकर रथ-तल पर गिर पड़ा—मानो आकाश से ताराओं का समूह झर पड़ा हो।

Verse 20

विधूतवर्मानाराचैर्भभूव स कृतव्रणः ।इन्द्रजित्समरेवीरःप्रत्यूषेभानुमानिव ।।6.89.20।।

लोहे के बाणों से उसका कवच-रक्षा चूर हो गई; रण में घायल होकर भी वीर इन्द्रजित् प्रभात के सूर्य की भाँति दीप्तिमान होकर खड़ा रहा।

Verse 21

ततःशरसहस्रेणसङ्क्रुद्धोरावणात्मजः ।बिभेदसमरेवीरोलक्ष्मणंभीमविक्रमः ।।6.89.21।।

तब क्रोध से उन्मत्त, भीषण पराक्रमी रावण-पुत्र ने रण में सहस्र बाणों से लक्ष्मण को बार-बार बेध डाला।

Verse 22

व्यशीर्यतमहद्धिव्यंकवचंलक्ष्मणस्य च ।कृतप्रतिकृतान्योन्यंबभूवतुरभिद्रुतौ ।।6.89.22।।

लक्ष्मण का भी वह महान् दिव्य कवच टूट गया; और दोनों एक-दूसरे पर झपटकर प्रहार के बदले तत्क्षण प्रत्याघात करते रहे।

Verse 23

अभीक्ष्णंनिश्श्वसन्तौतौयुध्येतांतुमुलंयुधि ।शरसङ्कृत्तसर्वाङ्गौसर्वतोरुधिरोक्षितौ ।।6.89.23।।

बार-बार भारी श्वास लेते हुए वे दोनों रण में घोर संग्राम करने लगे। बाणों से उनके सब अंग कट-छिन्न थे और वे चारों ओर से रक्त से सिक्त थे॥

Verse 24

सुदीर्घकालंतौवीरावन्योन्यनिशितैःशरैः ।ततक्षतुर्महात्मानौरणकर्मविहारदौ ।।6.89.24।।

बहुत दीर्घ समय तक वे दोनों वीर—महात्मा और रणकर्म में निपुण—एक-दूसरे को तीक्ष्ण बाणों से विदीर्ण करते रहे॥

Verse 25

बभूवतुश्चात्मजयेयत्तौभीमपराक्रमौ ।तौशरौघैस्तदाकीर्णौनिकृत्तकवचध्वजौ ।।6.89.25।।सृजन्तौरुधिरंचोष्णंजलंप्रस्रवणाविव ।

विजय के लिए उद्यत, भयंकर पराक्रमी वे दोनों तब बाणों की धाराओं से आच्छादित हो गए। उनके कवच और ध्वज कट गए, और वे पर्वत-प्रस्रवणों से बहते जल की भाँति उष्ण रक्त बहाने लगे॥

Verse 26

शरवर्षंततोघोरंमुञ्चतोर्भीमनिःस्वनम् ।।6.89.26।।सासारयोरिवाकाशेनीलयोःकालमेघयोः ।तयोरथमहान्कालोव्यत्ययाद्युध्यमानयोः ।।6.89.27।।न च तौयुद्धवैमुख्यंश्रमंवाप्युपजग्मतुः ।

तब उन दोनों के धनुषों से भयंकर गर्जना के साथ घोर बाण-वर्षा छूट पड़ी—मानो आकाश में दो नील काले मेघ प्रलयकाल में मूसलाधार बरसा रहे हों॥

Verse 27

शरवर्षंततोघोरंमुञ्चतोर्भीमनिःस्वनम् ।।6.89.26।।सासारयोरिवाकाशेनीलयोःकालमेघयोः ।तयोरथमहान्कालोव्यत्ययाद्युध्यमानयोः ।।6.89.27।।न च तौयुद्धवैमुख्यंश्रमंवाप्युपजग्मतुः ।

युद्ध करते-करते बहुत समय बीत गया; पर उन दोनों में से न कोई रण से विमुख हुआ, न किसी ने श्रम को प्राप्त किया॥

Verse 28

अस्त्राण्यस्त्रविदांश्रेष्ठौदर्शयन्तौपुनःपुनः ।।6.89.28।।शरानुच्छावचाकारानन्तरिक्षेबबन्धतुः ।

अस्त्रविद्या में श्रेष्ठ वे दोनों बार-बार अपने अस्त्र-कौशल का प्रदर्शन करते हुए, आकाश में नाना प्रकार और रूपों वाले बाणों का जाल-सा बुनने लगे।

Verse 29

न्यपेतदोषमस्यन्तौलघुचित्रं च सुष्ठु च ।।6.89.29।।उभौतुतुमुलंघोरंचक्रतुर्नरराक्षसौ ।

वे दोनों—मनुष्य और राक्षस—एक भी चूक किए बिना, शीघ्र, विचित्र और अत्यन्त सुघड़ता से बाण चलाते हुए, युद्ध को कोलाहलपूर्ण और भयानक बना रहे थे।

Verse 30

तयोःपृथक् पृथभगीमश्शुश्रुवेतलनिस्स्वनः ।।6.89.30।।प्रकम्पयन्जनंघोरोनिर्घातइवदारुणः ।

उन दोनों से अलग-अलग भयंकर ताल-ध्वनि सुनाई देती थी; वह घोर शब्द दारुण वज्र-गर्जना के समान सेना-समूह को कंपा देता था।

Verse 31

सतयोःभ्राजतेशब्दस्तदासमरयत्तयोः ।।6.89.31।।सुघोरयोर्निष्टनतोर्गगनेमेघयोरिव ।

उन दोनों के युद्ध करते समय वह गूँजता शब्द तब प्रज्वलित-सा हो उठा—जैसे आकाश में दो घोर मेघ गरजते हों।

Verse 32

सुवर्णपुङ्खैर्नाराचैर्बलवन्तौकृतव्रणौ ।।6.89.32।।प्रसुस्रुवातेरुधिरंकीर्तिमन्तौजयेधृतौ ।

सुवर्ण-पंखों वाले नाराच बाणों से घायल होकर वे दोनों बलवान, कीर्तिमान वीर—विजय में दृढ़—अत्यधिक रक्त बहाने लगे।

Verse 33

तेगात्रयोर्निपतितारुक्मपुङ्खाःशरायुधि ।।6.89.33।।असृदगिग्धाविनिष्पेतुर्विविशुर्धरणीतलम् ।

रण में वे स्वर्ण-पंखों वाले बाण उनके अंगों पर गिर पड़े; रक्त से लथपथ होकर वे फिर निकल गए और धरती के तल में धँस गए।

Verse 34

अन्येसुनिशितैश्शस्त्रैराकाशेसञ्जघट्टिरे ।।6.89.34।।बभञ्जुश्चिच्छिदुश्चैवतयोर्बाणाःसहस्रशः ।

इसी बीच, दोनों के हजारों अन्य बाण अत्यन्त तीक्ष्ण शस्त्रों की भाँति आकाश में टकराए; वे टूटे भी और चिर भी गए।

Verse 35

सबभूवरणेघोरस्तयोर्बाणमयश्चयः ।।6.89.35।।अग्निभ्यामिवदीप्ताभ्यांसत्रेकुशमयश्चयः ।

उस रण में उन दोनों के बीच बाणों का एक भयानक ढेर और विस्तार बन गया—मानो यज्ञवेदी में दो प्रज्वलित अग्नियों से प्रकाशित कुश-समूह हो।

Verse 36

तयोःकृतव्रणौदेहौशुशुभातेमहात्मनोः ।।6.89.36।।सुपुष्पाविवनिष्पत्रौवनेशाल्मलिकिंशुकौ ।

उन दोनों महात्मा योद्धाओं के घायल शरीर शोभायमान थे—जैसे वन में पत्तों से रहित, पर पुष्पों से लदे शाल्मली और किंशुक वृक्ष।

Verse 37

चक्रतुस्तुमुलंघोरंसन्निपातंमुहुर्मुहुः ।।6.89.37।।इन्द्रजिल्लक्ष्मणश्चैवपरस्परवधैषिणौ ।

इन्द्रजित और लक्ष्मण—दोनों ही एक-दूसरे के वध के अभिलाषी—बार-बार युद्ध में घोर और तुमुल संग्राम रचते रहे।

Verse 38

लक्ष्मणोरावणिंयुद्धेरावणिश्चापिलक्ष्मणम् ।।6.89.38।।अन्योन्यंतावभिघ्नन्तौ न श्रमंप्रतिपद्यताम् ।

युद्ध में लक्ष्मण रावणि पर प्रहार करते और रावणि भी लक्ष्मण पर; दोनों एक-दूसरे पर आघात करते हुए भी थकान को प्राप्त न हुए।

Verse 39

बाणजालैश्शरीरस्थैरवगाढैस्तरस्विनौ ।।6.89.39।।शुशुभातेमहावीर्यौप्ररूढाविवपर्वतौ ।

शरीर में धँसे हुए बाणों के जाल से वे दोनों वेगवान महावीर भी शोभित हो रहे थे—मानो वृक्षों से घिरे पर्वत हों।

Verse 40

तयोरुधिरसिक्तानिसम्वृतान्तिशरैर्भृशम् ।।6.89.40।।बभ्राजुःसर्वगात्राणिज्वलन्तइवपावकाः ।

उन दोनों के सर्वांग रक्त से सिक्त और बाणों से घने ढँके हुए थे; वे अग्नि की ज्वालाओं की भाँति दहकते हुए चमक रहे थे।

Verse 41

तयोरथमहान् कालोव्यतीयाद्युध्यमानयोः ।।6.89.41।।न च तौयुद्धवैमुख्यंश्रमंवाप्युपजग्मतुः ।

उन दोनों के युद्ध करते-करते बहुत समय बीत गया; फिर भी वे न तो रण से विमुख हुए और न ही तनिक भी थकान को प्राप्त हुए।

Verse 42

तब महात्मा विभीषण, युद्ध के अग्रभाग में अजेय लक्ष्मण का हित चाहकर, उनकी रण-थकान दूर करने हेतु रणभूमि में आए और वहीं खड़े हो गए।

Frequently Asked Questions

The pivotal action is psychological warfare within dharmic combat: Indrajit attempts to destabilize Lakṣmaṇa through memory-taunts and threats of death, while Lakṣmaṇa rejects fear, critiques improper striking, and responds with disciplined, targeted force rather than reckless rage.

The sarga teaches that true vīrya includes mental sovereignty: endurance under pain, refusal to concede moral or psychological ground, and sustained effort without fatigue or retreat—supported by loyal allies who act for one’s welfare in crisis.

No specific terrestrial landmark is foregrounded; instead, the ‘sky’ (antarikṣa/gagana) becomes the primary arena through networks of arrows and cloud similes, while ‘Yama’s abode’ functions as a cultural-religious reference point for mortality and warrior challenge.

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